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हिमाचल प्रदेश में नौ ग्लेशियर झीलें बनीं गंभीर खतरा, आईआईटी मंडी की चौंकाने वाली रिपोर्ट में हुआ खुलासाहिमाचल प्रदेश
4 सित॰ 2026, 3:43 pm (18 दिन पहले)· 2

हिमाचल प्रदेश में नौ ग्लेशियर झीलें बनीं गंभीर खतरा, आईआईटी मंडी की चौंकाने वाली रिपोर्ट में हुआ खुलासा

आईआईटी मंडी के शोध के अनुसार हिमाचल प्रदेश में नौ ग्लेशियर झीलें तेजी से पिघलकर खतरनाक रूप ले रही हैं। पिछले एक दशक में इनकी संख्या और आकार में भारी वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे निचले इलाकों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में पर्यावरण में आ रहे लगातार बदलावों के बीच नौ ग्लेशियर झीलें अत्यंत तीव्र गति से पिघलती हुई बड़ी चिंता का विषय बन गई हैं। हिमालयी क्षेत्र के भीतर स्थित इन जल स्रोतों का लगातार फैलता हुआ आकार आने वाले समय में बड़ी तबाही का संकेत दे रहा है। पिछले दस वर्षों के दौरान इन झीलों के क्षेत्रफल में विस्तार होने के साथ-साथ इनकी कुल संख्या में भी तीस प्रतिशत की भारी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है, जो विशेषज्ञों के लिए चिंताजनक स्थिति है।

आईआईटी मंडी के शोध में हुआ बड़ा खुलासा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के शोधकर्ताओं ने उपग्रह से प्राप्त चित्रों और अन्य तकनीकी माध्यमों से जुटाए गए आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद यह अध्ययन तैयार किया है। अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि प्राकृतिक और मानवीय कारणों से उत्पन्न हो रही इन खतरनाक परिस्थितियों के कारण यदि इन झीलों से अचानक पानी बाहर निकलता है, तो मैदानी और निचले इलाकों में भयंकर तबाही आ सकती है।

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ये नौ झीलें बन सकती हैं वाटर बॉम्ब

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के शोधकर्ता प्रोफेसर डॉ डेरिक्स पी. शुक्ला ने जानकारी देते हुए बताया कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में हिमालयी क्षेत्रों में झीलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इनकी कुल संख्या दो हजार के करीब पहुंच चुकी है। इन सभी में से चंबा और लाहुल जिलों की सीमा पर बनी कालीकुंड, चंद्रताल, वासुकी, सुरई, क्या त्सो, योचे, समुद्रा टापू, कासंगा और गेपांग गाथ नाम की कुल नौ झीलें ऐसी हैं जो किसी भी समय वाटर बॉम्ब के रूप में फट सकती हैं। इन झीलों के फटने या जलस्तर अचानक बढ़ने से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरे की जद में पंद्रह से ज्यादा पुल, कई घनी आबादी वाले गांव तथा महत्वपूर्ण शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य संस्थान आ रहे हैं।

विस्तार और संवेदनशीलता के आंकड़े

शोधकर्ता शुक्ला ने बताया कि गेपांग गाथ झील में हिमनद पिघलने के कारण इसका दायरा दो लाख चौवालीस हजार वर्ग मीटर तक बढ़ गया है। इसके अलावा कासंग झील में डेढ़ लाख वर्ग मीटर और कालीकुंड झील में एक लाख बीस हजार वर्ग मीटर क्षेत्र की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि कालीकुंड झील की ढलान बहुत अधिक खड़ी होने के कारण इन सभी में सबसे अधिक संवेदनशील स्थिति में है। प्रोफेसर शुक्ला ने आगे बताया कि सरकारी संस्थानों जैसे केंद्रीय जल आयोग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के रिकॉर्ड के अनुसार हिमाचल में फिलहाल केवल चार ही झीलें संवेदनशील दायरे में मानी जाती हैं, जिनमें से तीन झीलें अकेले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के शोध डाटा में भी शामिल हैं।

पर्यटकों की बढ़ती भीड़ भी है मुख्य वजह

पिछले कई वर्षों से सैटेलाइट तस्वीरों और भूगर्भीय पद्धतियों के माध्यम से इन ग्लेशियर झीलों में हो रहे बदलावों का अध्ययन कर रहे प्रोफेसर डॉ डेरिक्स पी. शुक्ला ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक और मानवीय दोनों प्रकार की आपदाएं इन हिमनदों के तेजी से पिघलने के मुख्य कारण हैं। प्राकृतिक कारणों में भूकंप और लगातार होने वाले भूस्खलन शामिल हैं, जबकि मानवीय कारणों में पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यटकों की लगातार बढ़ती हुई आमद प्रमुख है। डॉक्टर शुक्ला के अनुसार पहाड़ों में पर्यटकों के आने से वहां धूल का जमाव भी काफी बढ़ गया है और यही धूल ग्लेशियरों के बेहद तेजी से पिघलने का एक प्रमुख कारण बन रही है। आज के समय में आधुनिक तकनीक की मदद से इन बदलावों को देखना और समझना तो बिल्कुल आसान हो चुका है, लेकिन इन प्राकृतिक धरोहरों को बचाने के लिए जमीनी स्तर पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है, जिसके लिए सरकारों को आगे आना ही होगा।

सवाल-जवाब

हिमाचल प्रदेश में कितनी ग्लेशियर झीलें खतरे का कारण बनी हैं?
हिमाचल प्रदेश में कुल नौ ग्लेशियर झीलें सामान्य से अधिक तेजी से पिघलकर गंभीर खतरा बन चुकी हैं।
किस संस्थान ने इन झीलों पर यह अध्ययन किया है?
यह अध्ययन आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं द्वारा सैटेलाइट और अन्य तकनीकी आंकड़ों के आधार पर किया गया है।
पिछले दस सालों में इन झीलों में क्या बदलाव आया है?
पिछले दस वर्षों में इन झीलों के आकार में विस्तार होने के साथ इनकी संख्या में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
कौन-कौन सी प्रमुख झीलें इस खतरे के दायरे में हैं?
चंबा और लाहुल की सीमा पर स्थित कालीकुंड, चंद्रताल, वासुकी, सुरई, क्या त्सो, योचे, समुद्रा टापू, कासंगा और गेपांग गाथ झीलें शामिल हैं।
ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का मुख्य कारण क्या बताया गया है?
भूकंप, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ पहाड़ों में पर्यटकों की बढ़ती आमद और धूल का जमाव इसका मुख्य कारण है।
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