हैदराबाद में गर्मियों का मौसम अभी शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन पानी के लिए लोगों की मुश्किलें अभी से बढ़ती जा रही हैं। मानसून की विदाई को गुजरे अभी मात्र 17 ही दिन हुए हैं, मगर इसके बावजूद शहरभर में पानी के टैंकरों की मांग ने अब तक के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सामान्य तौर पर मार्च और अप्रैल के महीनों में टैंकरों की बुकिंग में तेजी देखने को मिलती थी, लेकिन इस बार अक्टूबर के शुरुआती दिनों में ही हालात पूरी तरह बदल चुके हैं और हर दिन लगभग 8 हजार टैंकर बुक किए जा रहे हैं।
जल बोर्ड के आंकड़े और भूजल स्तर में भारी गिरावट
जल बोर्ड के आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो इस महीने अब तक कुल 62,565 टैंकरों की बुकिंग दर्ज की जा चुकी है। पिछले साल इसी समान अवधि के दौरान यह आंकड़ा महज 18,806 टैंकरों का था, जिसका सीधा मतलब यह है कि इस बार मांग में 233 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस चौंकाने वाली स्थिति को देखकर अब हर तरफ यह सवाल उठ रहा है कि आने वाले भीषण गर्मी के महीनों में शहर की प्यास कैसे बुझाई जाएगी। इस भयंकर जल संकट का असर अब आम घरों से लेकर बड़े शैक्षणिक संस्थानों तक साफ तौर पर दिखाई देने लगा है।
शैक्षणिक संस्थानों और दफ्तरों पर संकट का साया
तेलंगाना के बासर स्थित एक विश्वविद्यालय में पानी की भारी किल्लत के कारण सोमवार से ऑनलाइन कक्षाएं संचालित करने का कड़ा फैसला लिया गया है। इस संस्थान में रोजाना करीब 25 लाख लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जबकि आपूर्ति घटकर केवल 10 लाख लीटर ही रह गई है। दूसरी तरफ, हैदराबाद के कई प्रमुख इलाकों में रिहायशी अपार्टमेंट और आईटी दफ्तर पूरी तरह से पानी के टैंकरों पर निर्भर होते जा रहे हैं। शहर में लगभग 20 हजार बोरवेल पूरी तरह सूख चुके हैं, जिससे स्थिति और भी ज्यादा भयावह हो गई है। मानसून के दौरान कम बारिश होने और लगातार गिरते भूजल स्तर ने हालात को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ऐसे में जल बोर्ड ने आम जनता से अपील की है कि वे पानी की खपत में तुरंत 20 प्रतिशत तक की कटौती करें।
बोडुप्पल में 22 गुना बढ़ी मांग और झील के पास अवैध बोरवेल
हैदराबाद के तेजी से विकसित हो रहे रिहायशी क्षेत्रों में पानी की यह कमी सबसे ज्यादा महसूस की जा रही है। बोडुप्पल इलाके में पिछले साल की तुलना में टैंकरों की मांग में सीधे 22 गुना की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। लोगों को अपने अपार्टमेंट और दफ्तरों की रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए मजबूरन टैंकर मंगाने पड़ रहे हैं। जल बोर्ड के लिए इस बढ़ती मांग के बीच पानी की नियमित आपूर्ति बनाए रखना एक बेहद कठिन चुनौती बन गया है। इस बीच, पानी की इस भयंकर किल्लत के दौर में अवैध तरीके से पानी बेचने का एक सनसनीखेज मामला भी सामने आया है। सुन्नम चेरुवु झील के आसपास के कुछ घरों में बिस्तरों के नीचे और रसोईघरों के अंदर तक बोरवेल छिपाकर लगाए जाने का चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
ड्रोन सर्वे और जलाशयों की दयनीय स्थिति
जांच में पता चला कि इन अवैध बोरवेल्स से पाइपलाइन के माध्यम से पानी निकालकर बड़े स्टोरेज टैंकों में भरा जाता था और फिर उन्हें टैंकरों के जरिए महंगे दामों पर बेचा जाता था। इस पूरे अवैध नेटवर्क का पता लगाने के लिए ड्रोन की मदद ली गई, जिसके बाद कुल 15 अवैध बोरवेल्स और उनसे जुड़ी तमाम पाइपलाइनों को मौके से हटाया गया। इस संकट की मुख्य वजह इस साल हैदराबाद में सामान्य से काफी कम बारिश होना है। शहर में सामान्य रूप से 627 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन इस बार केवल 458 मिलीमीटर बारिश ही दर्ज की गई, जो औसत से लगभग 27 प्रतिशत कम है। शहर के कुल 16 मंडलों में से 13 मंडलों में सामान्य से बहुत कम वर्षा हुई है, जिसमें चारमीनार में बारिश की कमी 39 प्रतिशत और सैदाबाद में 38 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।
भूजल स्तर में गिरावट और सिंगूर जलाशय का हाल
कम बारिश का सीधा असर भूजल पर भी पड़ा है। सितंबर 2025 की तुलना में सितंबर 2026 तक ग्रेटर हैदराबाद और उसके आसपास के शहरी क्षेत्रों में भूजल स्तर औसतन 22.5 फीट नीचे चला गया है। इसके अलावा, हैदराबाद को जलापूर्ति करने वाले सिंगूर जलाशय की वर्तमान स्थिति भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है। इस जलाशय की कुल भंडारण क्षमता 29.91 टीएमसी है, लेकिन 17 अक्टूबर को यहां केवल 3.416 टीएमसी पानी ही शेष बचा था। इसका मतलब यह है कि यह जलाशय अपनी कुल क्षमता के महज 11 प्रतिशत हिस्से पर सिमट चुका है। आकलन के अनुसार, यदि इसी रफ्तार से पानी की निकासी होती रही, तो सामान्य जलापूर्ति के लिए यह भंडार केवल 9 नवंबर तक ही पर्याप्त साबित हो पाएगा। हालांकि, विशेष पंपों का इस्तेमाल करके पानी निकालने पर इस आपूर्ति को 10 दिसंबर तक खींचे जाने की संभावना जताई गई है।
देशभर के जलाशयों की स्थिति और दक्षिण भारत का संकट
पानी की यह गंभीर समस्या केवल हैदराबाद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी हालात चिंताजनक हैं। केंद्रीय जल आयोग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में कुल मिलाकर लगभग 123.2 अरब घनमीटर पानी ही उपलब्ध है, जो उनकी कुल भंडारण क्षमता का करीब 67 प्रतिशत है। पिछले साल इसी समान अवधि के दौरान इन जलाशयों में जल स्तर लगभग 93 प्रतिशत दर्ज किया गया था। दक्षिण भारत के राज्यों में स्थिति और भी अधिक गंभीर बताई जा रही है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के 50 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी उनकी कुल क्षमता का केवल 42 प्रतिशत है। यदि आने वाले दिनों में बारिश और जल संरक्षण की स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो देश के कई अन्य बड़े शहरों के लिए भी पेयजल की आपूर्ति एक विकट चुनौती बन सकती है।
















