तेजी से फैलते शहरीकरण और आधुनिक कंक्रीट के मकानों के बीच हैदराबाद के करीब स्थित बीरमगुड़ा क्षेत्र में एक ऐसी ऐतिहासिक इमारत मौजूद है जो करीब छह सदियों पुरानी है। बहमनी सल्तनत के शासनकाल से ताल्लुक रखने वाला यह प्राचीन वॉच टॉवर आज भी अपनी जगह पर डटा हुआ है, लेकिन आसपास बहुमंजिला इमारतों और कमर्शियल दुकानों के आने के कारण यह आम लोगों की नजरों से लगभग ओझल हो चुका है।
इतिहास और रणनीतिक महत्व
शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के मुताबिक यह पुरातात्विक संरचना चौदहवीं से पंद्रहवी शताब्दी के दौरान बहमनी साम्राज्य के विस्तार के समय की है। उस जमाने में दक्कन के मुख्य व्यापारिक मार्गों, रास्तों और सैन्य गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के लिए ऐसे सुरक्षा बुर्ज खड़े किए जाते थे। पाटनचेरु और गोलकोंडा के बेहद करीब होने की वजह से सामरिक और सुरक्षा दृष्टिकोण से इस बुर्ज की अहमियत बहुत ज्यादा हुआ करती थी।
मजबूत वास्तुकला और बनावट
इस ऐतिहासिक वॉच टॉवर को तैयार करने में भारी-भरकम ग्रेनाइट पत्थरों और पारंपरिक चूने के गारे का इस्तेमाल किया गया है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इतने लंबे समय तक बारिश, धूप और तमाम मौसमों की मार झेलने के बावजूद इसकी मुख्य दीवारें आज भी मजबूत बनी हुई हैं। टॉवर के ऊपरी हिस्से में सुरक्षाकर्मियों के लिए तीरंदाजी करने और निगरानी करने के वास्ते खास संकरे झरोखे बनाए गए थे, जबकि अंदरूनी हिस्से में छत तक पहुंचने के लिए पत्थरों को काटकर बेहद संकरी और घुमावदार सीढ़ियां बनाई गई थीं।
सैन्य निगरानी का प्राचीन केंद्र
प्राचीन काल में इस सुरक्षा चौकी पर चौबीसों घंटे पहरेदारों की तैनाती रहती थी। उस समय चारों तरफ विशाल खुले मैदान और घनी हरियाली हुआ करती थी, जिसके कारण यहां से कई किलोमीटर दूर तक का इलाका साफ नजर आता था। दूरदराज से आने वाली किसी भी दुश्मन सेना, संदिग्ध गतिविधियों या खतरे की आहट मिलते ही फौरन आगे के सैन्य शिविरों तक संदेश पहुंचाने के लिए यह टॉवर एक अहम संचार और सुरक्षा चौकी की भूमिका निभाता था।
कभी अपनी मजबूती और शान के लिए पहचाना जाने वाला यह प्राचीन बुर्ज आज बेहद दयनीय और लावारिस हालत में खड़ा है। इसके चारों तरफ इतनी अधिक बहुमंजिला रिहायशी इमारतें तान दी गई हैं कि यह पूरी तरह घिर चुका है और अंदर जाने का रास्ता भी मुश्किल हो गया है। रखरखाव और प्रशासनिक देखरेख के अभाव में इसके भीतर के कमरों और सीढ़ियों पर भारी मात्रा में प्लास्टिक, कचरा और मलबा फैल चुका है। किसी भी तरह का दिशासूचक या साइनबोर्ड न होने की वजह से आसपास के रहने वाले स्थानीय लोग भी इसके गौरवशाली इतिहास से पूरी तरह अनजान हैं।
संरक्षण की सख्त जरूरत
बीरमगुड़ा का यह प्राचीन ढांचा हमारी समृद्ध दक्कनी संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत का एक अमूल्य हिस्सा है। अगर वक्त रहते पुरातत्व विभाग और स्थानीय प्रशासन ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह ऐतिहासिक धरोहर धीरे-धीरे पूरी तरह नेस्तनाबूद हो जाएगी। क्षेत्र के इतिहास प्रेमियों और जानकारों का पुरजोर मानना है कि इस बुर्ज के आसपास सफाई अभियान चलाकर इसे अतिक्रमण मुक्त किया जाए और संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने शहर के असली अतीत और इतिहास से वाकिफ हो सकें।

















