देश में जनगणना की प्रक्रिया अब अगले पड़ाव में पहुंचने वाली है। दूसरा चरण 17 अगस्त से शुरू हो रहा है और इस बार गणना फॉर्म में दो बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे, आजादी के बाद पहली बार जाति गिनी जाएगी और साथ ही हर नागरिक से उसके माता-पिता की जन्मतिथि व जन्मस्थान भी पूछा जाएगा। गृह मंत्रालय ने इसे लेकर औपचारिक नोटिफिकेशन जारी कर दिया है, जिसमें लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फ से ढके इलाकों के लिए अलग समय-सारणी तय की गई है।
बर्फीले इलाकों में एक से 30 सितंबर तक होगी गिनती
नोटिफिकेशन के अनुसार लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के दुर्गम व बर्फीले क्षेत्रों में जनसंख्या गणना 1 सितंबर से 30 सितंबर के बीच पूरी की जाएगी। इससे ठीक पहले, 17 से 30 अगस्त के बीच स्वगणना की सुविधा दी जाएगी, यानी लोग खुद अपनी जानकारी दर्ज कर सकेंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि जनगणना के इस दूसरे चरण से जुड़े सवाल-जवाब जल्द ही अलग से अधिसूचित किए जाएंगे, ताकि गणनाकर्मी और आम नागरिक दोनों समय रहते तैयारी कर सकें।
जाति का कॉलम कैसे भरा जाएगा
सूत्रों की मानें तो जाति से जुड़ी जानकारी पूरी तरह उत्तरदाता की अपनी घोषणा पर आधारित होगी, यानी व्यक्ति खुद जो बताएगा वही दर्ज होगा। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) से जुड़े लोगों के लिए फॉर्म में ड्रॉप-डाउन मेन्यू की सुविधा रहेगी, जबकि सामान्य 'जाति' का विकल्प सिर्फ उन लोगों के लिए होगा जो SC या ST श्रेणी में नहीं आते। ड्रॉप-डाउन में उसी राज्य की SC/ST सूची दिखाई जाएगी, जहां संबंधित व्यक्ति की गिनती हो रही है, और जाति का नाम ठीक उसी वर्तनी में दर्ज होगा जैसा उत्तरदाता खुद बताएगा। सबसे अहम बात यह है कि SC, ST या किसी अन्य जाति की जानकारी को साबित करने के लिए कोई प्रमाण पत्र या दस्तावेज दिखाना जरूरी नहीं होगा, पूरा भरोसा जवाब देने वाले व्यक्ति के बयान पर ही किया जाएगा। वहीं माता-पिता के जन्म से जुड़े आंकड़े नागरिकता की शर्तें पूरी करने वाले लोगों की सही संख्या का पता लगाने में मदद करेंगे।
2011 में सामने आई थीं 45 हजार से ज्यादा जातियां, अब मिलेगी AI की मदद
एक अधिकारी के हवाले से बताया गया कि साल 2011 में हुई सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) में भी स्व-घोषणा वाला यही तरीका अपनाया गया था, लेकिन तब जवाबों में 45,000 से भी ज्यादा अलग-अलग जातियों के नाम सामने आ गए थे। इतनी बड़ी संख्या ने आंकड़ों को व्यवस्थित करना और उनका उपयोग करना बेहद मुश्किल बना दिया था। हालांकि इस बार स्थिति अलग हो सकती है, क्योंकि डिजिटल टूल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से इतने बड़े और बिखरे हुए डेटा को व्यवस्थित करने और सही श्रेणियों में बांटने की चुनौती से निपटा जा सकेगा।
पहली बार दर्ज होगी माता-पिता के जन्म की तारीख और जगह
जनगणना के इस दूसरे चरण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पहली बार हर व्यक्ति से उसके माता-पिता की जन्मतिथि और जन्मस्थान भी पूछा जाएगा, और यह जानकारी नागरिकता तय करने में एक अहम कारक मानी जा रही है। गौरतलब है कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) की प्रक्रिया 2011 की जनगणना के साथ ही चलाई गई थी और तय था कि इसे 2021 की जनगणना के साथ दोबारा दोहराया जाएगा। लेकिन जनगणना ही टलने की वजह से एनपीआर का यह काम अटक गया। अब की बार एनपीआर को Census 2027 की प्रक्रिया से पूरी तरह अलग रखा गया है। इससे पहले साल 2010 में जब एनपीआर के तहत गणना हुई थी, तब भी उत्तरदाता द्वारा खुद बताई गई राष्ट्रीयता की जानकारी जुटाई गई थी। हालांकि उस समय भी सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि केवल इस जानकारी के आधार पर किसी को नागरिकता का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता।



















