उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद अंतर्गत आने वाली चालीसवां ग्राम सभा में सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना जमीनी स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही की शिकार हो गई है। हर घर को साफ पानी पहुंचाने के उद्देश्य से गांव में ओवरहेड पानी की टंकी का निर्माण कराया गया था और पाइपलाइन बिछाकर नल के कनेक्शन भी दिए गए थे। शुरुआती दौर में कुछ दिनों तक जलापूर्ति सुचारू रूप से चली, लेकिन वर्तमान में ग्रामीणों के घरों के नल पूरी तरह सूखे पड़े हैं। आरोप है कि पानी की सप्लाई रोककर उस मोटर से धान के खेतों की सिंचाई की जा रही है, जिससे पूरा गांव भीषण पेयजल संकट का सामना करने के लिए मजबूर हो गया है।
नल से जल बंद, खेतों में छोड़ा जा रहा पानी
गांव में जल जीवन मिशन के तहत पानी की टंकी और पाइपलाइन का ढांचा तैयार करने के बाद जलापूर्ति शुरू की गई थी, ताकि ग्रामीणों को दूर-दराज से पानी न ढोना पड़े। हालांकि, कुछ समय बीतते ही यह व्यवस्था ठप हो गई। ग्रामीण बृजेश चौहान के अनुसार, जिस मोटर का इस्तेमाल घरों में पीने का पानी भेजने के लिए किया जाना चाहिए, उसका गलत इस्तेमाल हो रहा है। उन्होंने बताया कि जलापूर्ति का जिम्मा संभालने वाला ऑपरेटर मोटर चलाकर लोगों के धान की फसल की सिंचाई कर रहा है और इसके बदले अलग से पैसे कमा रहा है।
निजी स्वार्थ के कारण ऑपरेटर ने गांव की मुख्य जलापूर्ति को पूरी तरह बंद कर दिया है। इसके चलते ग्रामीणों के पास न तो पीने के लिए पानी बचा है और न ही नहाने या सफाई जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए। बृजेश चौहान का कहना है कि मोटर का व्यावसायिक इस्तेमाल होने से गांव के सैकड़ों परिवार बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज हो गए हैं।
भूजल गिरा नीचे, इंडिया मार्का बना सहारा
पेयजल संकट की गहराई को बयां करते हुए ग्रामीण राधेश्याम ने बताया कि गांव में लगे छोटे हैंडपंप यानी चार नंबर की मशीनें पूरी तरह से ठप हो चुकी हैं। इस इलाके में भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है, जिसके कारण छोटी चार नंबर की मशीनें पानी देना बंद कर चुकी हैं। ऐसे में ग्रामीणों के पास अपने घरों में लगा पानी का दूसरा कोई साधन क्रियाशील नहीं है।
राधेश्याम के मुताबिक, पाइपलाइन में कभी-कभार केवल 10 मिनट से लेकर आधे घंटे तक ही पानी आता है और फिर अचानक सप्लाई बंद हो जाती है। इतनी कम अवधि में पानी भरना असंभव हो जाता है। इस मजबूरी के कारण लोगों को अपने घरों से काफी दूर स्थित बड़े इंडिया मार्का हैंडपंप तक जाना पड़ता है। ग्रामीण दूर-दूर से भारी बर्तन और डिब्बे उठाकर पीने का पानी लाने को मजबूर हैं। वहीं, ग्रामीण राजेंद्र चौहान ने बताया कि नियमित जलापूर्ति न होने से दैनिक जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। सुबह खाना बनाने, कपड़े धोने से लेकर बच्चों को समय पर स्कूल भेजने जैसे रोजमर्रा के काम बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
पानी के लिए ताने सहने को मजबूर महिलाएं
इस संकट का सबसे भारी बोझ गांव की महिलाओं को उठाना पड़ रहा है। केवला, चंद्रकला और लक्ष्मीना कनौजिया सहित गांव की कई महिलाओं ने अपना दर्द साझा किया। उनका कहना है कि घरों में लगी चार नंबर की मशीनें पानी छोड़ने में नाकाम हैं, जिसके कारण उन्हें दूसरे लोगों के घरों में लगे बड़े हैंडपंपों या अन्य स्रोतों से पानी भरकर लाना पड़ता है।
महिलाओं ने बताया कि जब वे पानी लेने दूसरों के घर जाती हैं, तो उन्हें अक्सर खरी-खोटी सुननी पड़ती है और पड़ोसियों के ताने झेलने पड़ते हैं। मजबूरी ऐसी है कि अपमानजनक बातें सुनने के बाद भी उन्हें अपने परिवार की प्यास बुझाने के लिए पानी भरकर लाना ही पड़ता है। महिलाओं का कहना है कि अगर जल जीवन मिशन की टंकी से समय पर और नियमित पानी मिले, तो उन्हें खाना पकाने, नहाने और कपड़े धोने जैसी समस्याओं से तुरंत राहत मिल जाएगी।
अधिकारियों की अनदेखी पर आंदोलन का अल्टीमेटम
ग्रामीणों का आरोप है कि जलापूर्ति की इस गंभीर समस्या और ऑपरेटर की मनमानी को लेकर उन्होंने कई बार संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की है। हालांकि, बार-बार गुहार लगाने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया और न ही ऑपरेटर के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई।
अधिकारियों की इस बेरुखी और अनदेखी से ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही पानी की सप्लाई बहाल नहीं की गई और उनकी मांग पूरी नहीं हुई, तो वे मजबूरन धरना देंगे। ग्रामीणों का कहना है कि अगर प्रशासन ने तुरंत संज्ञान नहीं लिया, तो वे एक बड़े आंदोलन की शुरुआत करेंगे और विरोध प्रदर्शन पर बैठने के लिए बाध्य होंगे।



















