अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर पश्चिम एशिया के तनाव ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान खींचा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वैश्विक मंच से ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार करते हुए सीधे तौर पर चेतावनी दी है। अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट कहा कि ईरान को या तो शांति का रास्ता चुनना होगा अथवा गंभीर महाविनाश का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। इस कड़े बयान के तुरंत बाद ईरान की सेना ने तीखी प्रतिक्रिया दर्ज कराई। ईरानी सेना की ओर से कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति की यह धमकी यह साबित करती है कि वॉशिंगटन की रणनीति पूरी तरह एक अंधी गली में फंस चुकी है। ईरानी सेना ने यह भी जोड़ा कि वे पहले से कहीं अधिक तीव्र और जोरदार हमलों के साथ जवाब देने के लिए तैयार हैं।
धमकी भरे इस भाषण के फौरन बाद कूटनीतिक गलियारे में एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली। भाषण के बाद पत्रकारों से चर्चा करते हुए डोनाल्ड ट्रम्प ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान अमेरिकी अधिकारियों और ईरानी नेताओं के बीच तीन घंटे तक सकारात्मक और विस्तृत बातचीत हुई है। उन्होंने यह भी साझा किया कि दोनों पक्षों के बीच बहुत जल्द एक और दौर की बैठक आयोजित की जाएगी। इस बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़श्कियान न्यूयॉर्क पहुंच चुके हैं। वे वैश्विक मंच के सामने यह पक्ष रखने की तैयारी में हैं कि किस प्रकार अमेरिका और इज़राइल ने 28 फरवरी से ईरान के ऊपर कहर बरपाना शुरू किया था। संयुक्त राष्ट्र में बोलते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह उम्मीद भी जताई कि नवंबर के अमेरिकी चुनाव संपन्न होने के बाद ईरान के साथ एक औपचारिक समझौता हो जाएगा, हालांकि साथ ही उन्होंने यह संदेश भी दिया कि वे किसी सैन्य संघर्ष से पीछे नहीं हट रहे हैं।
खाड़ी का भू-राजनीतिक संकट और ऊर्जा आपूर्ति की चिंताएं
कूटनीतिक विश्लेषक इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिकी रुख के अंतर्विरोधों को रेखांकित कर रहे हैं। एक तरफ जहां मंच से ऐसी तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई मानो अमेरिका ने ईरान के खिलाफ संघर्ष में बढ़त हासिल कर रखी है और स्थितियां पूरी तरह नियंत्रण में हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरानी नेतृत्व को वार्ता के लिए आमंत्रित किया गया। इतिहास गवाह है कि दोनों देशों के बीच पूर्व में भी कई बार वार्ता के दौर चले और फिर टूटे हैं, जिससे यह असमंजस बना रहता है कि क्या वास्तव में किसी ठोस नतीजे तक पहुंचने की मंशा है। यदि न्यूयॉर्क में मसूद पेज़श्कियान और अमेरिकी नेतृत्व के बीच बातचीत किसी सकारात्मक मोड़ पर पहुंचती है, तो इससे व्यापक अंतरराष्ट्रीय राहत मिल सकती है। दुनिया भर की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि खाड़ी क्षेत्र का संकट समाप्त हो, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में वाणिज्यिक जहाजों का आवागमन निर्बाध रूप से बहाल हो और तेल टैंकर सामान्य आपूर्ति सुनिश्चित कर सकें। वैश्विक आपूर्ति शृंखला को पटरी पर लाने के लिए धमकियों के स्थान पर व्यावहारिक और सकारात्मक समाधान तलाशने की दरकार है।
जमुई में नाबालिग से दरिंदगी और पुलिसिया कार्यप्रणाली पर सवाल
देश के भीतर कानून व्यवस्था के मोर्चे पर बिहार के जमुई से सामने आए एक गंभीर मामले ने पुलिस की मुस्तैदी पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। जमुई में एक नाबालिग लड़की के साथ खुलेआम बदसलूकी करने वाले आरोपियों के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई हुई है। इस मामले में संलिप्त एक अपराधी का हाफ एनकाउंटर हुआ जबकि दूसरे के पैर टूट गए। इन दोनों मुख्य आरोपियों की पहचान नंदन यादव और हरेराम यादव के रूप में हुई है। यह पूरा मामला 19 सितम्बर को घटित हुआ था, जहां आरोपियों ने वारदात का वीडियो तैयार किया और बाद में उसे सोशल मीडिया मंचों पर प्रसारित कर दिया। जब यह फुटेज सार्वजनिक हुआ, तब जाकर पुलिस प्रशासन हरकत में आया और आरोपियों की पहचान स्थापित की जा सकी।
इस सिलसिले में पुलिस ने पहले तीन नाबालिग लड़कों को अपनी हिरासत में लिया था। पकड़े गए लड़कों से सघन पूछताछ के आधार पर पुलिस मंडवा पहाड़ी इलाके तक पहुंची, जहां नंदन यादव और हरेराम यादव के साथ मुठभेड़ हुई। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यदि आरोपी खुद इस कृत्य का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा न करता, तो संभवतः यह जघन्य अपराध कभी सामने ही नहीं आ पाता। स्थानीय युवतियों ने मांग उठाई है कि नंदन यादव और उसके सहयोगियों को ऐसी कड़ी सजा दी जाए जो समाज में मिसाल बने ताकि भविष्य में कोई ऐसा दुस्साहस न कर सके।
जांच में यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि जिस आरोपी के पैर में गोली लगी है, वह आदतन और पेशेवर अपराधी रहा है। बिहार में मद्यनिषेध कानून लागू होने के बावजूद वह अवैध रूप से शराब बेचने और खुद पीने के धंधे में लगा था, साथ ही आपत्तिजनक वीडियो बनाकर इंटरनेट पर डालता था। उसके पुराने रिकॉर्ड से पता चला है कि वह पहले भी लड़कियों के अपहरण और ब्लैकमेलिंग जैसे गंभीर कृत्यों में शामिल रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब वह लगातार इस तरह की गैरकानूनी गतिविधियों को अंजाम दे रहा था, तब स्थानीय पुलिस को इसकी भनक क्यों नहीं लगी। पुलिस की जिम्मेदारी केवल अपराध घटित होने के बाद कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि समय रहते आपराधिक घटनाओं को रोकने की भी होती है, जिसमें स्थानीय स्तर पर बड़ी चूक दिखाई दी।
उत्तर प्रदेश में 3,567 शिक्षकों को नियुक्ति पत्र और पारदर्शी व्यवस्था का दावा
उत्तर प्रदेश में युवाओं को सरकारी सेवा से जोड़ने की दिशा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजधानी लखनऊ में एक बड़े कार्यक्रम के तहत 3,567 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र वितरित किए। ये चयनित अभ्यर्थी सहायता प्राप्त अशासकीय माध्यमिक विद्यालयों में प्रधानाचार्य, हेडमास्टर, प्रवक्ता और सहायक अध्यापक के पदों पर अपनी सेवाएं देंगे। नियुक्ति पत्र वितरण के दौरान मुख्यमंत्री ने रेखांकित किया कि इन युवाओं का चयन किसी सरकारी अनुग्रह का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उनकी अपनी कड़ी मेहनत और योग्यता की बदौलत संभव हुआ है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भर्ती प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता बरती गई है और एक सुरक्षित एवं फूल-प्रूफ तंत्र तैयार किया गया है।
प्रशासनिक स्तर पर इस बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि नियुक्ति प्रक्रिया के अंतिम चरण में किसी प्रकार की अवैध वसूली न हो। चूंकि चयनित अभ्यर्थियों को सहायता प्राप्त निजी प्रबंधन वाले स्कूलों में पदभार ग्रहण करना है, जहां ज्वाइनिंग का दायित्व स्कूल प्रबंधन के पास होता है, इसलिए भ्रष्टाचार की आशंका बनी रहती है। इसी को भांपते हुए मुख्यमंत्री ने सीधे तौर पर चेतावनी जारी की कि यदि पदभार ग्रहण कराने के नाम पर किसी भी विद्यालय का प्रबंधक धन की मांग करता है या कोई प्रशासनिक अधिकारी परेशान करता है, तो अभ्यर्थी सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय में शिकायत दर्ज कराएं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे तत्वों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की जाएगी और उन्हें सीधे कारागार भेजा जाएगा।
प्रयागराज में टीजीटी-पीजीटी अभ्यर्थियों का आंदोलन और नियमों पर आश्वासन
शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी अन्य चुनौतियों के समाधान के संदर्भ में मुख्यमंत्री ने प्रयागराज में चल रहे छात्र आंदोलन का संज्ञान लिया। प्रयागराज में प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक और प्रवक्ता पद के अभ्यर्थी 5 सितंबर से अनवरत धरने पर बैठे हुए हैं और 16 दिनों से पुराने भर्ती नियमों को बहाल करने की मांग कर रहे हैं। आंदोलनकारी युवाओं का मुख्य बिंदु यह है कि लगभग 20 हजार पदों के लिए जारी होने वाले भर्ती विज्ञापन को पूर्व नियमों के तहत लाया जाए। दरअसल, पूर्व में कुछ विषयों की परीक्षाओं में बीएड की डिग्री अनिवार्य नहीं थी, जिसे नए नियमों में अनिवार्य बना दिया गया है। छात्रों का तर्क है कि बीएड पाठ्यक्रम पूरा करने में दो वर्ष का समय लगता है, जिसके चलते नए प्रावधान लागू होने पर लाखों योग्य उम्मीदवार तत्काल परीक्षा में बैठने से वंचित हो जाएंगे। इस विषय पर मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि सरकार अभ्यर्थियों की मांग पर विचार कर रही है और संबंधित अधिकारियों को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद को पत्र भेजकर नियमों में आवश्यक संशोधन कराने के निर्देश दिए जा चुके हैं।
भर्ती व्यवस्था में सुधार के साथ-साथ इस मंच से राजनीतिक बयानबाजी भी देखने को मिली। पूर्ववर्ती सरकारों की कार्यप्रणाली पर कटाक्ष करते हुए कहा गया कि पहले नौकरियों के लिए राजनीतिक सिफारिशों और अवैध धन के लेन-देन का दौर चलता था। वर्तमान व्यवस्था में इसे समाप्त करने का दावा करते हुए अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को निशाने पर लिया गया। इसी क्रम में शिवपाल सिंह यादव का उल्लेख करते हुए अन्य नेताओं की पुरानी टिप्पणियों का हवाला दिया गया, जिसमें पूर्व के दौर में भर्तियों के दौरान नकदी के प्रबंधन को लेकर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए गए थे।





















