बिहार के गया में आयोजित पितृपक्ष मेले के दौरान प्रेतशिला पहाड़ी की तलहटी पर एक बेहद भावुक क्षण सामने आया, जहां जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले के ब्रीकमिला गांव से आए वृद्ध माता-पिता अपने दिवंगत बेटे की आत्मा की शांति के लिए धार्मिक अनुष्ठान करने पहुंचे। 80 वर्ष के करतार सिंह और उनकी धर्मपत्नी विमला देवी अपने हाथों में बेटे पर्थ सिंह की तस्वीर थामे हुए थे। पूजा और तर्पण के दौरान दोनों बुजुर्गों की आंखें छलक पड़ीं और मां विमला देवी अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश में लगातार दुपट्टे से चेहरा ढकती रहीं। इस मार्मिक माहौल के बीच दोनों ने खुद को ढांढस बंधाते हुए प्रेतशिला पिंडवेदी पर विधि-विधान से पिंडदान का अनुष्ठान संपन्न किया।
ट्रेनिंग के सफर के दौरान सड़क दुर्घटना में गई थी जान
पर्थ सिंह की असमय मृत्यु की घटना करीब आठ वर्ष पुरानी है, जब वे कर्तव्य के दौरान एक भीषण सड़क हादसे का शिकार हो गए थे। उस समय उनकी उम्र महज 25 वर्ष थी। पर्थ सिंह अपने अन्य सैन्य साथियों के साथ विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम के सिलसिले में पंजाब से जम्मू-कश्मीर की ओर जा रहे थे। यात्रा के दौरान जवानों का वाहन गंभीर दुर्घटना का शिकार हो गया, जिसमें चार जवानों की जान चली गई थी। इस आकस्मिक क्षति ने पूरे परिवार को भीतर तक हिलाकर रख दिया था। आठ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद उनके वृद्ध माता-पिता गयाजी पहुंचे ताकि वे अपने जवान बेटे की आत्मा की मुक्ति के लिए तर्पण कर सकें।
तस्वीर सीने से लगाए माता-पिता और परिवार की स्मृतियां
धार्मिक कर्मकांड के दौरान करतार सिंह और विमला देवी बार-बार अपने बेटे की तस्वीर को निहार रहे थे। परिवार के साथ यात्रा में शामिल मंगल सिंह ने बताया कि पर्थ सिंह का जाना पूरे परिवार के लिए एक ऐसा गहरा आघात है, जिसे समय बीतने के बाद भी भुलाया नहीं जा सका है। हादसे के उस मनहूस दिन की यादें आज भी परिजनों के जेहन में ताजा हैं। करतार सिंह का एक और बेटा है, जो अपने पैतृक गांव ब्रीकमिला में ही रहकर खेती-बाड़ी का काम संभालता है और अपने वृद्ध माता-पिता की देखरेख करता है।
प्रेतशिला पहाड़ी और अकाल मृत्यु के तर्पण की मान्यता
गया के धार्मिक भूगोल में प्रेतशिला पहाड़ी का विशेष महत्व माना गया है। सनातन परंपरा के अनुसार, जिन पूर्वजों या परिजनों की मृत्यु अकाल, असमय अथवा किसी आकस्मिक दुर्घटना में हो जाती है, उनकी आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए प्रेतशिला पर पिंडदान किया जाता है। पितृपक्ष पखवाड़े के दौरान देशभर से भारी संख्या में श्रद्धालु यहां जुटते हैं। प्रेतशिला की मुख्य वेदी तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 676 सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई पूरी करनी होती है। इसके अलावा पहाड़ी की तलहटी में स्थित पावन ब्रह्मकुंड के समीप भी पिंडदान के कर्मकांड संपन्न किए जाते हैं, जहां लोग अपने प्रियजनों की मुक्ति की कामना करते हैं।













