देश में स्वच्छ ऊर्जा के ढांचे को मजबूती देने और राज्यों के बिजली नेटवर्क को आधुनिक बनाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में बुधवार को ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्वाकांक्षी पीएम धारा योजना को मंजूरी दे दी गई। इस व्यापक परियोजना का मुख्य उद्देश्य देश के विभिन्न राज्यों में ग्रीन एनर्जी के ट्रांसमिशन सिस्टम को सशक्त और उन्नत बनाना है। इसे ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज-3 (GEC-III) के नाम से भी लागू किया जा रहा है, जिस पर लगभग 1.86 लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च करने का प्रावधान रखा गया है। सरकार ने अगले 5 वर्षों के भीतर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बैटरी सेविंग और नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़ा बुनियादी ढांचा तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
135 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा और विशाल बैटरी स्टोरेज का लक्ष्य
कैबिनेट के फैसले के मुताबिक, इस योजना के जरिए राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में 135 गीगावाट तक की रिन्यूएबल एनर्जी को मुख्य ग्रिड तक सुरक्षित पहुंचाने की क्षमता विकसित की जाएगी। इसके समानांतर ही 50 गीगावाट क्षमता का बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम भी स्थापित किया जाएगा। इस बड़े बैटरी बैकअप का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि पीक ऑवर्स और जरूरत के समय तुरंत बिजली उपलब्ध कराई जा सकेगी। इससे सौर ऊर्जा के साथ जुड़ी अनियमितता की दिक्कत काफी हद तक दूर हो सकेगी, क्योंकि रात में या धूप न होने पर भी ग्रिड को निरंतर बिजली मिलती रहेगी। पूरी योजना को वित्तवर्ष 2032-33 तक पूरा करने की समयसीमा तय की गई है।
1.86 लाख करोड़ रुपये का वित्तीय ढांचा और केंद्रीय सहायता
प्रस्तावित GEC-III परियोजना पर खर्च होने वाले कुल 1.86 लाख करोड़ रुपये का एक स्पष्ट विभाजन तय किया गया है। इसमें से 1,36,378 करोड़ रुपये सीधे राज्यों के भीतर बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क के विस्तार और विकास पर खर्च होंगे। वहीं, बाकी बचे 50,000 करोड़ रुपये का उपयोग 50 गीगावाट के बैटरी स्टोरेज सिस्टम को खड़ा करने के लिए किया जाएगा। राज्यों पर इसका अत्यधिक वित्तीय भार न पड़े, इसलिए केंद्र सरकार की ओर से 54,082 करोड़ रुपये की विशेष आर्थिक मदद दी जाएगी। इस केंद्रीय सहायता के चलते बिजली ट्रांसमिशन की कुल लागत नियंत्रण में रहेगी, जिसका सीधा आर्थिक फायदा अंततः आम बिजली उपभोक्ताओं के बिजली बिलों में राहत के रूप में दिखाई देगा।
आम उपभोक्ताओं को कैसे पहुंचेगा सीधा फायदा
अक्सर देखा जाता है कि शाम के पीक समय में बिजली की मांग बहुत बढ़ जाती है, जिसके कारण ग्रिड में भीड़ और आपूर्ति की किल्लत पैदा होती है। बैटरी स्टोरेज तकनीक इस तरह की अचानक आने वाली रुकावटों और लोड की समस्या को पूरी तरह नियंत्रित करेगी। जब दिन में तेज धूप होती है, तब बनी अतिरिक्त सौर ऊर्जा इन बैटरियों में जमा हो जाएगी और सूरज ढलने के बाद भी घरों और उद्योगों को बिना रुकावट बिजली मिलती रहेगी। यह योजना साल 2035 तक देश में 900 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता तैयार करने के राष्ट्रीय लक्ष्य को पाने में भी रीढ़ साबित होगी। इससे देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को नया आधार मिलेगा और साथ ही कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कमी लाकर स्वच्छ वातावरण बनाने में मदद मिलेगी।
परियोजनाओं का क्रियान्वयन और तकनीक का संचालन मॉडल
बिजली के ट्रांसमिशन और सप्लाई के दौरान आने वाली तकनीकी रुकावटों से निपटने के लिए एक पुख्ता मॉडल तैयार किया गया है। इस परियोजना के अंतर्गत जितने भी नए ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स बनेंगे, उन्हें टैरिफ-बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग (TBCB) प्रक्रिया के जरिए आवंटित किया जाएगा। वहीं दूसरी ओर, मौजूदा ब्राउनफील्ड नेटवर्क्स के अपग्रेडेशन और उन्हें मजबूत करने वाले कार्य ‘कॉस्ट प्लस बेसिस’ (CPB) के तहत संपन्न होंगे। इस पूरी व्यवस्था में राज्य ट्रांसमिशन यूटिलिटीज (STUs) मुख्य नोडल एजेंसी के रूप में काम करेंगी, जबकि चुने गए ट्रांसमिशन सर्विस प्रोवाइडर्स (TSPs) TBCB रूट के तहत ‘बिल्ड-ऑन-ऑपरेट-मेंटेन’ (BOOM) मॉडल पर संयंत्रों और लाइनों का संचालन करेंगे।
रोजगार के नए अवसरों का निर्माण
यह विशाल परियोजना केवल बिजली की आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में औद्योगिक गतिविधियों को भी भारी गति देगी। इससे बिजली क्षेत्र के साथ-साथ उपकरण विनिर्माण और निर्माण उद्योग में बहुत बड़े स्तर पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे। बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के घरेलू निर्माण और व्यापक उपयोग से देश के अपने एनर्जी स्टोरेज उद्योग को नई उड़ान मिलेगी। इसके अलावा, राज्यों में बिजली लाइनों के संचालन, उनके रखरखाव, ग्रिड मैनेजमेंट और तकनीकी निगरानी के क्षेत्र में लंबे समय तक टिकने वाले हजारों कुशल रोजगार के मौके पैदा होंगे।













