जब जीवन की राहों में चुनौतियां खड़ी होती हैं तो हर तरफ अंधेरा नजर आने लगता है। लेकिन कुछ लोग उन मुश्किलों से हार मानने के बजाय हर बाधा को अपनी जीत की सीढ़ी बना लेते हैं। कर्नाटक के हासन शहर में पली-बढ़ी कृतिका की जीवन गाथा भी कुछ ऐसी ही है। जिस उम्र में बच्चों को अपने माता-पिता का भरपूर लाड़-प्यार मिलता है, उस उम्र में कृतिका को अपनों की उपेक्षा का सामना करना पड़ा। उनके जन्म के समय उनके पिता इसलिए खुश नहीं हुए थे क्योंकि वह एक बेटी थीं। एक छोटी सी बच्ची अपने पिता का स्नेह पाने के लिए स्कूल में मेडल और सर्टिफिकेट लाती रही, लेकिन उसे केवल अनदेखा किया गया। समय के साथ माता-पिता का तलाक हो गया, जिससे स्थितियां और अधिक जटिल हो गईं। समाज ने उनकी मां को ताने दिए और रिश्तेदारों ने भी दूरी बना ली। हालांकि, इस पूरे दौर ने कृतिका को कमजोर करने के बजाय अपनी मां के सम्मान के लिए लड़ने की असीम शक्ति दी। उन्होंने उन सभी लोगों को गलत साबित करने की ठान ली जो एक सिंगल मदर की काबिलियत पर सवाल उठाते थे। यूपीएससी में 100वीं रैंक यानी AIR 100 हासिल करके उन्होंने अपनी मां का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।
बचपन का संघर्ष और समाज का रवैया
माता-पिता के अलग होने के बाद स्कूल के अन्य बच्चे भी कृतिका से दूरी बनाने लगे थे। चौथी कक्षा की पढ़ाई के दौरान जब उनके गणित के पेपर में 100 में से 99 अंक आए, तो स्थितियां बदलने लगीं। जो सहपाठी पहले उनसे बात तक नहीं करते थे, वे खुद चलकर उनके पास आने लगे। इस छोटी सी घटना ने कृतिका को जीवन का एक बड़ा पाठ पढ़ाया कि समाज में अपनी पहचान बनाने और सम्मान हासिल करने के लिए अपनी प्रतिभा के बल पर ऊंचे मुकाम हासिल करने होंगे। इसी सोच ने आगे चलकर उन्हें देश की सबसे कठिन परीक्षा यानी यूपीएससी की तरफ कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
तैयारी के दौरान चार बार असफलता और मानसिक बदलाव
कृतिका की परीक्षा की तैयारी का स्तर बहुत अच्छा था। कोचिंग संस्थानों के मेंटर्स और मॉक इंटरव्यू पैनल के सदस्य हमेशा उनकी तैयारी की सराहना करते थे। इसके बावजूद अंतिम चयन सूची में उनका नाम शामिल नहीं हो पाता था। लगातार चार बार असफल होने के बाद वह अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थीं। एक रात वह एक अंधेरे कमरे में अकेली बैठी थीं, तब उन्होंने लैपटॉप की स्क्रीन पर मनोविज्ञान का एक सिद्धांत पढ़ा, जिसे 'रोसेंथल इफेक्ट' (Rosenthal Effect) या पिग्मेलियन इफेक्ट कहा जाता है। इस सिद्धांत का मूल अर्थ यह है कि हम अपने बारे में या दूसरे लोग हमारे बारे में जैसी धारणा रखते हैं, हमारी जिंदगी वैसी ही ढलने लगती है। मनोविज्ञान के इस नियम ने कृतिका की सोच को पूरी तरह बदल दिया। उन्हें अहसास हुआ कि कमी उनकी मेहनत में नहीं, बल्कि उनके मन में बैठे इस डर में थी कि शायद वह कभी आईएएस अधिकारी नहीं बन पाएंगी। उन्होंने अपनी सोच को सकारात्मक बनाया, खुद पर अटूट विश्वास रखा और इसके बाद अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए लगातार दो बार यूपीएससी परीक्षा को पास किया। सिविल सेवा परीक्षा 2018 में उन्होंने 100वीं रैंक प्राप्त की और आईआरएस अधिकारी बनीं।
तैयारी की शुरुआती भूलें और सुधार के रास्ते
कृतिका की यह सफलता की राह आसान नहीं थी और उन्होंने वर्ष 2012 से अपनी तैयारी की शुरुआत की थी। पहले साल उन्होंने अखबार के दो-दो पन्नों के ऐसे लंबे नोट्स तैयार किए जिनका परीक्षा से कोई दूर-दूर तक वास्ता नहीं था। यह बात उन्हें एक साल बाद समझ आई। इसके अलावा उनके सफर में कई अन्य महत्वपूर्ण पड़ाव भी आए। अपने तीसरे प्रयास से महज दो महीने पहले उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि प्रारंभिक परीक्षा के लिए मॉक एमसीक्यू को हल करना कितना जरूरी होता है। इसके बाद उन्होंने 'इनसाइट्स ऑन इंडिया' की टेस्ट सीरीज का सहारा लिया। अपने दूसरे प्रयास के दौरान जो कि उनका पहला मुख्य परीक्षा का प्रयास था, वह 20 में से केवल 16 प्रश्नों के ही उत्तर लिख पाई थीं। तब उन्हें यह समझ आया कि परीक्षा में पूरा प्रश्नपत्र हल करना ही सफलता की सबसे बड़ी शर्त है। चौथे प्रयास में उन्हें अपने वैकल्पिक विषय यानी लोक प्रशासन के लिए 'एआरसी रिपोर्ट्स' (ARC Reports) की असली उपयोगिता और गहराई का ज्ञान हुआ।
कृतिका की यात्रा से मिलने वाले महत्वपूर्ण सबक
कृतिका की यह लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा हर उस सिविल सेवा अभ्यर्थी के लिए एक बेहतरीन मार्गदर्शिका है जो जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर खुद को अकेला या असफल पाता है। उनके अनुभवों से निकलने वाले मुख्य सबक इस प्रकार हैं। पढ़ाई के दौरान दुनिया से पूरी तरह न कटें। कई अभ्यर्थियों को लगता है कि इस परीक्षा के लिए समाज और दुनिया से संबंध तोड़ लेना चाहिए, लेकिन जब तक आप अपने सीनियर्स और मेंटर्स से संवाद नहीं करेंगे, तब तक आपको यह स्पष्ट नहीं होगा कि क्या पढ़ना है और क्या छोड़ना है। दूसरों की गलतियों से सीखें। समझदार इंसान वही होता है जो दूसरों की गलतियों से सबक लेकर खुद में सुधार करता है, न कि खुद सारे गलत कदम उठाकर अपना कीमती समय व्यर्थ करता है। परीक्षा के दौरान कभी भी प्रश्नपत्र को अधूरा न छोड़ें। परीक्षा कक्ष में परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, पूरा पेपर लिखकर आएं। समय भले ही आपके अनुकूल न चल रहा हो, लेकिन आपको अपने लक्ष्य से नजरें नहीं हटानी चाहिए।



















