कृषि विज्ञान केंद्र भीलवाड़ा ने सुवाणा पंचायत समिति के अंतर्गत आने वाले पोण्डरास गांव में मूंग की फसल को लेकर एक विशेष फील्ड डे का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्थानीय किसानों को कृषि की उन्नत तकनीकों से रूबरू कराना और उन्हें खेती में आत्मनिर्भर बनाना था। इस कृषि चौपाल के दौरान उपस्थित किसानों को मूंग की नई और उन्नत किस्म एमएच-1142 के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। दलहन के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से चलाए जा रहे 'दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन' के तहत इस उन्नत किस्म का प्रदर्शन गांव के कुल 37 किसानों के खेतों पर किया गया है। इन सभी चयनित किसानों को प्रदर्शन के लिए प्रति किसान 6 किलोग्राम उन्नत बीज के साथ-साथ आवश्यक जैव उर्वरक और कीटनाशक भी मुफ्त में उपलब्ध कराए गए ताकि वे आधुनिक वैज्ञानिक तरीके से इसकी बुवाई कर सकें।
एमएच-1142 किस्म की विशेषताएं और इसके फायदे
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक और अध्यक्ष डॉ. सी. एम. यादव ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए किसानों को इस उन्नत किस्म के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें बताईं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मूंग की एमएच-1142 किस्म पारंपरिक रूप से बोई जाने वाली अन्य किस्मों की तुलना में बहुत अधिक उत्पादन देने की क्षमता रखती है। इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत ही कम समय में पककर तैयार हो जाती है। जब कोई फसल कम समय में तैयार हो जाती है, तो किसानों को अपनी जमीन खाली करने का पर्याप्त समय मिल जाता है। इससे वे बिना किसी देरी के अपनी अगली फसल की बुवाई बिल्कुल सही समय पर शुरू कर सकते हैं, जिससे उनकी वार्षिक कृषि योजना प्रभावित नहीं होती। इसके अतिरिक्त, इस किस्म में फसलों को बर्बाद करने वाले घातक पीला मोजेक वायरस का प्रकोप भी न के बराबर देखा गया है। पीला मोजेक वायरस के प्रति प्रतिरोधी होने के कारण यह फसल पूरी तरह सुरक्षित रहती है और किसानों को फसल सुरक्षा के साथ-साथ शानदार उत्पादन का दोहरा लाभ मिलता है।
लागत कम करने और बीज उत्पादन पर विशेष जोर
कार्यक्रम के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को खुद के स्तर पर उन्नत बीज तैयार करने के लिए प्रेरित किया। इस योजना के माध्यम से किसान अब केवल उपभोक्ता बनकर नहीं रहेंगे, बल्कि वे खुद अपने खेतों में उच्च गुणवत्ता वाले बीज तैयार करने में सक्षम हो सकेंगे। जब किसान स्वयं गुणवत्तापूर्ण बीज का उत्पादन करेंगे, तो न केवल उनकी अपनी निर्भरता बाजार पर कम होगी, बल्कि वे अपने आसपास के अन्य साथी किसानों को भी सही दाम पर बेहतर किस्म के बीज आसानी से उपलब्ध करा सकेंगे। डॉ. सी. एम. यादव ने किसानों से खेती की कुल लागत को कम करने और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर पैदावार को दोगुना करने का आह्वान किया। इसके लिए उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण कृषि रणनीतियों को अपनाने की सलाह दी, जिसमें बुवाई से पहले बीजोपचार करना, हमेशाा मान्यता प्राप्त और उन्नत किस्मों के बीजों का ही चयन करना, मिट्टी की जांच के आधार पर खाद एवं उर्वरकों का संतुलित मात्रा में उपयोग करना और फसल चक्र की वैज्ञानिक नीति का कड़ाई से पालन करना शामिल है।
प्राकृतिक खेती की ओर कदम और उत्पादन का अनुमान
आधुनिक रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को देखते हुए किसानों को प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर मोड़ने के लिए कई उपयोगी तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी दी गई। डॉ. यादव ने किसानों को स्वयं अपने घरों पर जैविक इनपुट तैयार करने की सरल विधियों के बारे में विस्तार से समझाया। उन्होंने बीजामृत, जीवामृत, घन जीवामृत और फसलों को कीटों से बचाने के लिए नीमास्त्र बनाने की पूरी प्रक्रिया का प्रदर्शन किया और इनके सही उपयोग के तरीके बताए। इसके साथ ही, गिरते भूजल स्तर को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने किसानों को ऐसी फसलों की बुवाई करने के लिए प्रेरित किया जिनमें बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बार जिन खेतों में मूंग की उन्नत किस्म एमएच-1142 का प्रदर्शन किया गया है, वहां फसल की स्थिति बहुत अच्छी है। अनुकूल परिस्थितियों को देखते हुए वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है कि इस बार किसानों को प्रति हेक्टेयर लगभग 16 से 18 क्विंटल तक मूंग का बंपर उत्पादन प्राप्त हो सकता है, जो सामान्य पैदावार से काफी अधिक है।



















