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घर की थाली को केमिकल मुक्त बनाने के लिए चित्रकूट के किसान ने तैयार किया शानदार जैविक किचन गार्डनभारत
20 सित॰ 2026, 8:18 am (11 दिन पहले)· 1

घर की थाली को केमिकल मुक्त बनाने के लिए चित्रकूट के किसान ने तैयार किया शानदार जैविक किचन गार्डन

चित्रकूट के किसान कोठारी सिंह पटेल ने सीमित जगह और पक्के फर्श पर गमलों के जरिए ताजी सब्जियां उगाने का अनूठा मॉडल विकसित किया है।

घर के चूल्हे पर पकने वाले भोजन में यदि ताजी, हरी और रसायन मुक्त सब्जियां मिल जाएं तो सेहत अपने आप दुरुस्त रहने लगती है। आजकल मिलावटी खान-पान और केमिकल युक्त उपजों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए हर व्यक्ति अपने घर में शुद्ध सब्जियां उगाने की चाहत रखता है। हालांकि घनी आबादी, छोटे मकानों और कच्ची जमीन के अभाव के कारण ज्यादातर लोग इस दिशा में कदम नहीं बढ़ा पाते। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के मानिकपुर तहसील अंतर्गत बरहट गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान कोठारी सिंह पटेल ने इस मुश्किल का बेहद सरल और व्यावहारिक समाधान खोज निकाला है। उन्होंने अपने घर के सीमित दायरे में एक व्यवस्थित जैविक किचन गार्डन तैयार किया है, जहां वे मौसमी सब्जियां उगाकर अपनी रोजाना की पारिवारिक जरूरतों को बिना बाजार जाए पूरा कर रहे हैं।

स्वास्थ्य समस्याओं ने बदली सोच और जैविक राह पर बढ़े कदम

कोठारी सिंह पटेल पहले पारंपरिक ढर्रे पर खेती करते थे, लेकिन जीवन में आए कुछ स्वास्थ्य संकटों ने उन्हें अपनी जीवनशैली बदलने पर मजबूर कर दिया। लगातार बीमारियों और शारीरिक दिक्कतों से जूझने के बाद उन्होंने अपनी रोजमर्रा की भोजन प्रणाली पर गहराई से विचार किया। इसके बाद वर्ष 2023 में उन्होंने रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से पूरी तरह तौबा करते हुए जैविक खेती की राह पकड़ी। उन्होंने अपने भोजन में शुद्ध प्राकृतिक पद्धति से उपजे अनाजों और सब्जियों को शामिल करना शुरू किया, जिससे कुछ ही समय के भीतर उनके स्वास्थ्य में अप्रत्याशित सुधार देखने को मिला। अपने खेतों में वे मुख्य फसलों के तौर पर धान, अरहर और ज्वार की पूरी तरह जैविक पैदावार लेते हैं, जबकि दैनिक सब्जी के लिए उन्होंने घर के निकट ही किचन गार्डन स्थापित किया है।

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रसोई के नजदीक सीमित जगह में मौसमी सब्जियों का चक्र

किचन गार्डन को स्थापित करने को लेकर कोठारी सिंह पटेल का अनुभव बताता है कि इसे हमेशा रसोई घर के बिल्कुल नजदीक रखना चाहिए ताकि खाना बनाते समय जरूरत के मुताबिक तुरंत ताजी सब्जियां तोड़ी जा सकें। इसके अलावा इसमें केवल उन्हीं किस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिए जिनका दैनिक खान-पान में लगातार इस्तेमाल होता है। उन्होंने अपने इस छोटे से बगीचे में पहले परवल और शकरकंद जैसी फसलों को सफलतापूर्वक उगाया था। वर्तमान समय में उनके बगीचे में लौकी, बैंगन, हरी मिर्च और टमाटर जैसी रोजमर्रा की जरूरत वाली सब्जियां लहलहा रही हैं। उनका मानना है कि इस तरह के घरेलू बागानों से भले ही व्यावसायिक स्तर का भारी उत्पादन न मिले, लेकिन एक मध्यमवर्गीय परिवार की दैनिक सब्जी की थाली आसानी से भर जाती है।

पक्के फर्श और गमलों में बागवानी का व्यावहारिक तरीका

जिन घरों में कच्ची मिट्टी, लॉन या खुली क्यारियां नहीं हैं और पूरा आंगन पक्का बना हुआ है, उनके लिए भी कोठारी सिंह पटेल ने आसान रास्ता सुझाया है। उनका कहना है कि पक्के फर्श वाले घरों में बड़े आकार के गमलों या प्लास्टिक कंटेनरों की मदद से बहुत आसानी से सब्जियों की बागवानी की जा सकती है। इसके लिए गमलों में अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी और जैविक खाद का मिश्रण भरना होता है। इस मिश्रण में बैंगन, टमाटर, मिर्च और बेल वाली लौकी जैसी सब्जियां तेजी से पनपती हैं। उन्होंने यह भी साझा किया कि यदि पौधों को पर्याप्त धूप, नियमित पानी और सही पोषण मिले तो कुछ किस्में रोपाई के मात्र 20 दिन बाद ही फल देना शुरू कर देती हैं।

जैविक खाद का प्रयोग और बुंदेलखंड में जागरूकता की मुहिम

घर में तैयार होने वाली इन सब्जियों में किसी भी प्रकार के सिंथेटिक यूरिया या रासायनिक कीटनाशक का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित रखा जाता है। कोठारी सिंह पटेल के मुताबिक केवल शुद्ध जैविक खाद के प्रयोग से ही सब्जियों का प्राकृतिक स्वाद और पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। इससे जहां परिवार का बाजार पर निर्भर रहने का खर्च घटता है, वहीं पौधों की निराई-गुड़ाई और देखभाल से घर के सदस्यों का मानसिक तनाव दूर होता है और यह एक स्वास्थ्यवर्धक मनोरंजन का रूप ले लेता है। इसके अलावा घर के चारों ओर हरियाली और ताजगी का वातावरण बना रहता है। अपने इस सफल अनुभव को व्यापक स्तर पर ले जाने के लिए वे 'खेती बचाओ बुंदेलखंड' नाम से एक संगठन का संचालन भी कर रहे हैं। इस मंच के जरिए वे क्षेत्र के अन्य किसानों और आम नागरिकों को जैविक कृषि अपनाने और घरों में किचन गार्डन लगाने के लिए लगातार जागरूक कर रहे हैं।

सवाल-जवाब

कोठारी सिंह पटेल कहां के रहने वाले हैं?
वे उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले की मानिकपुर तहसील स्थित बरहट गांव के निवासी हैं।
उन्होंने जैविक खेती की शुरुआत कब और क्यों की थी?
उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से निजात पाने और खान-पान सुधारने के लिए वर्ष 2023 में जैविक खेती शुरू की थी।
वे अपने खेतों में कौन सी मुख्य फसलों की जैविक खेती करते हैं?
वे अपने खेतों में धान, अरहर और ज्वार जैसी प्रमुख फसलों की जैविक खेती करते हैं।
वर्तमान में उनके किचन गार्डन में कौन सी सब्जियां उग रही हैं?
वर्तमान में उनके बगीचे में लौकी, बैंगन, हरी मिर्च और टमाटर जैसी दैनिक सब्जियां तैयार की जा रही हैं।
यदि घर में कच्ची जमीन न हो तो किचन गार्डन कैसे बनाया जा सकता है?
पक्के फर्श पर बड़े गमलों या कंटेनरों में जैविक खाद और मिट्टी भरकर सब्जियां आसानी से उगाई जा सकती हैं।
सही देखभाल करने पर कितने दिनों में कुछ सब्जियों से पैदावार मिलने लगती है?
कोठारी सिंह पटेल के अनुसार सही देखभाल और पोषण मिलने पर कुछ सब्जियां 20 दिन बाद ही फल देने लगती हैं।
वे जन-जागरूकता के लिए किस संगठन का संचालन कर रहे हैं?
वे जैविक खेती और किचन गार्डन के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए 'खेती बचाओ बुंदेलखंड' नामक संगठन चलाते हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·10 दिन पहले

चित्रकूट के किसान का यह जैविक मॉडल भोजन की थाली को शुद्ध करने के साथ-साथ बढ़ती खाद्य महंगाई और पर्यावरण संकट के बीच मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए आत्मनिर्भरता का एक प्रभावी सुरक्षा कवच बन सकता है। यदि इस तरह के विकेंद्रीकृत छोटे बगीचों को शहरी और ग्रामीण आवास योजनाओं में नीतिगत प्रोत्साहन मिले, तो यह दीर्घकालिक रूप से पोषण सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार की दिशा में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।

Aisha Khan@aisha-khan·10 दिन पहले

चित्रकूट के किसान का यह जैविक मॉडल भोजन की थाली को शुद्ध करने के साथ-साथ बढ़ती खाद्य महंगाई और पर्यावरण संकट के बीच मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए आत्मनिर्भरता का एक प्रभावी सुरक्षा कवच बन सकता है। यदि इस तरह के विकेंद्रीकृत छोटे बगीचों को शहरी और ग्रामीण आवास योजनाओं में नीतिगत प्रोत्साहन मिले, तो यह दीर्घकालिक रूप से पोषण सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार की दिशा में एक बड़ा बदलाव ला सकता है। मनोरंजन और जीवनशैली जगत में भी अब सस्टेनेबल लिविंग और फार्म-टू-टेबल का चलन तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में यह ज़मीनी पहल इस आधुनिकトレンド को एक व्यावहारिक आयाम देती है।

Ravikash Gupta@ravikash·10 दिन पहले

चित्रकूट के किसान कोठारी सिंह पटेल का यह मॉडल केवल घरेलू स्वास्थ्य सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह माइक्रोकंट्रोलर और अर्बन फार्मिंग जैसे उभरते सस्टेनेबल स्टार्टअप ट्रेंड्स के अनुकूल है। जिस तरह से बढ़ती महंगाई और केमिकल युक्त सब्जियों के बीच छोटे स्थानों पर भी लोग आत्मनिर्भर हो रहे हैं, यह भविष्य की 'ग्रो-योर-ओन' (अपने हाथ से उगाओ) डिजिटल इकॉनमी और सस्टेनेबल कंज्यूमरिज्म की ओर एक बड़ा संकेत है। यदि ऐसे जमीनी मॉडल तकनीक और कम लागत वाले ऑटोमेटेड ड्रिप इरिगेशन से जुड़ जाएं, तो यह शहरी और अर्ध-शहरी मध्यम वर्ग के लिए एक बड़ा घरेलू आर्थिक और स्वास्थ्य समाधान बन सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·10 दिन पहले

अपराध और कानून-व्यवस्था की बीट पर काम करते हुए यह देखना अहम है कि मिलावटी खाद्य पदार्थों और जहरीले रसायनों की बिक्री से जुड़े मामले जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। चित्रकूट के किसान कोठारी सिंह पटेल द्वारा रासायनिक खेती छोड़ना और घर पर जैविक सब्जियां उगाना यह साबित करता है कि खाद्य सुरक्षा की यह लड़ाई अब अदालतों और पुलिस थानों से निकलकर आम आदमी की रसोई तक पहुंच चुकी है। यदि ऐसे मॉडल को शहरी इलाकों में कानूनी प्रोत्साहन और सुरक्षा मिले, तो मिलावटखोरी के अवैध कारोबार पर काफी हद तक लगाम लग सकती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·10 दिन पहले

करण मल्होत्रा के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए राजनीतिक और नीतिगत दृष्टिकोण से यह देखना आवश्यक है कि खाद्य सुरक्षा केवल कृषि मंत्रालय का विषय नहीं, बल्कि यह सीधे तौर पर संसद और राज्य विधानमंडलों के नीतिगत एजेंडे से जुड़ा है। जब तक केंद्रीय और राज्य सरकारें रासायनिक उर्वरकों पर भारी सब्सिडी देती रहेंगी और जैविक खेती के लिए विकेंद्रीकृत प्रोत्साहन नीतियां जमीन पर नहीं उतरेंगी, तब तक आम नागरिक अपनी रसोई बचाने के लिए इस प्रकार के व्यक्तिगत संघर्ष करने को मजबूर रहेगा। नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे घरेलू जैविक मॉडलों को जनस्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनाएं ताकि यह व्यक्तिगत प्रयोग राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत जन-नीति का रूप ले सके।

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