तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में हुसैन सागर झील के तट पर स्थापित डॉ. बी.आर. अंबेडकर की 125 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा स्थानीय निवासियों और देशभर से आने वाले पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण बन गई है। यह भव्य स्मारक न केवल शहर के परिदृश्य को निखार रहा है, बल्कि भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ. भीमराव अंबेडकर के आदर्शों, विचारों और उनके ऐतिहासिक सामाजिक संघर्षों को भी जीवंत करता है। इस पूरे स्मारक परिसर को हुसैन सागर के खूबसूरत किनारे पर तैयार किया गया है।
संसद भवन की तर्ज पर बना 50 फीट ऊंचा आधार
इस स्मारक की सबसे बड़ी वास्तुकला संबंधी विशेषता इसका 50 फीट ऊंचा वृत्ताकार चबूतरा है। इस चबूतरे की बनावट दिल्ली में स्थित पुराने संसद भवन की रूपरेखा पर आधारित रखी गई है। जब 125 फीट ऊंची मुख्य प्रतिमा को इस 50 फीट ऊंचे आधार के साथ मिलाकर देखा जाता है, तो पूरे स्मारक की कुल ऊंचाई 175 फीट हो जाती है। मूर्तिकला में बाबासाहेब के एक हाथ में भारत का संविधान थमा हुआ दिखाया गया है। इस पूरे प्रोजेक्ट का निर्माण लगभग 11.7 एकड़ के विस्तृत और हरे-भरे क्षेत्र में किया गया है, जिसकी कुल निर्माण लागत करीब 146 करोड़ रुपये आई है। इस ऐतिहासिक स्थल का औपचारिक उद्घाटन 14 अप्रैल 2023 को बाबासाहेब की 132वीं जयंती के अवसर पर संपन्न हुआ था।
आधार के भीतर आधुनिक म्यूजियम और लाइब्रेरी
पुराने संसद भवन जैसे दिखने वाले इस गोलाकार आधार के आंतरिक हिस्से में एक अत्याधुनिक म्यूजियम और एक विशाल लाइब्रेरी स्थापित की गई है। यहां आने वाले अध्ययनकर्ता और पर्यटक डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन सफर, उनके विचारों और संविधान निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेजों को गहराई से समझ सकते हैं। इसके अलावा, परिसर में आने वाले बुजुर्गों और दिव्यांगजनों की आवाजाही को सहज और आसान बनाने के लिए लिफ्ट और एस्केलेटर की आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं।
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के मूर्तिकारों का हुनर और मुफ्त प्रवेश
इस विशाल कांस्य प्रतिमा की डिजाइनिंग देश के जाने-माने मूर्तिकार राम वनजी सुतार और उनके सुपुत्र अनिल राम सुतार द्वारा की गई है। उल्लेखनीय है कि राम वनजी सुतार वही प्रख्यात कलाकार हैं जिन्होंने गुजरात में दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की डिजाइन तैयार की थी। इस प्रतिमा की मजबूती और दीर्घायु सुनिश्चित करने के लिए इसके ढांचे में लगभग 360 टन स्टील और 114 टन कांसे का उपयोग किया गया है। शाम ढलते ही जब यह स्मारक रंग-बिरंगी लाइटों की रोशनी से जगमगाता है, तो हुसैन सागर झील का दृश्य और भी मनोरम हो जाता है। यहां आने वाले सभी दर्शकों के लिए प्रवेश पूरी तरह से निशुल्क रखा गया है।



















