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इस्तीफा देने वालीं आईएएस दिव्या मित्तल ने गिनाए वो 9 सबक, जो स्कूल-कॉलेज कभी नहीं सिखातेभारत
5 सित॰ 2026, 11:09 am (26 दिन पहले)· 3

इस्तीफा देने वालीं आईएएस दिव्या मित्तल ने गिनाए वो 9 सबक, जो स्कूल-कॉलेज कभी नहीं सिखाते

आईआईटी दिल्ली, आईआईएम बैंगलोर और यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षाएं पार करने वालीं आईएएस अफसर दिव्या मित्तल का पुराना पोस्ट शिक्षक दिवस 2026 पर फिर वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने बताया कि डिग्रियों ने उन्हें जिंदगी के 9 सबसे जरूरी सबक कभी नहीं सिखाए.

आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग, आईआईएम बैंगलोर से मैनेजमेंट की पढ़ाई और फिर देश की सबसे मुश्किल परीक्षा यूपीएससी पास करके सरकारी अफसर बनना, यह सफर किसी को भी सबसे कामयाब इंसानों की फेहरिस्त में खड़ा कर देता है. लेकिन इसी सफर से गुजर चुकीं आईएएस अफसर दिव्या मित्तल कहती हैं कि इतनी बड़ी डिग्रियों के बावजूद जिंदगी के कुछ सबसे जरूरी सबक उन्हें कभी क्लासरूम में नहीं मिले. शिक्षक दिवस 2026 के मौके पर उनका पुराना सोशल मीडिया पोस्ट एक बार फिर लोगों के बीच जमकर शेयर हो रहा है.

दिव्या मित्तल इन दिनों दो वजहों से सुर्खियों में हैं. पहला, उन्होंने हाल ही में प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया. दूसरा, उनका एक पुराना पोस्ट अब वायरल हो गया है, जिसमें उन्होंने अपनी पढ़ाई की सबसे बड़ी कमी की तरफ इशारा किया है. दिव्या सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहती हैं और उनकी बातें अक्सर लोगों को खूब पसंद आती हैं.

कठिन परीक्षाएं पास कीं, पर मन को संभालना नहीं सीखा

दिव्या मित्तल ने अपने पुराने पोस्ट में लिखा था, "It never taught me how to quiet my own mind or handle loneliness." यानी उनकी पढ़ाई ने उन्हें बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां संभालना तो सिखाया, लेकिन अपने मन को शांत रखना या अकेलेपन से निपटना नहीं सिखाया. उनके मुताबिक हम सालों तक सिर्फ हासिल करने की ट्रेनिंग लेते रहते हैं, लेकिन अंदर से खुश और संतुलित कैसे रहा जाए, इसके लिए एक दिन भी अलग से खर्च नहीं किया जाता.

भावनाओं को दबाना सिखाया, समझना नहीं

दिव्या के मुताबिक स्कूलों में शांत बैठे रहने को ही अच्छे बर्ताव और अनुशासन की निशानी मान लिया जाता है. बच्चे केमिस्ट्री की पीरियॉडिक टेबल तो जुबानी याद कर लेते हैं, लेकिन दिल टूटने पर अंदर क्या रासायनिक प्रतिक्रिया चलती है, यह कोई नहीं समझाता. भावनाओं को जताने की बजाय उन्हें दबाना सिखाया जाता है. इसी का नतीजा यह होता है कि उम्र बढ़ने के साथ जब जिंदगी में कोई बड़ी मुश्किल आती है, तो लोग खुद को संभाल नहीं पाते और बिखर जाते हैं.

ना कहना और अपनी सीमाएं तय करना कोई नहीं सिखाता

स्कूली दिनों में लंबे-लंबे निबंध लिखने का अभ्यास खूब कराया जाता है, मगर किसी बात पर साफ इनकार करना या अपनी तकलीफ को शब्दों में बयां करना कभी नहीं सिखाया जाता. दिव्या का कहना है कि नौकरी में जब बॉस बदतमीजी करता है या कोई सहकर्मी परेशान करता है, तो उससे कैसे निपटा जाए और अपनी सीमाएं कैसे खींची जाएं, इसकी कोई ट्रेनिंग किसी संस्थान में नहीं दी जाती.

रटे-रटाए जवाब नहीं, सही सवाल पूछना जरूरी

क्लासरूम में हमेशा उसी बच्चे की तारीफ होती है जिसके पास हर सवाल का पहले से तैयार जवाब मौजूद हो. लेकिन असल दुनिया में वही आगे निकलता है जो सही वक्त पर सही सवाल उठाना जानता है. दिव्या बताती हैं कि बिना सवाल किए हर बात मान लेने की यही आदत आगे चलकर लोगों को बिना सोचे-समझे दूसरों की राय अपनाने पर मजबूर कर देती है.

पैसे की समझ और कर्ज से बचना सिलेबस में नहीं

गणित की क्लास में एक्स की वैल्यू निकालने वाले समीकरण खूब हल कराए जाते हैं, लेकिन खुद को कर्ज के जाल में फंसने से कैसे बचाया जाए, यह किसी किताब में नहीं होता. दिव्या के मुताबिक पैसों की सही समझ सिर्फ ज्यादा कमाई से नहीं आती, बल्कि फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने और पैसों को लेकर मानसिक शांति बनाए रखने से आती है, और यह विषय स्कूली पाठ्यक्रम में कहीं शामिल ही नहीं है.

खुद से किया वादा ही असली अनुशासन है

स्कूल की पूरी व्यवस्था टाइमटेबल पर टिकी होती है, जहां हर वक्त कोई न कोई बता देता है कि अभी क्या करना है. लेकिन बड़े होकर जब कोई निगरानी करने वाला नहीं होता, तब ज्यादातर लोग रास्ता भटक जाते हैं. दिव्या का मानना है कि असली अनुशासन किसी के डर से नहीं आता, बल्कि खुद से किए गए वादों को निभाने से आता है.

अकेलापन सजा नहीं, खुद को जानने का मौका है

स्कूल के दिनों में इंसान हमेशा दोस्तों के झुंड से घिरा रहता है, इसलिए बड़े होकर जब जिंदगी में अचानक सन्नाटा आता है, तो वह डरा देता है. दिव्या कहती हैं कि स्कूल ने कभी नहीं सिखाया कि खुद का सबसे अच्छा दोस्त कैसे बना जाए, जबकि अकेला होना उदासी की निशानी नहीं, बल्कि खुद से जुड़ने का सबसे कीमती मौका होता है.

लोगों के असली इरादे पहचानने की सीख भी गायब

बचपन की दोस्तियां बेहद मासूम और बेलौस होती हैं, लेकिन बड़े होते ही दुनिया पूरी तरह बदल जाती है. स्कूल कभी यह नहीं सिखाता कि किसी के व्यवहार के पीछे छिपे असली इरादों और उसके नकाब को कैसे पहचाना जाए. यही वजह है कि बड़े होकर बहुत से लोग रिश्तों में खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं.

शरीर के लिए पीटी, मन के लिए कुछ नहीं

स्कूल में शरीर को फिट रखने के लिए पीटी और खेल की क्लासें तो होती हैं, लेकिन मन और आत्मा की सेहत के लिए कुछ भी नहीं पढ़ाया जाता. यही वजह है कि लोग थकने के बावजूद खुद को धकेलते रहना सीख लेते हैं, जो आगे चलकर बर्नआउट की स्थिति तक पहुंचा देता है. दिव्या के मुताबिक यह पहचानना बेहद जरूरी है कि तनाव कब हद से बाहर जा रहा है और कब मदद मांगने की जरूरत है.

मेडल और डिग्री से परे खुद को पहचानना ही असली शिक्षा

दिव्या मित्तल के मुताबिक हम पूरी जिंदगी सिर्फ टॉपर या अव्वल बनने की होड़ में दौड़ते रहते हैं, लेकिन बिना किसी मेडल या डिग्री के हम असल में कौन हैं, यह जानने की कोशिश ही नहीं करते. उनका कहना है कि दुनिया के बताए हुए रास्तों पर आंख मूंदकर चलने से पहले यह समझना बेहद जरूरी है कि हमारे अपने मन को असल में क्या चाहिए, और यही सबसे बड़ी सीख है जो किसी किताब में नहीं मिलती.

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सवाल-जवाब

दिव्या मित्तल कौन हैं?
दिव्या मित्तल एक आईएएस अफसर हैं जिन्होंने आईआईटी दिल्ली से बीटेक, आईआईएम बैंगलोर से एमबीए किया और फिर यूपीएससी पास कर प्रशासनिक सेवा में गईं.
उनका पोस्ट अभी वायरल क्यों हो रहा है?
शिक्षक दिवस 2026 के मौके पर उनका पुराना सोशल मीडिया पोस्ट फिर से लोगों के बीच शेयर होने लगा है.
दिव्या मित्तल ने कब इस्तीफा दिया?
उन्होंने हाल ही में प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया, हालांकि इसकी सही तारीख या वजह लेख में नहीं बताई गई है.
उन्होंने कुल कितने सबक गिनाए हैं?
उन्होंने अपनी पढ़ाई में मिसिंग रहीं 9 अहम बातों का जिक्र किया है.
उनके मुताबिक स्कूल-कॉलेज में सबसे बड़ी कमी क्या है?
उनके मुताबिक स्कूल-कॉलेज सिर्फ एग्जाम पास करना और उपलब्धियां हासिल करना सिखाते हैं, लेकिन मन को शांत रखना, भावनाओं को समझना और खुद को जानना नहीं सिखाते.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·25 दिन पहले

एक शीर्ष नौकरशाह का प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर इस तरह मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तिगत सीमाओं और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाना यह रेखांकित करता है कि हमारी पारंपरिक शिक्षा प्रणाली केवल पेशेवर रोबोट तैयार कर रही है, इंसानी संतुलन नहीं। अकादमिक और प्रतियोगी परीक्षाओं की यह अंधी दौड़ आने वाले समय में कार्यस्थलों पर मानसिक तनाव और बर्नआउट के मामलों को और बढ़ाएगी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अब हमारी शिक्षा नीति में व्यावहारिक जीवन कौशल को अनिवार्य रूप से शामिल करने का समय आ गया है।

Ravikash Gupta@ravikash·25 दिन पहले

वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर मेरा मानना है कि आईएएस दिव्या मित्तल का यह कदम सिर्फ एक व्यक्तिगत इस्तीफा नहीं, बल्कि भारत के कॉर्पोरेट और प्रशासनिक ढांचे के लिए एक गंभीर चेतावनी है। जब देश की सबसे कठिन परीक्षाएं पास करने वाले शीर्ष अधिकारी मानसिक दबाव और बर्नआउट के चलते व्यवस्था से बाहर होने लगते हैं, तो यह सीधे तौर पर हमारे कार्यस्थलों के उत्पादकता मॉडल पर सवाल उठाता है। यदि आने वाले समय में कंपनियों और सरकारी संस्थानों ने अपने मानव संसाधन प्रबंधन में भावनात्मक कल्याण और मानसिक संतुलन को प्राथमिकता नहीं दी, तो यह बढ़ता तनाव कार्यक्षमता को बुरी तरह प्रभावित करेगा और संस्थागत अस्थिरता को बढ़ाएगा।

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