राजस्थान के बारां जिले के छबड़ा क्षेत्र में रबी फसलों की बुवाई के इस महत्वपूर्ण दौर में डीएपी खाद की कमी ने विकराल रूप ले लिया है। खाद न मिलने से नाराज अन्नदाताओं का सब्र गुरुवार की सुबह जवाब दे गया, जिसके बाद उन्होंने सड़कों पर उतरकर तीव्र विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। सुबह तड़के से ही स्थानीय दुकानों के बाहर लंबी कतारों में अपनी बारी का इंतजार कर रहे किसानों को जब खाली हाथ लौटना पड़ा, तो उनका आक्रोश स्वतः ही सड़क पर फैल गया। इस स्थिति के चलते इलाके में तनाव और प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ रोष स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
सड़क पर जाम और नारेबाजी
खाद की उपलब्धता को लेकर मचे हाहाकार के बीच आक्रोशित किसानों ने छबड़ा के मुख्य मार्ग को पूरी तरह से जाम कर दिया। प्रदर्शनकारी किसानों ने सड़क के बीचों-बीच बैठकर व्यवस्था के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की और कृषि मंत्री के विरोध में जमकर नारेबाजी की। किसानों का कहना था कि वे कई घंटों से लाइनों में खड़े हैं, लेकिन उन्हें खाद उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है, जिससे उनकी फसलों की बुवाई का समय निकलता जा रहा है। इस चक्काजाम के कारण मुख्य मार्ग पर यातायात पूरी तरह बाधित हो गया और आसपास के इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
नरेश मीणा का अनूठा संबोधन
इस विरोध प्रदर्शन की सूचना मिलते ही किसान नेता नरेश मीणा मौके पर पहुंच गए और उन्होंने प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया। माहौल को और अधिक मुखर बनाते हुए नरेश मीणा एक पेड़ पर चढ़ गए और वहीं से नीचे खड़े हजारों किसानों को संबोधित करने लगे। पेड़ की टहनियों पर खड़े होकर उन्होंने किसानों की समस्याओं को उठाया और सरकार तथा प्रशासन के रवैये की कड़ी आलोचना की। उनके इस तरह पेड़ पर चढ़कर भाषण देने से वहां मौजूद भीड़ और अधिक सक्रिय हो गई तथा क्षेत्र में हलचल और भी तेज हो गई।
कृषि विभाग की वितरण योजना और निर्देश
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कृषि विभाग की ओर से तय की गई वितरण व्यवस्था और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर मुख्य कारण रहा। सहायक कृषि निदेशक सुरेश मालव के अनुसार, इस इलाके में किसानों को राहत प्रदान करने के लिए प्रत्येक किसान को डीएपी खाद के तीन कट्टे दिए जाने का प्रावधान किया गया था। इस योजना के तहत कुल 2,960 कट्टों का वितरण किया जाना था, जिसके लिए प्रशासन ने छबड़ा कस्बे में सात अलग-अलग दुकानों को अधिकृत किया था। विभाग की मंशा थी कि पारदर्शी तरीके से कट्टों का वितरण किया जाए ताकि अधिक से अधिक जरूरतमंदों तक खाद पहुंच सके।
दस्तावेजों की अनिवार्यता और व्यवस्था पर उठे सवाल
प्रशासन की ओर से यह भी नियम बनाया गया था कि खाद प्राप्त करने के लिए किसानों को अपनी जमीन की नकल और आधार कार्ड अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करना होगा। इन दस्तावेजों की गहन जांच के बाद ही खाद का वितरण किया जाना था ताकि किसी भी तरह की कालाबाजारी या गड़बड़ी को रोका जा सके। हालांकि, नियमों की इस लंबी प्रक्रिया और मांग के मुकाबले आपूर्ति कम होने के कारण कई किसानों को कतारों में खड़े रहने के बावजूद खाद नहीं मिल पाया। इस प्रशासनिक नाकामी ने अब कृषि विभाग की वितरण प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, और किसान लगातार मांग कर रहे हैं कि उनकी बुवाई को बचाने के लिए उन्हें बिना किसी परेशानी के समय पर खाद उपलब्ध कराया जाए।


















