छत्तीसगढ़ में हरतालिका तीज का यह पावन पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि यह बेटियों के अपने मायके लौटने, परिवार के साथ जुड़ने और पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपराओं को सहेजने का एक बेहद खास अवसर होता है। देवों के देव महादेव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित यह उत्सव महिलाओं के लिए सबसे कठिन व्रतों में शुमार किया जाता है, जहां सुहागिनें अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र और घर-परिवार में सुख-समृद्धि के लिए पूरे चौबीस घंटे से भी ज्यादा समय तक बिना अन्न और जल के निर्जला उपवास रखती हैं। राज्य के ग्रामीण अंचलों से लेकर महानगरों तक इस पर्व का एक अलग ही उत्साह और अनूठा सांस्कृतिक स्वरूप देखने को मिलता है, जिसकी शुरुआत कड़ू भात से होती है और भगवान शिव-पार्वती की पूजा के साथ-साथ गौर-गौरी की प्रतीक मूर्तियों के विसर्जन के उपरांत व्रत का समापन होता है। बिलासपुर के वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ. सोमनाथ यादव ने इस पर्व से जुड़ी तमाम प्राचीन परंपराओं और इसके गहरे सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला है।
कड़ू भात खाने के साथ शुरू होती है व्रत की शुरुआत
डॉ. सोमनाथ यादव के अनुसार हरतालिका तीज का यह उत्सव लगभग तीन दिनों तक चलने वाले विभिन्न संस्कारों और अनुष्ठानों से जुड़ा हुआ है। इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत व्रत के पहले दिन की रात में कड़ू भात खाने के साथ होती है, जिसमें विशेष रूप से करेला यानी कड़ू की सब्जी का सेवन किया जाता है। इस पारंपरिक भोजन के ग्रहण करने के बाद महिलाएं अपने कड़े निर्जला उपवास का संकल्प लेती हैं, जो अगले पूरे दिन से शुरू होकर ठीक तीसरे दिन सुबह विधि-विधान से पूजा संपन्न होने तक अनवरत जारी रहता है।
चौबीस घंटे से अधिक का कठिन निर्जला उपवास और शिव-पार्वती की उपासना
इस पूरे पर्व का सबसे चुनौतीपूर्ण और कठिन पहलू महिलाओं द्वारा रखा जाने वाला निर्जला उपवास है, जिसमें वे पूरे दिन और रात एक बूंद पानी भी ग्रहण नहीं करती हैं। रात्रि के समय महिलाएं एकत्र होकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूरी निष्ठा के साथ पूजा-अर्चना करती हैं, और यह धार्मिक अनुष्ठान कई इलाकों में आधी रात तक चलता रहता है। इसके अगले दिन सुबह करीब 4 से 5 बजे के बीच पूजा की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद महिलाएं किसी नजदीकी नदी या तालाब के घाट पर जाती हैं, जहां वे पूजा सामग्री के साथ-साथ गौर-गौरी की प्रतीक मूर्तियों का विसर्जन करती हैं।
फलाहार और खट्टे व्यंजनों के साथ खुलता है व्रत
जल स्रोतों पर मूर्तियों के विसर्जन की प्रक्रिया पूरी करने के पश्चात महिलाएं अपने घरों को लौटती हैं और सबसे पहले फलाहार ग्रहण करती हैं। इस दौरान कई घरों में सिंघाड़े का कतरा, तिखुर का कतरा या अन्य पारंपरिक फलाहार विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं, जिन्हें खाकर महिलाएं अपनी थकान मिटाती हैं। इसके बाद दोपहर के समय मुख्य भोजन पकाया जाता है, जिसमें छत्तीसगढ़ी घरों में खास तौर पर खट्टी सब्जी और कढ़ी के साथ चावल यानी भात बनाने की परंपरा है। इसी विशेष भोजन को ग्रहण करने के बाद महिलाएं अपना यह कठिन निर्जला व्रत खोलती हैं और भोजन का आनंद लेती हैं।
बेटियों को ससुराल से मायके बुलाने की अनूठी सामाजिक परंपरा
छत्तीसगढ़ की इस लोक संस्कृति में तीजा का एक बेहद अहम सामाजिक पहलू भी है, जो बेटी और उसके मायके के बीच के मधुर संबंधों को गहराई से जोड़ता है। विवाह के पश्चात अपनी ससुराल जा चुकी बेटी को इस पर्व को मनाने के लिए विशेष तौर पर मायके आमंत्रित करने की पुरानी परिपाटी चली आ रही है। मायके पक्ष के अन्य सगे-सम्बन्धी भी बेटी को अपने घर दावत पर बुलाते हैं, उसका आदर-सत्कार करते हैं और अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार नए वस्त्र, सुंदर उपहार या नकदी देकर उसका मान बढ़ाते हैं।
राखी से लेकर तीजा तक मायके में ही रहती थीं बेटियां
डॉ. सोमनाथ यादव बताते हैं कि बीते हुए पुराने दौर में रक्षाबंधन के पावन अवसर पर भाई या पिता अपनी बहन अथवा बेटी को उसकी ससुराल से ससम्मान मायके लेकर आते थे। इसके बाद राखी और तीजा दोनों ही बड़े पर्व मायके में ही मनाए जाते थे और तीजा संपन्न होने के लगभग एक सप्ताह बाद ही बेटी की विदाई वापस ससुराल के लिए होती थी। हालांकि, आधुनिक समय के बदलाव और इस भागदौड़ भरी जीवनशैली के कारण अब यह परंपरा कई परिवारों और क्षेत्रों में सिमटकर केवल एक-दो दिन या अधिकतम तीन दिनों तक ही सीमित रह गई है।
पारंपरिक पकवान खुरमी और ठेठरी की मिठास
तीजा के इस खास मौके पर छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजन और पकवान भी लोगों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र होते हैं, जिनमें खुरमी और ठेठरी का अपना एक अलग ही विशेष महत्व है। खुरमी को मुख्य रूप से गेहूं के आटे और गुड़ की चाशनी को आपस में मिलाकर गूंथने के बाद तलकर तैयार किया जाता है, जो खाने में बेहद स्वादिष्ट होती है। वहीं दूसरी ओर, ठेठरी एक नमकीन पकवान है जिसे मैदे और बेसन के मिश्रण से तैयार किया जाता है। इन सभी पारंपरिक पकवानों को सबसे पहले भगवान को अर्पित की जाने वाली पूजा की थाली में सजाया जाता है और पूजा के बाद इन्हें रिश्तेदारों, बेटियों तथा घर आने वाले मेहमानों में बांटा जाता है.
महीनों तक सुरक्षित रखे जाते थे पारंपरिक नाश्ते
बीते पुराने समय में इन पारंपरिक पकवानों जैसे खुरमी और ठेठरी को बहुत लंबी अवधि तक सुरक्षित बनाए रखने की अद्भुत परंपरा हुआ करती थी। परिवार की बुजुर्ग महिलाएं इन्हें बड़े-बड़े पीपों या बर्तनों में संभालकर रखती थीं, ताकि आने वाले कई महीनों तक इन्हें सुबह-शाम के नाश्ते के रूप में खाया जा सके। हालांकि आज के इस दौर में बढ़ते शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण यह प्राचीन संस्कृति धीरे-धीरे कम जरूर होती जा रही है, लेकिन ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों में आज भी यह परंपराएं अपनी पूरी जीवंतता के साथ कायम हैं।
विभिन्न राज्यों में अलग-अलग पकवानों से मनाए जाने वाले तीज पर्व
यह हरतालिका तीज का पर्व केवल छत्तीसगढ़ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में भी इसे पूरी आस्था के साथ मनाया जाता है। देश के इन अलग-अलग राज्यों में स्थानीय लोक परंपराओं के अनुसार बनाए जाने वाले पकवानों में भी काफी विविधता देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए, राजस्थान में घेवर जैसे पकवान विशेष रूप से खाए जाते हैं, हरियाणा और पंजाब में स्वादिष्ट खीर बनाई जाती है, जबकि बिहार तथा उसके आसपास के कुछ अन्य क्षेत्रों में सत्तू से बने विभिन्न प्रकार के पकवानों के सेवन की परंपरा है।
सुहागिनों द्वारा पति की दीर्घायु और पारिवारिक सुख-शांति की कामना
हरतालिका तीज मूल रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की सच्ची आराधना और उपासना का पावन पर्व है, जिसमें महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और अपने दांपत्य जीवन में हमेशा खुशहाली बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखा जाए तो यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मायके, भाइयों, बेटियों और तमाम रिश्तेदारों के बीच आपसी प्रेम, आदर और सौहार्द के रिश्ते को भी मजबूती प्रदान करता है। यही मुख्य वजह है कि तीजा आज भी छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति, सभ्यता और पारिवारिक मूल्यों का एक अनिवार्य और महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।





















