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हर घर तिरंगा अभियान से बदली अमेठी की महिलाओं की किस्मत, 1.5 लाख राष्ट्रीय ध्वज बनाकर कमा रहीं लाखों रुपयेभारत
14 अग॰ 2026, 8:07 am (48 दिन पहले)· 0

हर घर तिरंगा अभियान से बदली अमेठी की महिलाओं की किस्मत, 1.5 लाख राष्ट्रीय ध्वज बनाकर कमा रहीं लाखों रुपये

अमेठी में स्वयं सहायता समूह से जुड़ी सैकड़ों महिलाएं लगभग 1.5 लाख तिरंगे बनाकर आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं। 10 रुपये की लागत से तैयार झंडों की 20 रुपये कीमत मिलने से 148 समूहों के बीच करीब 20 लाख रुपये वितरित होंगे।

उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में देशभक्ति और स्वावलंबन का एक अनूठा संगम देखने को मिल रहा है, जहां ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं अपने घरों में बैठकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा बना रही हैं। जिले की विभिन्न ग्राम पंचायतों में, विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं द्वारा चलाई जा रही यह पहल न केवल राष्ट्र सेवा का अवसर दे रही है, बल्कि महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त भी बना रही है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से चल रहा यह अभियान कई परिवारों के लिए नियमित रोजगार और वित्तीय सुरक्षा का मुख्य जरिया बन चुका है।

तिरंगा निर्माण से मिल रहा रोजगार और सम्मान

अमेठी जिले के शाहगढ़, अमेठी, संग्रामपुर, भादर और जायस समेत अनेक ब्लॉकों की ग्राम पंचायतों में इन दिनों तिरंगे बनाने का कार्य बड़े पैमाने पर चल रहा है। स्वतंत्रता दिवस से जुड़े तिरंगा अभियान को गति देने के लिए स्वयं सहायता समूह की सदस्य दिन-रात जुटी हुई हैं। इस कार्य के बदले महिलाओं को तय मानदेय का भुगतान सीधे किया जा रहा है, जिससे उन्हें घर बैठे ही नियमित आय हासिल हो रही है। इस आर्थिक संबल ने महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाया है और वे परिवार की वित्तीय जिम्मेदारियों में सक्रिय योगदान दे रही हैं।

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इस पहल से जुड़ी महिलाओं ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि स्वयं सहायता समूहों ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी है। समूह की सदस्य लक्ष्मी ने कहा, "तिरंगा हमारे देश की शान है और घर बैठे इसे बनाने का अवसर मिलना हमारे लिए बेहद गर्व की बात है।" उनका कहना है कि इस काम से देशभक्ति की भावना के साथ-साथ परिवार चलाने के लिए कमाई का जरिया भी उपलब्ध हुआ है।

वहीं समूह की एक अन्य सदस्य प्रवीणा सिंह के अनुसार, राष्ट्रध्वज से देश का गौरव हमेशा चमकता रहता है। उन्होंने बताया कि इस अभियान और समूह के सहयोग से उनके भीतर नई उम्मीद जगी है, वे स्वयं के पैरों पर खड़ी हो रही हैं और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव महसूस कर रही हैं। इसके अलावा, समूह से जुड़ीं भारती ने एक महत्वपूर्ण पहलू उजागर करते हुए बताया कि पहले जिनके पास रोजगार के साधन नहीं थे, उन्हें अपनी दैनिक जरूरतों या आपात स्थिति के लिए भारी ब्याज पर पैसे उधार लेने पड़ते थे। अब महिलाएं समूह में नियमित रूप से अपनी बचत जमा करती हैं और जरूरत पड़ने पर आसानी से पैसा निकाल लेती हैं। तिरंगा बनाकर कमाने का यह अवसर उनके लिए दोहरी खुशी लेकर आया है।

लाखों रुपये के कारोबार से 148 समूह होंगे लाभान्वित

अमेठी जिले में चल रहे इस व्यापक अभियान के आंकड़े भी महिला सशक्तिकरण की इस सफलता को प्रमाणित करते हैं। जिले के 100 से अधिक स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी लगभग 500 महिलाएं करीब डेढ़ लाख तिरंगा झंडे तैयार करने में जुटी हैं। उत्पादन की वित्तीय गणना के अनुसार, एक तिरंगे को बनाने की अनुमानित लागत लगभग 10 रुपये आती है, जबकि इसके बदले महिलाओं को 20 रुपये प्रति झंडा की दर से भुगतान मिल रहा है। इस तरह कुल मिलाकर लगभग 20 लाख रुपये का राजस्व 148 स्वयं सहायता समूहों में पारदर्शी तरीके से बांटा जाएगा। इससे सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं को सीधे तौर पर लाखों रुपये का आर्थिक लाभ मिलेगा और वे पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सकेंगी।

सवाल-जवाब

अमेठी में कितने स्वयं सहायता समूह तिरंगा बनाने के काम में लगे हैं?
अमेठी जिले में 100 से अधिक स्वयं सहायता समूह तिरंगे बनाने के कार्य में सक्रिय रूप से जुटे हुए हैं।
तिरंगा अभियान से अमेठी की कितनी महिलाओं को रोजगार मिल रहा है?
इस पहल के जरिए जिले की लगभग 500 महिलाओं को सीधे तौर पर घर बैठे रोजगार और आय का अवसर मिला है।
एक तिरंगे को बनाने में कितनी लागत आती है और महिलाओं को कितना भुगतान मिलता है?
एक तिरंगे को तैयार करने की अनुमानित लागत 10 रुपये है, जबकि निर्माण करने वाली महिलाओं को 20 रुपये प्रति झंडा भुगतान प्राप्त होता है।
इस अभियान के तहत कुल कितना वित्तीय लाभ समूहों के बीच बांटा जाएगा?
लगभग 1.5 लाख तिरंगे झंडे तैयार होने के बाद करीब 20 लाख रुपये का कुल राजस्व 148 समूहों में विभाजित किया जाएगा।
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टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·47 दिन पहले

अमेठी की यह पहल केवल देशभक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण कौशल विकास और आजीविका का एक बेहतरीन मॉडल प्रस्तुत करती है। स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाओं का वित्तीय समावेशन और महाजन प्रथा से मुक्ति इस बात का प्रमाण है कि संगठित होकर काम करने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कैसे मजबूत किया जा सकता है। भविष्य में इस तरह के मौसमी अभियानों को यदि स्थायी सूक्ष्म उद्यमों में बदला जा सके, तो यह महिलाओं की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए अधिक प्रभावी होगा।

Ravikash Gupta@ravikash·47 दिन पहले

अमेठी में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से चल रहा यह तिरंगा निर्माण अभियान केवल एक सामाजिक पहल नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने का एक प्रभावी आर्थिक मॉडल है। महज 10 रुपये की लागत पर 20 रुपये की वापसी और 148 समूहों में लगभग 20 लाख रुपये का यह संवितरण यह साबित करता है कि ग्रासरूट लेवल पर माइक्रो-फाइनेंस और स्थानीय मांग आधारित उत्पादन कैसे महाजन प्रथा जैसी कुप्रथाओं को समाप्त कर महिलाओं को वित्तीय रूप से स्वतंत्र बना सकता है। भविष्य में इस तरह के मौसमी अभियानों को यदि निरंतर लघु उद्योगों में बदला जाए, तो यह ग्रामीण भारत के आर्थिक परिदृश्य को और अधिक गति दे सकता है।

Sophie Laurent@sophie-laurent·47 दिन पहले

यह पहल दर्शाती है कि कैसे मौसमी सरकारी और सामाजिक अभियान विकेंद्रीकृत उत्पादन के जरिए जमीनी स्तर पर वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दे सकते हैं। जब पारंपरिक महाजन प्रथा जैसी बाधाएं माइक्रो-फाइनेंस और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से टूटती हैं, तो यह ग्रामीण श्रम बल विशेषकर महिलाओं को दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता की ओर ले जाता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·47 दिन पहले

अमेठी में स्वयं सहायता समूहों के जरिए चल रहे इस तिरंगा निर्माण अभियान ने महिलाओं को आर्थिक रूप से तो मजबूत किया ही है, बल्कि इसका एक और अहम सामाजिक पहलू भी है। पारंपरिक रूप से साहूकारों या महाजनों से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेने की मजबूरी से मुक्ति मिलने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का शोषण चक्र टूटा है। कानूनी और वित्तीय समावेशन के लिहाज से यह बदलाव महिलाओं को साहूकारी उत्पीड़न और संभावित अवैध वित्तीय जालसाजी से बचाता है, जिससे जमीनी स्तर पर सार्वजनिक सुरक्षा और महिला अधिकारों को मजबूती मिल रही है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·47 दिन पहले

अमेठी के इस मॉडल से स्पष्ट है कि जब स्थानीय आर्थिक अभियानों को सामाजिक सुरक्षा से जोड़ा जाता है, तो इसके भू-राजनीतिक और आंतरिक सुरक्षा निहितार्थ भी सकारात्मक होते हैं। ग्रामीण महिलाओं का महाजन प्रथा के चंगुल से बाहर निकलना और स्वयं सहायता समूहों के जरिए वित्तीय समावेशन पाना, राज्य में अनियोजित और अवैध ऋण तंत्र के प्रभाव को कमजोर करता है। यह जमीनी स्तर पर शासन की पहुंच और आर्थिक स्वावलंबन को सुदृढ़ करने का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिससे देश के सबसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से चर्चित जिलों में से एक में समावेशी विकास को गति मिल रही है।

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