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झीरम घाटी नरसंहार में सजा के बाद कांग्रेस के सवाल, न्याय पर क्या बोली पार्टीछत्तीसगढ़
17 सित॰ 2026, 12:13 am (8 दिन पहले)· 0

झीरम घाटी नरसंहार में सजा के बाद कांग्रेस के सवाल, न्याय पर क्या बोली पार्टी

छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी नरसंहार मामले में एनआईए कोर्ट द्वारा 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद कांग्रेस नेताओं ने न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

छत्तीसगढ़ आज नक्सलवाद के साये से काफी हद तक बाहर आ चुका है, लेकिन राज्य के इतिहास में एक ऐसा काला अध्याय दर्ज है जिसे याद कर आज भी सिहरन पैदा हो जाती है। आज से लगभग 13 साल पहले यानी 2013 में नक्सलियों ने एक ऐसा खूनी खेल खेला था, जिसके निशान आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। समय के साथ जख्म भले ही भरते हों, लेकिन झीरम घाटी की उस घटना ने ऐसा नासूर दिया है जो कभी नहीं मिट सकता। इस वीभत्स मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए की विशेष अदालत ने कड़े संघर्ष के बाद 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है। इस फैसले को पीड़ितों के जख्मों पर मरहम के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस और उसके नेता इस न्याय से संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं। अदालत द्वारा अधिकतम सजा सुनाए जाने के बाद भी कांग्रेस पार्टी के भीतर सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि आखिर वे इससे भी ऊपर किस तरह की सजा की उम्मीद कर रहे थे।

कांग्रेस नेताओं के तीखे सवाल और आरोप

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस अदालती फैसले के तुरंत बाद न्याय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि इस मामले में असल न्याय अभी तक नहीं मिल पाया है क्योंकि जांच एजेंसी ने सही ढंग से पड़ताल ही नहीं की और न ही असली दोषियों को पकड़ा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि हमले के जो मुख्य आरोपी थे, उनका नाम तक एफआईआर से हटा दिया गया था। इसके अलावा चश्मदीद गवाहों से पूछताछ नहीं की गई और उनके बयान दर्ज करने में भी लापरवाही बरती गई। अदालत ने जिन लोगों से पूछताछ किए जाने की बात कही थी, उनसे कभी पूछताछ नहीं की गई। इस पूरे हमले में दो सौ से ज्यादा नक्सली शामिल थे, लेकिन सजा सिर्फ दस लोगों को मिलने से न्याय का यह दावा अधूरा रह जाता है।

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राज्य के कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने भी इस मामले में जांच एजेंसी पर खानापूर्ति करने के गंभीर आरोप लगाए। उनका तर्क था कि जिन दस लोगों को दोषी ठहराया गया है, वे संगठन के बड़े नक्सली लीडर नहीं हैं। बड़े नक्सली नेता कथित रूप से संरक्षण में हैं और उनसे कभी पूछताछ क्यों नहीं की गई। उनके अनुसार यदि शीर्ष स्तर के नेताओं से पूछताछ की जाती, तो कई बड़े नाम और राजनीतिक राज उजागर हो सकते थे। इन नेताओं के बयानों से यह साफ झलकता है कि वे अदालत के इस फैसले से पूरी तरह नाखुश हैं और न्यायपालिका की कार्रवाई पर ही सवालिया निशान लगा रहे हैं.

राजनीतिक बयानबाजी और अतीत की यादें

भूपेश बघेल और दीपक बैज के इन बयानों के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस नेता अपने मनमुताबिक और राजनीतिक रूप से तय किए गए फैसलों की उम्मीद कर रहे थे। जब अदालत का फैसला उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं आया, तो उसमें कमियां निकाली जाने लगीं। आलोचकों का यह भी कहना है कि जब साल 2018 से 2023 तक प्रदेश में कांग्रेस की अपनी पूर्ण बहुमत वाली सरकार थी, तब भी नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। इसके उलट, आज छत्तीसगढ़ में लाल आतंक का प्रभाव लगभग खत्म हो चुका है और जिन दुर्गम इलाकों में कभी नक्सलियों का खौफ हुआ करता था, वहां अब तिरंगा शान से फहरा रहा है। जिस झीरम घाटी कांड में कांग्रेस पार्टी को अपना लगभग पूरा नेतृत्व गंवाना पड़ा था, उस समस्या के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और अदालत द्वारा दोषियों को सजा दिए जाने पर कांग्रेस को संतुष्ट होना चाहिए था, न कि इस पर राजनीति करनी चाहिए थी।

स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक हमला

झीरम घाटी में हुआ वह खूनी संघर्ष स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास के सबसे डरावने और विनाशकारी हादसों में गिना जाता है। यह दुखद घटना 25 मई 2013 को बस्तर जिले के दरभा घाटी यानी झीरम क्षेत्र में घटी थी। उस दिन नक्सली पहले से ही घात लगाकर बैठे हुए थे और काफिले के गुजरते ही उन्होंने अंधाधुंध गोलियों की बौछार कर दी थी। इस अचानक हुए बर्बर हमले में छत्तीसगढ़ कांग्रेस का लगभग पूरा शीर्ष नेतृत्व एक झटके में खत्म हो गया था। इस नृशंस घटना में कुल 27 लोगों की जान गई थी, जिनमें बस्तर टाइगर के नाम से मशहूर महेंद्र कर्मा, तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गज चेहरे शामिल थे। विद्याचरण शुक्ल इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे और बाद में इलाज के दौरान अस्पताल में उनका निधन हो गया था।

सवाल-जवाब

झीरम घाटी नरसंहार कब हुआ था?
झीरम घाटी हमला 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले की दरभा घाटी में हुआ था।
इस मामले में एनआईए कोर्ट ने कितने लोगों को सजा सुनाई है?
एनआईए विशेष अदालत ने इस नरसंहार मामले में 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है।
इस हमले में कांग्रेस के कौन-से बड़े नेता मारे गए थे?
इस हमले में महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और विद्याचरण शुक्ल सहित 27 लोगों की जान गई थी।
कांग्रेस नेताओं ने फैसले पर क्या सवाल उठाए हैं?
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने आरोप लगाया है कि जांच एजेंसी ने मुख्य आरोपियों को छोड़ दिया है और केवल 10 लोगों को सजा देकर खानापूर्ति की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Michael Anderson@michael-anderson·8 दिन पहले

जब राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक हिंसा के गंभीर मामलों में जांच सिर्फ जमीनी कैडरों तक सीमित रह जाती है, तो अदालत के कड़े से कड़े फैसले भी राजनीतिक बहस को समाप्त नहीं कर पाते। झीरम घाटी मामले में 10 दोषियों को फांसी की सजा संस्थागत न्याय की दिशा में एक कदम जरूर है, लेकिन जब तक मुख्य साजिशकर्ताओं और शीर्ष नेतृत्व की भूमिका पर उठे सवालों का निपटारा पारदर्शी तरीके से नहीं होता, तब तक ऐसी कार्रवाइयों पर राजनीतिक मतभेद बने रहेंगे। यह स्थिति दर्शाती है कि हाई-प्रोफाइल मामलों में केवल अंतिम फैसले से ज्यादा जांच की समग्रता और जांच एजेंसियों के प्रति जन-विश्वास मायने रखता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 दिन पहले

झीरम घाटी कांड महज एक आपराधिक या नक्सली हमला नहीं था, बल्कि इसने छत्तीसगढ़ के पूरे राजनीतिक ढांचे को हिलाकर रख दिया था। अदालत द्वारा 10 नक्सलियों को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद भी उठ रहे राजनीतिक सवाल यह स्पष्ट करते हैं कि कानूनी फैसले और राजनीतिक अपेक्षाओं के बीच गहरी खाई बनी हुई है। जब तक 'वृहत षड्यंत्र' या पर्दे के पीछे के चेहरों को लेकर कूटनीतिक और कानूनी स्पष्टता नहीं आती, यह मुद्दा राज्य में चुनावी बहस और राष्ट्रीय जांच एजेंसियों की साख का प्रमुख आधार बना रहेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·8 दिन पहले

अर्जुन की बात बिल्कुल सटीक है। झीरम घाटी जैसे गंभीर मामलों में विशेष अदालतों के फैसले मैदानी हमलावरों को कानूनी अंजाम तक तो पहुंचाते हैं, लेकिन जब तक रणनीतिक और राजनीतिक साजिशों के पहलुओं पर पूर्ण पारदर्शिता नहीं दिखती, तब तक जांच एजेंसियों की साख पर सवाल बने रहेंगे। छत्तीसगढ़ जैसे संसाधन-समृद्ध राज्य में दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता और शासन-व्यवस्था के प्रति जनता का भरोसा बहाल करने के लिए जांच प्रक्रिया का संशय से परे होना अनिवार्य है। केवल कड़े दंड से संस्थागत विश्वसनीयता पूरी तरह कायम नहीं की जा सकती।

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 दिन पहले

एनआईए अदालत द्वारा दस दोषियों को मौत की सजा दिए जाने के बावजूद कांग्रेस नेताओं द्वारा जांच और न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठाना यह दर्शाता है कि यह मामला केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के बياनों से यह स्पष्ट है कि पार्टी का मानना है कि इस वीभत्स हमले के असली और शीर्ष साजिशकर्ता अभी भी कानून की पकड़ से दूर हैं। एक क्राइम रिपोर्टर के रूप में मेरा मानना है कि यदि अदालत की इस सजा के खिलाफ उच्च अदालतों में अपील की जाती है, तो यह मामला और लंबा खिंच सकता है, जिससे राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की पूरी संभावना है।

Rohan Verma@rohan-verma·8 दिन पहले

रोहन वर्मा के रूप में मेरा आकलन है कि झीरम घाटी जैसे जटिल और संवेदनशील मामलों में निचली अदालत के फैसले के बाद उच्च न्यायपालिका में कानूनी लड़ाई लंबी खिंच सकती है। जब तक शीर्ष स्तर पर साजिश के तमाम पहलुओं की कानूनी जांच स्पष्ट नहीं होती, तब तक इस मामले पर राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में टकराव और बयानबाजी का दौर जारी रहेगा, जिसका असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ना तय है।

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