त्योहारी सीजन में उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से पर्यावरण संरक्षण और हुनर की एक खास मिसाल सामने आई है। दीपावली की तैयारियों के बीच बाजार में पारंपरिक सजावट और मूर्तियों के बीच प्राकृतिक संसाधनों से तैयार कलाकृतियों ने खरीदारों का ध्यान खींचा है। एक जिला एक उत्पाद योजना से प्रेरित इस पहल के तहत गेहूं के डंठल का इस्तेमाल करके भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की आकर्षक छवियां तैयार की जा रही हैं। यह पर्यावरण अनुकूल उत्पाद न केवल टिकाऊ है, बल्कि उत्सव के बाजार में अपनी अलग पहचान बना रहा है।
सालों साल बरकरार रहती है चमक और मजबूती
इस हस्तशिल्प से जुड़े कलाकार गोपाल गुप्ता के अनुसार, खेतों से मिलने वाले गेहूं के डंठल से दीवार पर सजाने वाली कलाकृतियां, तस्वीरें और मोमेंटो बनाए जा रहे हैं। इन उत्पादों की सबसे बड़ी विशेषता उनका लंबा जीवनकाल है। ये कलाकृतियां जल्दी खराब नहीं होतीं और अत्यधिक टिकाऊ मानी जाती हैं। सबसे रोचक पहलू यह है कि जैसे-जैसे समय बीतता है, इन डंठलों की प्राकृतिक चमक कम होने के बजाय और अधिक निखरने लगती है। यही वजह है कि स्थानीय स्तर से लेकर देश के कई अन्य राज्यों तक इनकी भारी मांग देखने को मिल रही है।
खेतों से ड्राइंग रूम तक का सफर
इन तस्वीरों को तैयार करने की तकनीक बेहद बारीक और धैर्य से भरी है। सबसे पहले खेतों से गेहूं की कटाई के बाद खास तौर पर उपयुक्त डंठलों को एकत्र करके लाया जाता है। कार्यशाला में लाकर इन डंठलों की सघन सफाई की जाती है, ताकि धूल या गंदगी पूरी तरह हट जाए। इसके बाद फोटो फ्रेम के आधार पर डिजाइन की ड्राफ्टिंग और खाका तैयार किया जाता है। कुशल कारीगर एक-एक डंठल को डिजाइन के अनुरूप व्यवस्थित तरीके से चिपकाते हैं। इस बारीक प्रक्रिया में करीब दो से ढाई दिन की निरंतर मेहनत लगती है, जिसके बाद एक पूरी कलाकृति या मोमेंटो का रूप सामने आता है।
आकार, कस्टमाइजेशन और बाजार में कीमत
खरीदारों की रुचि और प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर इन कलाकृतियों को विभिन्न पैमानों में ढाला जा रहा है। वर्तमान में जो प्रमुख मॉडल सबसे अधिक लोकप्रिय हो रहा है, उसका आकार 17×23 इंच रखा गया है। बाजार में इस मानक साइज की कीमत 2,000 रुपये से लेकर 2,500 रुपये के बीच तय की गई है। त्योहार के मद्देनजर लोगों में इन कलाकृतियों को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। इसके साथ ही ग्राहकों की विशेष मांग के अनुसार छोटे और बड़े साइज में भी इन कलाकृतियों को कस्टमाइज करने की पूरी सुविधा दी जा रही है।
महिलाओं और जेल के कैदियों को मिल रहा रोजगार
यह पहल केवल कला और पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक बदलाव का बड़ा माध्यम बन चुकी है। लगभग 80 स्थानीय महिलाएं इस काम से सीधे जुड़कर नियमित आय अर्जित कर रही हैं और आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं। इसके साथ ही बहराइच जिला कारागार में बंद महिला और पुरुष कैदियों को भी इस कला का विधिवत प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसका मकसद कैदियों को हुनरमंद बनाकर समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर प्रदान करना है। गोपाल गुप्ता की टीम अब तक देश के विभिन्न राज्यों में 500 से 1,000 लोगों को इस विधा का प्रशिक्षण दे चुकी है और यह प्रशिक्षण कार्य लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है।















