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दिल्‍ली के प्रदूषण से निपटने के लिए CAQM ने ISRO से की खास मांग, पराली पर लगेगी लगामभारत
5 सित॰ 2026, 9:48 am (26 दिन पहले)· 2

दिल्‍ली के प्रदूषण से निपटने के लिए CAQM ने ISRO से की खास मांग, पराली पर लगेगी लगाम

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने इसरो से सैटेलाइट आधारित मॉडल को बेहतर बनाने का अनुरोध किया है ताकि खेतों में लगने वाली आग का सटीक आकलन किया जा सके।

सर्दियां आते ही राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हवा की सेहत बिगड़नी शुरू हो जाती है और वायु प्रदूषण एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आता है। इस संकट से निपटने के लिए तमाम प्रयास किए जाते हैं लेकिन स्थिति पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाती है। अब वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग यानी CAQM ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO से संपर्क किया है। आयोग चाहता है कि अंतरिक्ष आधारित निगरानी तकनीक में सुधार किया जाए ताकि खेतों में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं का सटीक और बेहतर ब्‍योरा मिल सके। इस तकनीकी सुधार से अधिकारियों को जमीनी स्तर पर लक्षित कार्रवाई करने में आसानी होगी।

क्यों जरूरी है सैटेलाइट मॉडल में सुधार

CAQM के अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान निगरानी तंत्र बड़े पैमाने पर लगने वाली आग और छोटे स्‍थानीय अग्निकांडों के बीच बारीक अंतर करने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। इस कमी के कारण प्रदूषण में पराली के धुएं की वास्तविक हिस्सेदारी का सही अनुमान लगाने में मुश्किलें आती हैं। यदि आग की तीव्रता का सटीक आकलन हो जाए तो उसे कम, मध्‍यम और उच्‍च श्रेणियों में बांटकर उसी के मुताबिक नीतियां बनाई जा सकती हैं। पिछले सर्दी के मौसम के बाद से ही CAQM और ISRO के बीच इस तकनीकी अपग्रेड को लेकर बातचीत का सिलसिला चल रहा है।

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कैसे काम करता है मौजूदा निगरानी तंत्र

फसल अवशेष जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए ISRO ने अगस्‍त 2021 में राज्‍य रिमोट सेंसिंग केंद्रों और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान यानी IARI के साथ मिलकर एक साझा प्रोटोकॉल तैयार किया था। इसी मानक प्रणाली के तहत IARI की क्रिम्स लैब्‍स द्वारा पंजाब, हरियाणा, दिल्‍ली, उत्तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश और राजस्‍थान में रोजाना आग की घटनाओं के आंकड़े सार्वजनिक किए जाते हैं। हालांकि इस डेटा की सटीकता और समय को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

शाम के समय जलाई जाने वाली पराली का सच

कई अध्‍ययनों में यह बात सामने आई है कि किसान सैटेलाइट की नजर से बचने के लिए अक्‍सर शाम या रात के समय खेतों में आग लगाते हैं। सामान्‍यतया ध्रुवीय कक्षा में घूमने वाले सैटेलाइट सुबह साढ़े दस बजे से दोपहर डेढ़ बजे के बीच ही संबंधित क्षेत्रों के ऊपर से गुजरते हैं। इस समय सीमा के बाहर यानी बाद में जलाई जाने वाली पराली के मामले आधिकारिक आंकड़ों से छूट जाते हैं। इसी बड़ी तकनीकी खामी को पाटने के लिए CAQM ने पहली बार ड्रोन के इस्‍तेमाल को अनिवार्य बनाया है।

ड्रोन के जरिए होगी रियल टाइम निगरानी

बीते जुलाई महीने के अंत में जारी किए गए एसओपी के अनुसार पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्‍थान को आगामी सर्दियों के दौरान विशेष तौर पर संवेदनशील हॉटस्पॉट इलाकों में दोपहर तीन बजे से रात नौ बजे तक ड्रोन के माध्‍यम से रियल टाइम निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं। राज्‍यों से यह भी कहा गया है कि वे ड्रोन से रिकॉर्ड किए गए वीडियो फुटेज का एक केंद्रीय डेटाबेस तैयार करें और फसल कटाई का सीजन समाप्‍त होने के बाद कम से कम तीन महीने तक उस डेटा को सुरक्षित संभालकर रखें।

सैटेलाइट और ड्रोन डेटा का होगा मिलान

आयोग की योजना ड्रोन से मिलने वाले जमीनी आंकड़ों की तुलना सैटेलाइट द्वारा दर्ज किए गए जले हुए कुल क्षेत्रफल से करने की है। इस दोहरी जांच से आंकड़ों की विश्‍वसनीयता मजबूत होगी और प्रदूषण के स्रोतों का सही अनुमान लगाया जा सकेगा। दिल्‍ली-एनसीआर में हवा की गुणवत्‍ता आमतौर पर सितंबर के मध्‍य से गिरने लगती है और 15 सितंबर से 30 नवंबर के बीच का दौर पराली के लिहाज से सबसे अहम होता है। पिछले सर्दियों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पंजाब में 5114 और हरियाणा में 662 खेतों में आग लगने की घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि वर्ष 2024 में यह संख्‍या बढ़कर क्रमशः 10909 और 1406 हो गई थी।

सवाल-जवाब

CAQM ने ISRO से क्‍या आग्रह किया है?
CAQM ने ISRO से सैटेलाइट आधारित मॉडल में सुधार करने को कहा है ताकि खेतों में लगने वाली आग का अधिक सटीक आकलन किया जा सके।
पराली जलाने के आंकड़ों के लिए कौन सी संस्‍था जिम्‍मेदार है?
IARI की क्रिम्स लैब्‍स द्वारा पंजाब, हरियाणा, दिल्‍ली, उत्तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश और राजस्‍थान में रोजाना आग की घटनाओं के आंकड़े जारी किए जाते हैं।
सैटेलाइट निगरानी में क्‍या समस्‍या आती है?
ध्रुवीय कक्षा वाले सैटेलाइट सुबह 10:30 से दोपहर 1:30 बजे के बीच गुजरते हैं, जिससे शाम या देर रात जलाई जाने वाली पराली छूट जाती है।
ड्रोन से निगरानी का समय क्‍या तय किया गया है?
राज्‍यों को संवेदनशील हॉटस्पॉट क्षेत्रों में दोपहर 3 बजे से रात 9 बजे तक ड्रोन के जरिए रियल टाइम निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं।
वर्ष 2024 में पंजाब और हरियाणा में खेत में आग की कितनी घटनाएं दर्ज हुईं?
वर्ष 2024 में पंजाब में 10,909 और हरियाणा में 1,406 खेतों में आग की घटनाएं दर्ज की गईं।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·25 दिन पहले

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण का यह मामला केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था और नियामक निर्देशों के पालन से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। जब किसान प्रशासन की नजरों से बचने के लिए तय समय के बाहर पराली जलाते हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना है। CAQM द्वारा ISRO से तकनीकी अपग्रेड की मांग और ड्रोन आधारित निगरानी को अनिवार्य बनाना इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में प्रदूषण नियंत्रण कानूनों का उल्लंघन करने वालों पर कानूनी शिकंजा कसने के लिए एजेंसियां अधिक सख्त और डिजिटल रुख अपनाने जा रही हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·25 दिन पहले

सहकर्मी करण मल्होत्रा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह प्रशासनिक सख्ती अब आर्थिक और कॉरपोरेट जगत के लिए भी एक बड़ा संदेश है। जब प्रदूषण नियंत्रण के लिए अंतरिक्ष तकनीक और ड्रोन आधारित रियल-टाइम निगरानी को अनिवार्य बनाया जा रहा है, तो इससे कृषि अर्थव्यवस्था के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स, तकनीक आधारित स्टार्टअप्स और पर्यावरण अनुपालन बाजार पर भी सीधा असर पड़ेगा। आने वाले दिनों में डेटा-ड्रिवन रेगुलेशन केवल पराली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों में भी सख्त अनुपालन मानकों का आधार बनेगा, जिससे ग्रीन टेक और डिजिटल मॉनिटरिंग सॉल्यूशंस प्रदान करने वाले स्टार्टअप्स और तकनीकी कंपनियों के लिए निवेश के नए अवसर पैदा होंगे।

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