समकालीन अंतरराष्ट्रीय संघर्षों ने दुनिया के सामने यह साबित कर दिया है कि किसी भी देश की सैन्य क्षमता केवल उसकी अग्रिम पंक्ति की सेना पर नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े हथियार निर्माण तंत्र पर निर्भर करती है। आधुनिक युद्ध केवल हथियारों की गुणवत्ता का मुकाबला नहीं हैं, बल्कि यह भी तय करते हैं कि कौन सा देश लंबे समय तक हथियारों की निर्बाध आपूर्ति बनाए रख सकता है। इसी परिप्रेक्ष्य में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने देश के रक्षा निर्माण तंत्र की मौजूदा स्थिति पर विस्तृत रूप से बात रखी है। उन्होंने रेखांकित किया कि जब युद्ध से जूझ रहा यूक्रेन हर महीने 100 मिसाइलें तैयार कर सकता है, तो भारत का साल भर में मात्र 200 या 300 मिसाइलों के उत्पादन तक सीमित रहना किसी भी स्थिति में पर्याप्त नहीं माना जा सकता। ऑपरेशन सिंदूर और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के पश्चात देश की सुरक्षा चुनौतियां पूरी तरह बदल चुकी हैं, जिसके चलते पारंपरिक मिसाइल उत्पादन को व्यापक स्तर पर बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है।
वैश्विक संघर्षों के सबक और मिसाइल निर्माण में गति की जरूरत
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के साथ-साथ ईरान और अमेरिका के मध्य उपजे तनाव ने रक्षा विशेषज्ञों को यह स्पष्ट कर दिया है कि लंबी लड़ाई लड़ने के लिए विशाल गोला-बारूद भंडार का होना अनिवार्य है। आधुनिक युद्धक्षेत्र में एक गंभीर आर्थिक विषमता भी सामने आई है, जहां दुश्मन के अपेक्षाकृत बेहद सस्ते हथियारों और ड्रोनों को मार गिराने के लिए महंगे एयर डिफेंस सिस्टम तैनात करने पड़ते हैं। इस प्रक्रिया से रक्षा बजट और युद्ध संचालन की लागत में भारी इजाफा होता है। इन अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से सीख लेते हुए भारत को अपनी रक्षा रणनीति को नई दिशा देनी पड़ रही है। जब विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यूक्रेन जैसा देश मासिक आधार पर 100 मिसाइलें तैयार करने की क्षमता हासिल कर सकता है, तो भारत को भी अपनी पारंपरिक मिसाइलों की उत्पादन क्षमता में कई गुना बढ़ोतरी करनी होगी ताकि किसी भी लंबी सैन्य चुनौती का मजबूती से सामना किया जा सके।
निजी क्षेत्र की भागीदारी और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन
देश में रक्षा उत्पादन का दायित्व अब तक मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा सार्वजनिक उपक्रमों पर ही रहा है, जिससे उत्पादन क्षमता की एक सीमा तय हो जाती थी। इस व्यवस्था में बदलाव लाते हुए सरकार ने पारंपरिक मिसाइल तकनीक को निजी क्षेत्र के लिए पूरी तरह सुलभ बना दिया है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य यह है कि देश को केवल एक या दो विनिर्माताओं पर निर्भर न रहना पड़े और कई औद्योगिक साझेदार एक साथ मिलकर बड़े पैमाने पर मिसाइल निर्माण शुरू कर सकें। इसके साथ ही रक्षा क्षेत्र में नए विचारों और उन्नत तकनीकों को शामिल करने के लिए आईडेक्स योजना के माध्यम से अब तक 2,800 करोड़ रुपये के अनुबंध आवंटित किए जा चुके हैं। इन अनुबंधों के जरिए युवा स्टार्टअप्स को आधुनिक हथियारों और रक्षा उपकरणों के विकास में सीधे तौर पर जोड़ा जा रहा है, जिससे आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को तेजी से हासिल किया जा सके।
हथियारों के आयात का जोखिम और आत्मनिर्भरता की राह
विदेशी हथियारों पर लगातार निर्भरता को रणनीतिक दृष्टि से एक बड़ा जोखिम माना गया है। यदि कोई सहयोगी देश संकट के समय अप्रत्याशित रुख अपना ले, तो विदेशी हथियारों पर निर्भरता देश की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। आर्टिलरी यानी तोपों के निर्माण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत ने पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है, लेकिन लड़ाकू विमानों के जेट इंजन जैसे अति-संवेदनशील और जटिल क्षेत्रों में देश को अभी भी अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के सहयोग की आवश्यकता बनी रहेगी। इस अंतर को पाटने के लिए वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों और नीति निर्माताओं को मिलकर एक समग्र घरेलू रक्षा तंत्र विकसित करना होगा, जहां रक्षा उद्योग के सभी घटक मिलकर राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकें।
थिएटर कमान और तीनों सेनाओं के बीच समन्वय
संयुक्त थिएटर कमान के गठन को लेकर तीनों सेनाओं के भीतर अपनी पहचान खोने की आशंकाओं पर भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की गई है। रक्षा सचिव ने इस बात की पुष्टि की है कि सेनाओं के एकीकरण से थलसेना, नौसेना या वायुसेना में से किसी की भी विशिष्ट पहचान समाप्त नहीं होगी। इस प्रक्रिया का मुख्य केंद्र लॉजिस्टिक्स, आपूर्ति व्यवस्था और संयुक्त प्रशिक्षण जैसे महत्वपूर्ण मोर्चों पर तालमेल स्थापित करना है। तीनों अंगों के बीच इस प्रकार का सुदृढ़ एकीकरण भविष्य के बहु-आयामी युद्धों में भारतीय सैन्य बलों की परिचालन क्षमता और मारक प्रभाव को कहीं अधिक घातक और प्रभावी बनाएगा।

















