डिजिटल दौर में साइबर अपराधी नए-नए पैंतरे अपनाकर आम नागरिकों के बैंक खातों से मेहनत की कमाई उड़ा रहे हैं। कभी फर्जी ओटीपी और शेयर बाजार में भारी मुनाफे का झांसा देकर तो कभी फर्जी एपीके फाइलों के जरिए लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। इस तरह के वित्तीय अपराधों पर नकेल कसने के लिए छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस राज्य पुलिस अकादमी में एक विशेष सेमीनार का आयोजन किया गया। नवीन युग के वित्तीय अपराध एवं त्वरित प्रतिक्रिया की तैयारी विषय पर आयोजित इस प्रशिक्षण सत्र में राज्य भर के लगभग 300 पुलिस अधिकारियों ने भाग लिया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य साइबर ठगी की शिकायत मिलते ही शुरुआती समय यानी गोल्डन ऑवर में त्वरित कार्रवाई कर पीड़ित के पैसे को रिकवर करने की तकनीक सिखाना था।
गोल्डन ऑवर का 5-स्टेप फॉर्मूला
कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए देश के जाने-माने साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ रक्षित टंडन ने पुलिस अधिकारियों को वित्तीय धोखाधड़ी पर तत्काल कार्रवाई के लिए 5 महत्वपूर्ण चरणों का फॉर्मूला दिया। उन्होंने रिपोर्ट, ट्रेस, फ्रीज, प्रिजर्व और इन्वेस्टिगेट पर एक साथ काम करने की रणनीति समझाई। साइबर एक्सपर्ट्स के मुताबिक साइबर फ्रॉड की घटना के तुरंत बाद का समय गोल्डन ऑवर कहलाता है। यदि पीड़ित द्वारा शिकायत दर्ज कराते ही पुलिस प्रशासन और बैंक तुरंत हरकत में आ जाएं और संबंधित बैंक खातों के लेन-देन को ब्लॉक कर दें, तो ठगे गए पैसे को फर्जी खातों या दूसरे राज्यों में ट्रांसफर होने से रोका जा सकता है।
चंद घंटों की देरी से क्यों मुश्किल होती है रिकवरी
सेमीनार के दौरान विशेषज्ञों ने आगाह किया कि साइबर अपराध में शुरुआती कुछ घंटे ही सबसे अहम होते हैं। यदि प्राथमिक कार्रवाई में थोड़ी भी देरी हो जाती है, तो शातिर ठग चुराए गए पैसे को कई फर्जी खातों की भूलभुलैया में घुमा देते हैं। इसके बाद इस रकम को शेयर बाजार, क्रिप्टोकरेंसी, यूपीआई-क्यूआर कोड और फर्जी केवाईसी नेटवर्क के जरिए तुरंत ट्रांसफर कर लिया जाता है। एक बार पैसा इन माध्यमों में प्रवेश कर जाए, तो उसे ट्रैक करना और वापस पाना लगभग असंभव हो जाता है। इसी वजह से वित्तीय संस्थानों, फिनटेक कंपनियों और पुलिस के बीच रियल-टाइम तालमेल को बेहद जरूरी बताया गया है।
छत्तीसगढ़ में साइबर फ्रॉड के आंकड़े और बदलता ट्रेंड
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में वर्ष 2023 से जून 2025 के दौरान साइबर अपराध की 67,389 शिकायतें दर्ज की गईं। इन मामलों में साइबर जालसाजों ने नागरिकों को लगभग 791 करोड़ रुपये का चूना लगाया। मई 2026 की रिपोर्ट से यह भी खुलासा हुआ है कि राज्य में साइबर अपराध के मामलों में हर साल करीब 40% की दर से वृद्धि हो रही है। जांच एजेंसियों के अनुसार ठगों के काम करने के तरीके में भी बड़ा बदलाव आया है। अब अपराधी सीधे कैश विड्रॉल करने के बजाय ठगी की रकम को शेयर बाजार और अचल संपत्ति (रियल एस्टेट) में निवेश कर उसे ब्लैक से व्हाइट करने का नया तरीका अपना रहे हैं।
मास्टरमाइंड तक पहुंचने के लिए डिजिटल फुटप्रिंट की जांच जरूरी
कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने साइबर जांच को आधुनिक बनाने पर जोर दिया। डीजी जेपी सिंह ने कहा कि साइबर अपराधी हजारों किलोमीटर दूर बैठकर महज कुछ ही मिनटों में करोड़ों रुपये की चपत लगा रहे हैं, इसलिए पुलिस की प्रतिक्रिया भी उतनी ही तेज और प्रभावी होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस की जांच केवल पैसे के बहाव को ट्रैक करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पीड़ित के मोबाइल से मिलने वाले डिजिटल फुटप्रिंट, सर्च हिस्ट्री और फर्जी खातों के नेटवर्क की गहन जांच कर अपराध के असली मास्टरमाइंड तक पहुंचना पुलिस का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। इस अवसर पर डीजीपी अरुणदेव गौतम, एडीजी दीपमांशु काबरा, अमित कुमार, डॉ आनंद छाबड़ा और आईजी प्रशांत अग्रवाल सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
साइबर ठगी होने पर नागरिक तुरंत करें ये काम
सेमीनार में नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए गए। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसी भी प्रकार की साइबर ठगी का शिकार होने पर पैनिक न हों। घटना के तुरंत बाद राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करें या आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in पर अपनी शिकायत दर्ज कराएं। इसके साथ ही अपने बैंक खाते, क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड को तत्काल प्रभाव से ब्लॉक कराएं। जालसाज द्वारा भेजे गए चैट मैसेज, कॉल रिकॉर्ड्स, संदिग्ध लिंक और बैंक ट्रांजेक्शन की रसीद के स्क्रीनशॉट को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित रखें, जिससे पुलिस जांच में मदद मिल सके।


















