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दिल्ली के 5 तीस जनवरी मार्ग पर गांधी स्मृति कैसे संजोए है महात्मा गांधी के अंतिम 144 दिनों का इतिहासभारत
1 अक्तू॰ 2026, 3:37 pm (29 दिन पहले)· 1

दिल्ली के 5 तीस जनवरी मार्ग पर गांधी स्मृति कैसे संजोए है महात्मा गांधी के अंतिम 144 दिनों का इतिहास

नई दिल्ली स्थित पूर्व बिड़ला हाउस यानी गांधी स्मृति में महात्मा गांधी के अंतिम 144 दिनों से जुड़ी वस्तुओं, उनके निवास कक्ष, प्रार्थना स्थल और शहीद स्तंभ को आज भी पूरी गरिमा के साथ सुरक्षित रखा गया है।

देश की राजधानी नई दिल्ली में 5, तीस जनवरी मार्ग पर स्थित गांधी स्मृति इतिहास के अत्यंत संवेदनशील और निर्णायक कालखंड को अपने भीतर संजोए हुए है। पहले बिड़ला हाउस के रूप में जानी जाने वाली यह ऐतिहासिक इमारत उस दौर की मूक गवाह है जब महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता के उपरांत अपने जीवन के अंतिम 144 दिन यहीं गुजारे थे। 9 सितंबर 1947 से लेकर 30 जनवरी 1948 तक महात्मा गांधी इसी परिसर में ठहरे थे। इसी परिसर में 30 जनवरी को प्रार्थना सभा में जाते समय उनकी हत्या कर दी गई थी। आज इस पूरे भूभाग को एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है, जहाँ पहुंचकर इतिहास की इन घटनाओं को अत्यंत निकटता से अनुभव किया जा सकता है।

प्रवेश द्वार पर स्थापित प्रतिमा और सादगी का संदेश

गांधी स्मृति परिसर में कदम रखते ही आंगतुक का ध्यान एक विशाल और भावपूर्ण प्रतिमा की ओर जाता है। इस शिल्पकृति में महात्मा गांधी के साथ एक बालक और एक बालिका को कबूतर थामे हुए दिखाया गया है, जो शांति और सौहार्द का स्पष्ट संदेश देता है। इस प्रतिमा के आधार पर गांधी जी का प्रसिद्ध उद्धरण माय लाइफ इज माय मैसेज (मेरा जीवन ही मेरा संदेश है) अंकित है। परिसर के प्रवेश पर ही मौजूद यह दृश्य यहाँ आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को महात्मा गांधी के सिद्धांतों, उनकी जीवन शैली और उनके विचारों के गहरे प्रभाव से जोड़ देता है।

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सादगी से सुसज्जित अंतिम निवास कक्ष

इस पूरे परिसर का सबसे मार्मिक केंद्र वह कमरा है जहाँ महात्मा गांधी अपने अंतिम दिनों के दौरान निवास करते थे। इस कक्ष को जनवरी 1948 की मूल स्थिति के अनुसार ही अत्यंत सावधानी से संरक्षित रखा गया है। यहाँ फर्श पर बिछा साधारण गद्दा और उसके निकट रखी छोटी लकड़ी की मेज उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली को उजागर करती है। कक्ष में गांधी जी का चश्मा, उनकी लकड़ी की छड़ी, भोजन के लिए प्रयुक्त होने वाले चाकू, कांटा और चम्मच के साथ-साथ अन्य दैनिक वस्तुएं मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ उनके द्वारा अध्ययन की जाने वाली पवित्र गीता भी सुरक्षित रखी गई है। यह कमरा किसी पारंपरिक संग्रहालय दीर्घा की तरह नहीं, बल्कि महात्मा गांधी के उस समय के रोजमर्रा के जीवन का सजीव खाका प्रस्तुत करता है।

144 दिनों के घटनाक्रम को दर्शाती फोटो प्रदर्शनी

गांधी स्मृति में एक विस्तृत भाग विशेष रूप से महात्मा गांधी के जीवन के आखिरी 144 दिनों के पूरे घटनाक्रम को समर्पित किया गया है। उनके निवास कक्ष की ओर जाने वाली दीर्घा में उनकी शांति यात्राओं और उनके बलिदान से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण दस्तावेज और विवरण संकलित हैं। इसके आगे स्थापित विस्तृत फोटो प्रदर्शनी में 9 सितंबर 1947 से लेकर 30 जनवरी 1948 के बीच घटी घटनाओं को क्रमिक रूप से प्रदर्शित किया गया है। इस प्रदर्शनी में तत्कालीन प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और संस्मरण भी शामिल किए गए हैं। इन छायाचित्रों और विवरणों के माध्यम से दर्शक उस दौर में दिल्ली और संपूर्ण देश के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण की गंभीरता को गहराई से समझ सकते हैं।

दैनिक प्रार्थना स्थल, लाल बलुआ पत्थर की बेंच और शहीद स्तंभ

परिसर का खुला प्रार्थना स्थल गांधी स्मृति का दूसरा अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। महात्मा गांधी यहाँ आयोजित होने वाली दैनिक प्रार्थना सभाओं में नियमपूर्वक सम्मिलित होते थे और जनसंवाद करते थे। प्रार्थना स्थल के समीप लाल बलुआ पत्थर से बनी एक ऐतिहासिक बेंच रखी गई है। आधिकारिक ब्योरे के अनुसार, गांधी जी प्रार्थना के दौरान अथवा लोगों से चर्चा करते समय इसी बेंच पर बैठा करते थे।

इसी प्रार्थना स्थल के रास्ते पर वह शहीद स्तंभ स्थित है, जो उस विशिष्ट स्थल को चिह्नित करता है जहाँ 30 जनवरी 1948 की शाम को महात्मा गांधी की हत्या की गई थी। इस शहीद स्तंभ के चारों ओर आगंतुकों और श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धासुमन अर्पित करने हेतु एक गरिमामय स्थान निर्मित किया गया है, जहाँ लोग नतमस्तक होकर उन्हें याद करते हैं।

मल्टीमीडिया दीर्घा और राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा

गांधी स्मृति केवल ऐतिहासिक वस्तुओं और छायाचित्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण शोध और ज्ञान केंद्र के रूप में विकसित है। यहाँ गांधी जी के बाल्यावस्था से लेकर उनके महात्मा बनने तक की संपूर्ण जीवन यात्रा को दर्शाने वाली कलाकृतियां, मूर्तियां, भित्तिचित्र और पेंटिंग्स प्रदर्शित हैं। इसके अलावा यहाँ आधुनिक तकनीक से सुसज्जित गांधी नाम की मल्टीमीडिया प्रदर्शनी भी स्थापित की गई है। इस प्रदर्शनी में डिजिटल माध्यमों के सहारे उनके सत्य, अहिंसा और नैतिक दर्शन को आज की पीढ़ी के समझने योग्य रूप में प्रस्तुत किया गया है।

लगभग पाँच एकड़ के विस्तृत क्षेत्र में फैले इस ऐतिहासिक स्थल को भारत सरकार ने वर्ष 1971 में अधिग्रहित किया था। अधिग्रहण के बाद इसे एक राष्ट्रीय स्मारक का स्वरूप दिया गया और 15 अगस्त 1973 को यह स्थल औपचारिक रूप से जनसामान्य के अवलोकनार्थ खोल दिया गया। आज यहाँ आने वाले लोग जिस मार्ग से गांधी जी अपने अंतिम क्षणों में प्रार्थना सभा की ओर बढ़े थे, उसी पदचिह्नों वाले पथ पर चलकर शहीद स्तंभ तक पहुंचते हैं और देश के इतिहास के एक भावुक अध्याय के साक्षी बनते हैं।

सवाल-जवाब

गांधी स्मृति नई दिल्ली में किस पते पर स्थित है?
गांधी स्मृति नई दिल्ली के 5, तीस जनवरी मार्ग पर स्थित है, जिसे पहले बिड़ला हाउस के नाम से जाना जाता था।
महात्मा गांधी ने यहाँ कुल कितने दिन बिताए थे?
महात्मा गांधी ने 9 सितंबर 1947 से 30 जनवरी 1948 तक अपने जीवन के आखिरी 144 दिन इस परिसर में बिताए थे।
गांधी जी के कमरे में उनकी कौन सी निजी चीजें सुरक्षित रखी गई हैं?
उनके कमरे में साधारण गद्दे, मेज, चश्मा, छड़ी, खाने के चम्मच-कांटा-चाकू और उनकी इस्तेमाल की हुई गीता को सुरक्षित रखा गया है।
परिसर में स्थित शहीद स्तंभ क्या दर्शाता है?
शहीद स्तंभ उस विशिष्ट स्थान को चिह्नित करता है जहाँ 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या की गई थी।
भारत सरकार ने इस परिसर का अधिग्रहण कब किया था और यह आम लोगों के लिए कब खुला?
भारत सरकार ने 1971 में इस परिसर का अधिग्रहण किया था और 15 अगस्त 1973 को इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया था।
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टिप्पणियाँ 5

Amit Patel@amit-patel·28 दिन पहले

यहाँ आकर उस कमरे को देखना दिल को छू लेता है। इतिहास को इतने करीब से महसूस करना वाकई अलग अनुभव है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·28 दिन पहले

यहाँ जाने पर वह कमरा और जमीन पर बिछा गद्दा देखकर हमेशा एक अजीब सी शांति और भारीपन सा महसूस होता है। ऐसा लगता है जैसे इतिहास की कोई बहुत बड़ी किताब अचानक खुली छूट गई हो।

Sandeep Yadav@sandeep-yadav·28 दिन पहले

अर्जुन, बिल्कुल सही कहा आपने। वहाँ वह छड़ी और चश्मा देखकर सचमुच खेल के मैदान जैसा भारी सन्नाटा छा जाता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·28 दिन पहले

तीस जनवरी मार्ग पर इस जगह जाना वाकई दिल को झकझोर देता है। वहाँ रखी छड़ी और चश्मा देखकर लगता है जैसे बापू अभी यहीं आसपास ही हैं। क्या आज भी वहाँ आने वाले लोग उस शांति को महसूस कर पाते हैं जिसकी वो हमेशा बात करते थे?

Rohan Verma@rohan-verma·28 दिन पहले

करण, बात तो सही है तुम्हारी, पर आज की भीड़भाड़ और शोर में वो शांति ढूँढना उतना आसान भी नहीं रहा जितना हम सोचते हैं।

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