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डीआरडीओ की मिसाइल तकनीक निजी कंपनियों को सौंपेंगे राजनाथ सिंह, वैश्विक युद्धों से सबक सीखकर भारत ने बदली रक्षा रणनीतिभारत
27 अग॰ 2026, 11:32 am (35 दिन पहले)· 2

डीआरडीओ की मिसाइल तकनीक निजी कंपनियों को सौंपेंगे राजनाथ सिंह, वैश्विक युद्धों से सबक सीखकर भारत ने बदली रक्षा रणनीति

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ द्वारा विकसित सभी पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक भारतीय निजी उद्योग को ट्रांसफर करने की मंजूरी दी है। इस ऐतिहासिक कदम का उद्देश्य लंबे संघर्षों के दौरान देश की मिसाइल आपूर्ति और त्वरित उत्पादन क्षमता को मजबूत करना है।

भारत सरकार ने देश के रक्षा क्षेत्र की रणनीतिक आत्मनिर्भरता को नए आयाम देने के उद्देश्य से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला लिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ की तरफ से विकसित की गई सभी पारंपरिक (कन्वेंशनल) मिसाइल प्रणालियों की तकनीक को भारतीय निजी कंपनियों को सौंपने की हरी झंडी दे दी है। यह फैसला टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) प्रक्रिया के जरिए लागू किया जाएगा। प्रथम दृष्टया यह कदम केवल निजी उद्योग को मिसाइल निर्माण के मैदान में उतारने जैसा प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपी रणनीतिक सोच भारत की मिसाइल पुनूर्पूर्ति (रिप्लेनिशमेंट) और त्वरित उत्पादन क्षमता (सर्ज प्रोडक्शन कैपेसिटी) को अभूतपूर्व मजबूती प्रदान करने वाली है।

लंबे युद्धों की बदलती सच्चाई और भारत का रणनीतिक दृष्टिकोण

हाल के वर्षों में वैश्विक पटल पर उभरे सैन्य संघर्षों ने पारंपरिक युद्ध नीतियों को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। आधुनिक समय के सैन्य टकराव अब कुछ दिनों या हफ्तों में समाप्त होने वाले नहीं रहे हैं। यूरोप से लेकर मध्य पूर्व तक फैले युद्धों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध की अवधि खिंचने पर केवल शुरुआती हथियारों का भंडार काम नहीं आता। ऐसे लंबे संघर्षों में जीत और हार का अंतर इस बात से तय होता है कि कोई देश युद्ध के दौरान अपने नष्ट हुए या इस्तेमाल किए गए अत्याधुनिक हथियारों की कितनी तेजी से भरपाई कर पाता है।

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इसी उभरती हुई वैश्विक चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों की प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन किया है। अब मुख्य सवाल यह नहीं रह गया है कि देश के पास अपनी रक्षा प्रणाली में कुल कितनी मिसाइलें जमा हैं। इसके बजाय असली चुनौती यह है कि अगर किसी बड़े क्षेत्रीय या वैश्विक संघर्ष के दौरान मिसाइलों की खपत अचानक बहुत तेजी से बढ़ जाती है, तो हमारी औद्योगिक संरचना कितनी जल्दी उनका नया जखीरा तैयार कर सकती है। डीआरडीओ और निजी क्षेत्र की यह साझेदारी इसी सैन्य आवश्यकता का स्थाई समाधान प्रस्तुत करती है।

युद्ध के दौरान भंडार से ज्यादा निर्णायक है उत्पादन क्षमता

किसी भी व्यापक सैन्य संघर्ष के दौरान सतह से सतह, सतह से हवा में मार करने वाली, एंटी-शिप और लंबी दूरी की स्ट्राइक मिसाइलों की खपत अनुमान से कहीं अधिक तेजी से होती है। युद्ध की शुरुआत से पहले तैयार किया गया वॉर रिजर्व या गोला-बारूद का आपातकालीन स्टॉक एक निश्चित सीमा तक ही साथ दे पाता है। जैसे-जैसे संघर्ष लंबा खींचता है, सैन्य क्षमता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर हो जाती है कि देश अपनी विनिर्माण इकाइयों से कितनी जल्दी नई मिसाइलें अग्रिम मोर्चों तक भेज सकता है।

डीआरडीओ की उन्नत तकनीक को निजी रक्षा उद्योग के हाथों में सौंपने का निर्णय भारत के डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस को कई गुना व्यापक बनाएगा। जब देश की अनेक प्रतिष्ठित निजी कंपनियां अलग-अलग मिसाइल प्रणालियों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने में सक्षम होंगी, तो आवश्यकता पड़ने पर कुल राष्ट्रीय उत्पादन को रातों-रात बढ़ाया जा सकेगा। यह संरचनात्मक बदलाव भारत को किसी भी आपात स्थिति में रणनीतिक बढ़त दिलाएगा और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाओं को दूर करेगा।

अमेरिका और ईरान संघर्ष से सामने आए गंभीर सबक

वर्ष 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच हुए सैन्य टकराव ने दुनिया के सबसे ताकतवर देशों की मिसाइल आपूर्ति प्रणाली की कमजोरियों को उजागर कर दिया था। उस संघर्ष के दौरान अमेरिकी सेना ने इजराइल की मिसाइल रक्षा प्रणाली को सहारा देने के लिए अभूतपूर्व पैमाने पर अपने इंटरसेप्टर्स तैनात किए थे। पेंटागन के प्रामाणिक आकलन के अनुसार, उस दौरान अमेरिकी सेना ने 200 से अधिक THAAD इंटरसेप्टर्स और 100 से अधिक SM-3 तथा SM-6 मिसाइलों का उपयोग कर डाला। यह आंकड़ा अमेरिका के कुल THAAD इन्वेंट्री के लगभग आधे हिस्से के बराबर था।

इसके तुरंत बाद अमेरिकी रक्षा हलकों में अपने महत्वपूर्ण मिसाइल भंडारों की स्थिति को लेकर चिंता की लहर दौड़ गई। अगस्त 2026 में सामने आई विस्तृत समीक्षाओं में यह स्पष्ट हुआ कि अमेरिका को अपने अति-महत्वपूर्ण मिसाइल-इंटरसेप्टर स्टॉक का 80 प्रतिशत तक हिस्सा इस्तेमाल करना पड़ा था, जिससे उसकी पैट्रियट मिसाइल इन्वेंट्री पर भी अत्यधिक दबाव आ गया था। यद्यपि अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने भंडारों के खतरनाक रूप से कम होने के दावों को खारिज किया था, लेकिन इस घटनाक्रम ने दुनिया को यह सिखा दिया कि दुश्मन के बड़े मिसाइल हमलों का मुकाबला करने के लिए केवल इंटरसेप्टर की संख्या काफी नहीं है, बल्कि उनकी निरंतर विनिर्माण क्षमता होना अत्यंत आवश्यक है।

रूस और यूक्रेन युद्ध से मिला मिसाइल किल्लत का दूसरा बड़ा संदेश

रूस और यूक्रेन के बीच जारी दीर्घकालिक युद्ध भी मिसाइल आपूर्ति की इस समस्या का एक ज्वलंत उदाहरण बनकर सामने आया है। इस युद्ध में रूस ने लगातार भारी मात्रा में क्रूज, बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों से हमले किए। इसके जवाब में यूक्रेन की सबसे बड़ी लाचारी यह रही कि उसके पास पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों की उपलब्धता बेहद सीमित थी, जिससे उसका एयर डिफेंस तंत्र दबाव में आ गया।

अगस्त 2026 में सामने आई स्थिति के अनुसार, यूक्रेन को पैट्रियट इंटरसेप्टर की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा था। 20 अगस्त 2026 को हुए एक बड़े रूसी मिसाइल हमले के दौरान यूक्रेन ने रूस की 44 में से 39 क्रूज मिसाइलों को तो हवा में ही नष्ट कर दिया, लेकिन बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने में उसकी क्षमता पूरी तरह लाचार साबित हुई। उस पूरे महीने में यूक्रेन की सेना केवल 1 बैलिस्टिक मिसाइल को ही इंटरसेप्ट करने में सफल हो सकी थी। इसके विपरीत, रूस ने अपनी घरेलू रक्षा विनिर्माण क्षमता को काफी बढ़ा लिया था। यूक्रेनी सैन्य खुफिया तंत्र के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2026 में रूस की प्रमुख मिसाइल प्रणालियों का मासिक उत्पादन उनके निर्धारित लक्ष्य से 10 से 20 प्रतिशत अधिक गति से चल रहा था।

सिंगल सप्लायर मॉडल से मल्टी-सेंटर मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क की ओर

भारत में अब तक मिसाइल निर्माण और आपूर्ति का पूरा दारोमदार केवल सरकारी उपक्रमों और कुछ चुनिंदा रक्षा एजेंसियों पर ही केंद्रित रहा था। हालांकि निजी क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में कलपुर्जों के निर्माण में आगे आया था, परंतु संपूर्ण मिसाइल प्रणाली के निर्माण में उसकी भूमिका सीमित थी। राजनाथ सिंह द्वारा लिया गया यह ताजा फैसला इस स्थिति को पूरी तरह बदल देगा।

एक से अधिक उत्पादन केंद्र होने का सबसे बड़ा रणनीतिक फायदा यह होता है कि युद्ध के दौरान यदि किसी एक कारखाने पर हमला होता है, कोई तकनीकी खराबी आती है या फिर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, तो भी देश का कुल मिसाइल उत्पादन ठप नहीं होता। यह बहु-केंद्रीय मॉडल भारत की रक्षा उत्पादन प्रणाली को अभेद्य लचीलापन (रेजिलिएंस) प्रदान करता है। भारत अब पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर उस दिशा में कदम बढ़ा रहा है जहां ध्यान सिर्फ हथियारों की मौजूदा संख्या पर नहीं, बल्कि उनके नए निर्माण की गति पर केंद्रित है।

डीआरडीओ और निजी उद्योग का नया कार्य-विभाजन

इस नई नीति के तहत डीआरडीओ अपनी प्रयोगशालाओं में तैयार की गई उन्नत मिसाइल प्रौद्योगिकियों का पूर्ण विवरण और निर्माण प्रक्रिया योग्य भारतीय निजी कंपनियों को हस्तांतरित करेगा। निजी कंपनियां निर्धारित कड़े गुणवत्ता मानकों और नियामक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए अपनी विनिर्माण इकाइयों में इन मिसाइलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करेंगी।

इस साझेदारी से दोनों पक्षों की भूमिकाएं स्पष्ट और प्रभावी हो जाएंगी। डीआरडीओ का मुख्य ध्यान अनुसंधान, विकास और अगली पीढ़ी की उन्नत तकनीकों को तैयार करने पर केंद्रित रहेगा। दूसरी ओर, निजी उद्योग अपनी विनिर्माण दक्षता, बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की क्षमता और आधुनिक सप्लाई चेन प्रबंधन पर ध्यान लगाएगा। यह तालमेल भारत को एक आत्मनिर्भर और टिकाऊ सैन्य शक्ति बनाने की दिशा में निर्णायक सिद्ध होगा।

सवाल-जवाब

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किस बड़े फैसले को मंजूरी दी है?
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ द्वारा विकसित सभी पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक (ToT) को भारतीय निजी कंपनियों को ट्रांसफर करने की मंजूरी दी है।
इस फैसले से भारत की रक्षा क्षमता पर क्या असर पड़ेगा?
इस कदम से भारत की मिसाइल पुनूर्पूर्ति क्षमता मजबूत होगी और लंबे युद्ध के दौरान हथियारों का तेजी से उत्पादन (सर्ज प्रोडक्शन) संभव हो सकेगा।
वर्ष 2026 के अमेरिका-ईरान युद्ध से भारत ने क्या सबक लिया?
उस युद्ध में अमेरिका ने 200 से अधिक THAAD और 100 से अधिक SM-3/SM-6 इंटरसेप्टर खर्च किए, जिससे उसका 80% तक स्टॉक खत्म हो गया। इससे साबित हुआ कि मिसाइल उत्पादन क्षमता होना अनिवार्य है।
अगस्त 2026 में यूक्रेन को किस बड़ी रक्षा चुनौती का सामना करना पड़ा?
अगस्त 2026 में यूक्रेन को पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों की भारी कमी का सामना करना पड़ा, जिससे 20 अगस्त के हमले में वह केवल 1 बैलिस्टिक मिसाइल ही रोक पाया था।
डीआरडीओ और निजी कंपनियों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा कैसे होगा?
डीआरडीओ का मुख्य ध्यान नए अनुसंधान, विकास और अगली पीढ़ी की तकनीकों पर रहेगा, जबकि निजी उद्योग बड़े पैमाने पर मिसाइल निर्माण और सप्लाई चेन पर ध्यान देगा।
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