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जलवायु संकट की कोई सरहद नहीं, स्वस्थ पर्यावरण पाना हर नागरिक का मौलिक हक: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांतभारत
20 सित॰ 2026, 3:56 pm (11 दिन पहले)· 1

जलवायु संकट की कोई सरहद नहीं, स्वस्थ पर्यावरण पाना हर नागरिक का मौलिक हक: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण विकास में बाधक नहीं बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा है।

जलवायु संकट और पर्यावरण क्षरण से जुड़े संकट किसी एक देश की सीमा के भीतर कैद नहीं रहते, बल्कि इनका असर पूरी धरती पर एक समान पड़ता है। नई दिल्ली में आयोजित एक उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि प्रकृति के संरक्षण को औद्योगिक या आर्थिक विकास की रुकावट नहीं माना जा सकता। विकास की हर योजना को सतत विकास के बुनियादी सिद्धांतों पर खरा उतरना होगा, जिसमें प्रकृति और समाज दोनों के प्रति ठोस जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका, विज्ञान जगत और नीति निर्माताओं को एक साथ मिलकर ऐसे उपाय तलाशने होंगे जो वर्तमान के साथ आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित बना सकें।

सांस्कृतिक परंपरा और संवैधानिक व्यवस्था में प्रकृति का स्थान

पर्यावरण रक्षा के कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए चीफ जस्टिस ने बताया कि भारत के लिए प्रकृति का सम्मान कोई नया विचार नहीं है, बल्कि यह देश की हजारों साल पुरानी सभ्यतागत परंपरा का अभिन्न अंग रहा है। आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे में हमारे संविधान निर्माताओं ने भी इस महत्व को बखूबी समझा और इसे कानूनी रूप दिया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(g) का विशेष रूप से उल्लेख किया। इन संवैधानिक अनुच्छेदों के तहत जहां एक तरफ राज्य व्यवस्था को वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया है, वहीं दूसरी तरफ देश के प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य तय किया गया है कि वह जीवित प्राणियों के प्रति दयाभाव रखे और पर्यावरण की रक्षा करे।

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सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने समय के साथ पर्यावरण न्यायशास्त्र को काफी विस्तार दिया है। अदालत ने अपने कई फैसलों में यह स्पष्ट स्थापित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मिलने वाला जीवन का अधिकार केवल सांस लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए प्रदूषणमुक्त और स्वस्थ पर्यावरण पाना भी प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार है।

न्यायिक सिद्धांत और पर्यावरण बहाली की दिशा में बढ़ते कदम

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पर्यावरण की रक्षा के लिए अदालतों द्वारा स्थापित प्रमुख कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित किया। इनमें एहतियाती सिद्धांत यानी प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल, प्रदूषण फैलाने वाले से ही भरपाई कराने का सिद्धांत यानी पोल्यूटर पेज प्रिंसिपल, बिना किसी छूट के पूर्ण उत्तरदायित्व यानी एब्सोल्यूट लायबिलिटी और सार्वजनिक संपदा की रक्षा से जुड़ा पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन शामिल हैं। इन कानूनी पैमानों ने औद्योगिक गतिविधियों को नियंत्रित करने और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को रोकने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा कि अब पर्यावरण न्यायशास्त्र का दायरा सिर्फ पेड़ों के कटने या प्रदूषण को रोकने के पुराने तौर-तरीकों तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक न्याय प्रणाली अब क्षति की भरपाई, नष्ट हुए पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्बहाली, स्वतंत्र विशेषज्ञों की सतत निगरानी, आर्थिक मुआवजा और सख्त कानूनी जवाबदेही तय करने पर केंद्रित हो चुकी है। इसके अलावा न्यायपालिका अब पारिस्थितिकी केंद्रित आनुपातिकता यानी इकोसेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी के नजरिए को भी अपना रही है, जिसमें भविष्य के संभावित खतरों और जमीन की व्यावहारिक हकीकत के बीच वैज्ञानिक संतुलन साधा जाता है।

वैश्विक साझेदारी और साझा अनुभवों का महत्व

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी द्वारा ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ विषय पर आयोजित इस वैश्विक सम्मेलन में कई देशों के प्रतिनिधि, न्यायाधीश, पर्यावरण वैज्ञानिक, कानूनविद और वरिष्ठ नीति निर्माता शामिल हुए। सम्मेलन में पर्यावरण शासन, कानूनी सुधार और जलवायु परिवर्तन की नई चुनौतियों पर गहन विचार-विमर्श हुआ।

सीजेआई ने इस बात पर विशेष बल दिया कि विभिन्न न्यायक्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय मंचों के बीच निरंतर संवाद बना रहना चाहिए। जब अलग-अलग देशों के विशेषज्ञ अपने सबसे सफल प्रयोगों और कार्यप्रणालियों को आपस में साझा करेंगे, तभी दुनिया भर की अदालतों और सरकारों को पर्यावरणीय संकटों से निपटने के लिए व्यावहारिक और प्रभावी रणनीतियां बनाने में मदद मिलेगी।

सवाल-जवाब

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पर्यावरण और विकास को लेकर क्या बात कही?
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण विकास के रास्ते में बाधा नहीं है, बल्कि विकास प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो प्रकृति और जनता के प्रति पूर्ण जवाबदेह हो।
स्वस्थ पर्यावरण को किस संवैधानिक अधिकार का हिस्सा बताया गया है?
सुप्रीम कोर्ट के न्यायशास्त्र के तहत स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण को संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा माना गया है।
संविधान के किन अनुच्छेदों का उल्लेख सम्मेलन में किया गया?
पर्यावरण रक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद 48A (राज्य के कर्तव्य) और अनुच्छेद 51A(g) (नागरिकों के मौलिक कर्तव्य) का विशेष रूप से उल्लेख किया गया।
न्यायपालिका द्वारा विकसित किन प्रमुख सिद्धांतों का जिक्र किया गया?
इसमें प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल, पोल्यूटर पेज प्रिंसिपल, एब्सोल्यूट लायबिलिटी और पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन जैसे स्थापित न्यायिक सिद्धांतों का जिक्र किया गया।
यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन किस संस्था द्वारा और किस विषय पर आयोजित किया गया था?
यह सम्मेलन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा नई दिल्ली में 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स' विषय पर आयोजित किया गया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·10 दिन पहले

मुख्य न्यायाधीश का यह वक्तव्य सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। चिकित्सा और जनस्वास्थ्य के नजरिए से, स्वच्छ पर्यावरण केवल नीतिगत मामला नहीं बल्कि बीमारियों को रोकने की पहली सीढ़ी है। वायु, जल और मिट्टी का प्रदूषण सीधे तौर पर गंभीर शारीरिक बीमारियों और मानसिक तनाव को बढ़ावा देता है। अनुच्छेद 21 के तहत प्रदूषण मुक्त वातावरण को जीवन के अधिकार से जोड़ना निवारक स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ करेगा। अब समय आ गया है कि हम स्वास्थ्य और पर्यावरण नीतियों को एक साथ जोड़कर देखें ताकि भावी पीढ़ियों को निरोगी जीवन मिल सके।

Rohan Gupta@rohan-gupta·10 दिन पहले

पूजा की बात से सहमति जताते हुए, तकनीकी दृष्टिकोण से देखें तो प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के इस अधिकार को जमीन पर उतारने के लिए हमें 'डीप टेक' और 'ग्रीन-टेक' नवाचारों की सख्त जरूरत है। इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) सेंसर, एआई-आधारित एमिशन ट्रैकिंग और रियल-टाइम डेटा एनालिटिक्स के बिना हम प्रदूषण नियंत्रण के कानूनी सिद्धांतों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर सकते। स्टार्टअप्स और बिग टेक कंपनियों को ऐसे डिजिटल टूल विकसित करने होंगे जो न केवल कार्बन उत्सर्जन की सटीक निगरानी करें, बल्कि उद्योगों की जवाबदेही भी तय करें। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर ही इस संवैधानिक अधिकार को हकीकत में बदल सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·10 दिन पहले

मुख्य न्यायाधीश का यह वक्तव्य भारतीय उद्योग जगत और नीति-निर्माताओं के लिए स्पष्ट संकेत है कि पर्यावरण संरक्षण अब महज़ औपचारिकता नहीं बल्कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस का अनिवार्य हिस्सा है। 'एब्सोल्यूट लायबिलिटी' और सतत विकास पर न्यायिक ज़ोर से ईएसजी (ESG) मानकों का महत्व और बढ़ेगा। जब स्वच्छ पर्यावरण को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना जाता है, तो उद्योगों को अपनी विस्तार योजनाओं में पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों और हरित निवेश को प्राथमिकता देनी होगी। इससे न केवल दीर्घकालिक कानूनी और वित्तीय जोखिम कम होंगे, बल्कि सतत आर्थिक विकास को भी बल मिलेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·10 दिन पहले

मुख्य न्यायाधीश का यह वक्तव्य दर्शाता है कि पर्यावरण अब केवल एक घरेलू नीति का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शासन (गवर्नेंस) और नीति-निर्माण का एक अनिवार्य स्तंभ बन चुका है। जब न्यायपालिका पर्यावरण को सीधे अनुच्छेद 21 से जोड़ती है, तो यह कार्यपालिका और विधायिका पर अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप कड़े कानून बनाने का दबाव बढ़ाती है। सरकार को अब ऐसी लोक नीतियां तैयार करनी होंगी जहां विकास और पर्यावरण संरक्षण समानांतर चलें। यह न्यायिक रुख प्रशासनिक जवाबदेही को और मजबूत करेगा, जिससे पर्यावरण संरक्षण केवल कागजी नियम न रहकर देश की मुख्यधारा की शासन व्यवस्था का मुख्य हिस्सा बनेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·10 दिन पहले

मुख्य न्यायाधीश द्वारा उठाए गए ये विधिक बिंदु यह रेखांकित करते हैं कि पर्यावरण अपराध और पारिस्थितिकी का अंधाधुंध दोहन अब केवल नीतिगत उल्लंघन नहीं, बल्कि सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन के अधिकार पर हमला है। प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल और पोल्यूटर पेज जैसे सिद्धांतों का यह कड़ा संदेश स्पष्ट करता है कि आने वाले समय में अदालतों द्वारा औद्योगिक और कॉर्पोरेट गतिविधियों पर पर्यावरण संरक्षण के नाम पर शिकंजा और कसने वाला है, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा और न्याय व्यवस्था के दायरे में पर्यावरण अपराधों की जाँच और जवाबदेही और अधिक गंभीर हो जाएगी।

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