सीबीएसई 10वीं और 12वीं की समय सारणी जल्द, आधिकारिक पोर्टल पर घोषित होगा कार्यक्रमयूरो बनाम जापानी येन में 178 के नीचे नरमी, तकनीकी संकेतकों और ब्याज दरों पर टिकी नजरेंगाजीपुर के रेवतीपुर में मिट्टी देखकर करें फसलों का चयन, बीज सब्सिडी और ई-लॉटरी किट के नए नियम जारीनवजात शिशुओं में पीलिया होने पर धूप दिखाने की गलती न करें, डॉक्टर ने चेतायाहाथरस के सादाबाद में मकान में लगी भीषण आग, बुजुर्ग दंपती की जिंदा जलने से मौतबहराइच में गेहूं के डंठल से गढ़े गए लक्ष्मी-गणेश, पर्यावरण संरक्षण के साथ महिलाओं को मिला रोजगारगोली लगने से लहूलुहान युवती को बचाने मॉरीशस पहुंची भारतीय सर्जनों की टीम, सफल ऑपरेशन से लौटी सांसेंपटाखों के तेज धमाकों से फट सकता है कान का पर्दा, मेरठ मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विशेषज्ञ की बड़ी चेतावनीरिपल और स्टेलर में मंदी की पकड़ हुई ढीली, रिकवरी की राह पर आगे बढ़े टोकनदीपावली पर आतिशबाजी से भड़कने वाली आग पर काबू पाने को जोधपुर में 50 दमकलकर्मी तैनात, तीन हेल्पलाइन नंबर जारी
गाजीपुर के रेवतीपुर में मिट्टी देखकर करें फसलों का चयन, बीज सब्सिडी और ई-लॉटरी किट के नए नियम जारीभारत
5 नव॰ 2026, 11:36 am (6 मिनट पहले)· 1

गाजीपुर के रेवतीपुर में मिट्टी देखकर करें फसलों का चयन, बीज सब्सिडी और ई-लॉटरी किट के नए नियम जारी

रेवतीपुर के 14 मौजों में भिन्न मिट्टी संरचना के आधार पर आलू, मटर और दलहन-तिलहन की बुवाई की सलाह दी गई है, जहां नई बीज किस्मों पर अधिक अनुदान और मिनी किट का ई-लॉटरी आवंटन होगा।

खेती-किसानी में बंपर उपज हासिल करने के लिए केवल कठोर परिश्रम और सिंचाई के साधन जुटाना ही काफी नहीं होता, बल्कि सबसे बुनियादी जरूरत यह समझना है कि खेत की मिट्टी किस प्रकृति की है और उसके अनुकूल कौन सा बीज बेहतर साबित होगा। अक्सर देखा जाता है कि एक समूचे क्षेत्र अथवा विकासखंड के किसान बिना सोचे-समझे एक जैसी फसल और एक ही किस्म के बीज की बुवाई कर देते हैं, जबकि कुछ ही दूरी पर जमीन की भौतिक और रासायनिक बनावट बदल जाती है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के अंतर्गत आने वाले रेवतीपुर क्षेत्र में यह विविधता बहुत स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। यहां एक ही बड़े राजस्व गांव के अलग-अलग मौजों में भूमि की गुणवत्ता और उसकी संरचना में भारी भिन्नता दर्ज की गई है। इस जमीनी हकीकत को देखते हुए कृषि विशेषज्ञों ने बुवाई से ठीक पहले खेत की मिट्टी की जांच-परख करने और उसी के हिसाब से किस्मों का चयन करने पर विशेष बल दिया है।

14 मौजों की अलग बनावट और फसलों पर उनका प्रभाव

कृषि विभाग के तकनीकी सहायक प्रबंधक धीरज के अनुसार, रेवतीपुर गांव के दायरे में कुल 14 मौजे आते हैं और इन सभी मौजों की मिट्टी का मिजाज एक जैसा बिल्कुल नहीं है। कुछ मौजों में जहां उपजाऊ काली दोमट मिट्टी पाई जाती है, वहीं कई इलाकों में रेतीली यानी बलुई दोमट मिट्टी का फैलाव है। मिट्टी का यह अंतर सीधे तौर पर पौधों की जड़ों के विकास, उनकी वानस्पतिक बढ़वार और अंततः फसल की कुल पैदावार को तय करता है। जब किसान बिना जांचे-परखे किसी भी जमीन पर पारंपरिक फसलें लगा देते हैं, तो पैदावार पर विपरीत असर पड़ता है।

ये भी पढ़ें

काली दोमट मिट्टी की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि इसमें लंबे समय तक पानी और नमी को संजोए रखने की असाधारण क्षमता होती है। साथ ही यह मिट्टी पौधों को जरूरी पोषक तत्व सहजता से उपलब्ध कराने में सक्षम मानी जाती है। ऐसे अनुकूल वातावरण वाले क्षेत्रों में दलहन और तिलहन की खेती बहुत ही शानदार परिणाम देती है। इसके विपरीत, बलुई दोमट मिट्टी में पानी का ठहराव नहीं होता और जल निकासी बेहद तेजी से होती है। पानी के इस त्वरित निकास के कारण रेवतीपुर के संबंधित मौजों में किसान आलू की अगेती व मुख्य फसल लगाने को प्रमुखता देते हैं, जिससे कंदों का विकास सुगमता से हो सके।

मटर और आलू की बुवाई का स्थानीय संतुलन

रेवतीपुर के विस्तृत कृषि क्षेत्र में मटर की खेती बहुत बड़े पैमाने पर की जाती रही है और इसे इलाके की पहचान भी माना जाता है। कृषि तकनीकी सहायक धीरज बताते हैं कि यहां के विशिष्ट मौजों की मिट्टी मटर की खेती के लिए अत्यधिक मुफीद साबित होती है, जहां फलियों का भराव और गुणवत्ता दोनों उम्दा रहते हैं। वहीं दूसरी तरफ, बलुई दोमट संरचना वाले खेतों में किसान आलू की खेती को पहली पसंद मानते हैं। यह सीधा संकेत देता है कि एक ही गांव की सीमा में रहने वाले दो पड़ोसियों के लिए भी खेती की रणनीति बिल्कुल अलग हो सकती है, इसलिए दूसरों की देखा-देखी करने के बजाय अपने खेत की खासियतों को पहचानना ही समझदारी है।

दलहन-तिलहन को प्रोत्साहन और बीज वितरण की स्थिति

कृषि विभाग इस समय दलहनी फसलों जैसे मटर, चना और मसूर के साथ-साथ प्रमुख तिलहनी फसल सरसों के रकबे को बढ़ाने पर विशेष जोर दे रहा है। दलहनी फसलों की वैज्ञानिक विशेषता यह है कि इनकी जड़ों की ग्रंथियों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु सक्रिय होकर हवा की प्राकृतिक नाइट्रोजन को जमीन में स्थिर करते हैं, जिससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति में इजाफा होता है और यूरिया जैसे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है। दूसरी ओर, तिलहनी फसलों का विस्तार किसानों को खाद्य तेल उत्पादन से जोड़कर सीधे बाजार में बेहतर आर्थिक मुनाफा कमाने का जरिया देता है।

किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण इनपुट उपलब्ध कराने के लिए राजकीय कृषि गोदामों पर प्रमाणित बीजों का स्टॉक जुटाया गया है। तकनीकी सहायक प्रबंधक के अनुसार, विभाग के पास इस समय मटर, चना, मसूर और सरसों के उन्नत बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त रबी सीजन की मुख्य खाद्यान्न फसल गेहूं के प्रमाणित बीजों की आवक और वितरण का कार्य भी प्रारंभ कर दिया गया है, ताकि किसान समय रहते अपनी जरूरत के मुताबिक उठाव कर सकें।

नई व पुरानी किस्मों के अनुदान नियम और ई-लॉटरी किट

सरकारी नियमों के तहत बीज की किस्मों पर मिलने वाले आर्थिक अनुदान यानी सब्सिडी में भी स्पष्ट वर्गीकरण किया गया है। कृषि विभाग के स्पष्टीकरण के अनुसार, जो बीज किस्में 10 वर्ष से कम समय पहले अधिसूचित अथवा जारी की गई हैं, उन पर किसानों को अपेक्षाकृत अधिक सब्सिडी प्रदान की जाती है। इसका उद्देश्य हालिया वर्षों में विकसित नई, रोगरोधी और अधिक उपज देने वाली किस्मों को तेजी से खेतों तक पहुंचाना है। इसके उलट, जो किस्में 10 वर्ष से अधिक पुरानी हो चुकी हैं, उन पर मिलने वाली छूट की दर काफी कम रखी जाती है। हालांकि वास्तविक अनुदान की दरें संबंधित फसल, किस्म के वर्ग और संचालित राजकीय योजना के प्रावधानों के तहत अलग-अलग तय होती हैं।

इसके साथ ही छोटे और सीमांत किसानों की मदद के लिए विभाग की ओर से दलहनी फसलों जैसे चना, मटर और मसूर की मिनी किट भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। इस बार व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए इन मिनी किटों का वितरण पारदर्शी ई-लॉटरी प्रक्रिया के जरिए किया जा रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि केवल पोर्टल पर पंजीकरण कराने मात्र से हर किसान को किट मिलना तय नहीं होगा, बल्कि ऑनलाइन कम्प्यूटरीकृत लॉटरी में चयनित होने वाले किसानों को ही लाभ दिया जाएगा। कुछ बीजों की बिक्री जहां सब्सिडी काटकर की जाएगी, वहीं ई-लॉटरी में चयनित लाभार्थियों को मिनी किट पूर्णतः निशुल्क वितरित की जाएंगी।

बीज क्रय करते समय किसानों के लिए जरूरी सावधानियां

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को आगाह किया है कि वे बाजार या सरकारी केंद्र से बीज खरीदते समय केवल उसके प्रचार, सस्ती कीमत या किसी लोकप्रिय ब्रांड नाम के आधार पर फैसला न लें। खरीद से पहले अपने खेत की मिट्टी की गहराई, उसमें नमी रोकने की क्षमता, सिंचाई के उपलब्ध साधन, बुवाई का सही समय और मौसम के पूर्वानुमान का विश्लेषण बेहद जरूरी है। क्षेत्र के कृषि रक्षा विशेषज्ञों और तकनीकी सहायकों से व्यक्तिगत परामर्श लेकर अपने मौजे के अनुकूल प्रमाणित किस्मों का चयन करना ही लागत घटाने और उपज बढ़ाने का एकमात्र वैज्ञानिक मार्ग है।

सवाल-जवाब

रेवतीपुर में काली दोमट मिट्टी वाले खेतों के लिए कौन सी फसलें सबसे उपयुक्त हैं?
काली दोमट मिट्टी में नमी रोकने और पोषक तत्व देने की अच्छी क्षमता होती है, इसलिए यहां मटर, चना, मसूर जैसी दलहनी और सरसों जैसी तिलहनी फसलें सबसे बेहतर परिणाम देती हैं।
बलुई दोमट मिट्टी वाले इलाकों में किसान किस फसल को प्राथमिकता देते हैं?
बलुई दोमट मिट्टी में जल निकासी बहुत तेज होती है, इसलिए रेवतीपुर के ऐसे इलाकों में किसान आलू की खेती को प्राथमिकता देते हैं।
बीज सब्सिडी के मामले में नई और पुरानी किस्मों में क्या अंतर रखा गया है?
दस वर्ष से कम समय पहले जारी नई किस्मों पर सरकार अधिक सब्सिडी देती है, जबकि दस वर्ष से पुरानी किस्मों पर अनुदान की राशि कम रखी जाती है।
दलहनी फसलों की मिनी किट किसानों को किस प्रक्रिया से बांटी जाएंगी?
मटर, चना और मसूर की मिनी किट का वितरण ऑनलाइन पंजीकरण कराने वाले किसानों के बीच पारदर्शी ई-लॉटरी के जरिए किया जाएगा।
वर्तमान में कृषि विभाग के पास किन-किन फसलों के बीज उपलब्ध हैं?
कृषि विभाग के पास फिलहाल मटर, चना, मसूर और सरसों के बीज मौजूद हैं, जबकि गेहूं के प्रमाणित बीज का वितरण भी शुरू कर दिया गया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp