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दौसा के आलूदा में मौजूद ऐतिहासिक कुबानिया बावड़ी, उपेक्षा के चलते जर्जर होने को मजबूरराजस्थान
30 अग॰ 2026, 8:47 am (26 दिन पहले)· 3

दौसा के आलूदा में मौजूद ऐतिहासिक कुबानिया बावड़ी, उपेक्षा के चलते जर्जर होने को मजबूर

दौसा जिले के आलूदा कस्बे में स्थित प्राचीन कुबानिया बावड़ी अपनी अनूठी वास्तुकला और इतिहास के लिए जानी जाती है। प्रशासनिक उपेक्षा और संरक्षण के अभाव में यह अनमोल धरोहर लगातार जर्जर हो रही है।

राजस्थान के दौसा जिले के अंतर्गत आने वाले आलूदा कस्बे में एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है जो अपने भीतर प्राचीन वास्तुकला और गौरवशाली अतीत के कई राज समेटे हुए है। इस इलाके में स्थित कुबानिया बावड़ी अपने समय में जल संरक्षण का एक बेहद मजबूत और खास केंद्र हुआ करती थी। इस प्राचीन रचना की बनावट और इसका इतिहास आज भी इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति की गवाही देता है।

यह बावड़ी आलूदा गांव के मुख्य प्रवेश द्वार के पास ही बनी हुई है और इसकी संरचना अपने आप में बेहद अनोखी है। उपलब्ध जानकारियों के अनुसार इस प्राचीन बावड़ी में कुल सात खाने बने हुए हैं और इसके ऊपरी हिस्से पर एक बड़ा गुंबद भी स्थापित है। इसके अलावा इस परिसर में मौजूद कुबानिया कुण्ड भी ऐतिहासिक तौर पर काफी अहम माना जाता है। इस जगह की भव्य बनावट और विशाल आकार आज भी यहां से गुजरने वाले राहगीरों के साथ-साथ इतिहास में रुचि रखने वाले पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है।

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कुंभानिया राजपूतों का इतिहास और जुड़ी हुई लोककथाएं

इतिहासकारों के तर्कों और स्थानीय लोगों की मान्यताओं के मुताबिक इस खास बावड़ी का नाम और इसका पुराना इतिहास यहां के प्राचीन शासकों के दौर से जुड़ा हुआ माना जाता है।

इतिहासकार सुआलाल तिवाड़ी के अनुसार पुराने समय में आलूदा और भांडारेज के इलाके में कुंभानिया राजपूतों का राज हुआ करता था। इन्हीं कुंभानिया राजपूतों के नाम के आधार पर और यहां बने कुण्ड की खास बनावट की वजह से इस जगह का नाम कुबानिया बावड़ी पड़ा।

इसके अलावा इस ऐतिहासिक संरचना को लेकर इलाके में कई तरह की लोककथाएं भी काफी मशहूर हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि दौसा की मशहूर चांद बावड़ी, भांडारेज की बावड़ी और आलूदा की यह कुबानिया बावड़ी तीनों एक ही रात के भीतर बनकर तैयार हुई थीं।

इन कहानियों में यह बात भी कही जाती है कि ये सभी बावड़ियां आपस में किसी गुप्त सुरंग के माध्यम से जुड़ी हुई थीं, हालांकि इतिहासकार इन बातों को ऐतिहासिक सच्चाई के बजाय केवल स्थानीय किंवदंतियां ही मानते हैं।

मरम्मत की सख्त जरूरत और पर्यटन स्थल बनने की संभावनाएं

उचित देखभाल और रखरखाव के न होने के कारण यह अनमोल ऐतिहासिक धरोहर समय बीतने के साथ लगातार कमजोर होती जा रही है और इसकी हालत बिगड़ती जा रही है। इस बावड़ी के चारों तरफ सुरक्षा के लिए कोई दीवार नहीं है और इसके कई हिस्से जर्जर हो चुके हैं, जिससे यहां किसी भी समय अनहोनी या हादसे का खतरा बना रहता है।

बीते समय में प्रशासन की तरफ से इस बावड़ी की साफ-सफाई को लेकर कुछ प्रयास किए गए थे, जिसके बाद स्थानीय ग्रामीणों ने यहां सुरक्षा के लिए रेलिंग लगाने और इसका पक्का जीर्णोद्धार कराने की मांग उठाई थी। इस क्षेत्र के लोगों का मानना है कि यदि जिला प्रशासन और पुरातत्व विभाग मिलकर इस बावड़ी का समुचित संरक्षण, मरम्मत और सौंदर्यीकरण का काम करवाएं, तो आलूदा की यह बावड़ी दौसा के सबसे बड़े पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकती है। यह प्राचीन धरोहर आने वाली पीढ़ियों के सामने राजस्थान की पारंपरिक जल सरंक्षण शैली की एक बेहतरीन मिसाल पेश कर सकती है।

सवाल-जवाब

कुबानिया बावड़ी कहां स्थित है?
कुबानिया बावड़ी राजस्थान के दौसा जिले के आलूदा कस्बे के मुख्य प्रवेश मार्ग पर स्थित है।
इस बावड़ी का नाम कुबानिया क्यों पड़ा?
इतिहासकार सुआलाल तिवाड़ी के अनुसार प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर कुंभानिया राजपूतों का शासन था, जिनके नाम और यहां बने कुण्ड की बनावट पर इसका नाम पड़ा।
इस बावड़ी की वास्तुकला की क्या विशेषता है?
इस बावड़ी में सात खाने बने हुए हैं और इसके ऊपर एक विशाल गुंबदनुमा संरचना का निर्माण किया गया है।
इस बावड़ी से जुड़ी कौन सी स्थानीय लोककथा प्रचलित है?
मान्यता है कि दौसा की चांद बावड़ी, भांडारेज की बावड़ी और आलूदा की यह कुबानिया बावड़ी एक ही रात में बनाई गई थीं।
स्थानीय निवासी प्रशासन से क्या मांग कर रहे हैं?
ग्रामीण इस बावड़ी का संरक्षण, जीर्णोद्धार, सौंदर्यीकरण और सुरक्षा के लिए रेलिंग लगाने की मांग कर रहे हैं।
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