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जोधपुर के किसान सुमेरसिंह ने खेती में किया बड़ा कमाल, आधुनिक तरीकों से तीन लाख की कमाई को पहुंचाया पंद्रह लाखराजस्थान
29 अग॰ 2026, 11:08 am (27 दिन पहले)· 3

जोधपुर के किसान सुमेरसिंह ने खेती में किया बड़ा कमाल, आधुनिक तरीकों से तीन लाख की कमाई को पहुंचाया पंद्रह लाख

जोधपुर जिले के जालीवाड़ा खुर्द गांव के रहने वाले सुमेरसिंह कछवाहा ने आधुनिक कृषि तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर अपनी सालाना आय में चार गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी कर ली है।

जोधपुर जिले के पीपाड़ क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले जालीवाड़ा खुर्द गांव के निवासी सुमेरसिंह कछवाहा ने कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव करके दिखाया है। कृषि विज्ञान विषय से अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले सुमेरसिंह के पारिवारिक खेतों से पहले परंपरागत खेती के जरिए सालभर में केवल तीन से साढ़े तीन लाख रुपए की ही कमाई हो पाती थी। इतनी कम आय होने की वजह से परिवार की बुनियादी जरूरतों और रोजाना के खर्चों को पूरा करने के लिए उन्हें कृषि के अलावा अन्य कामों का सहारा भी लेना पड़ता था। सरकारी परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ उन्होंने खेती को भी पूरी ईमानदारी से आगे बढ़ाया और मल्चिंग जैसी नई कृषि पद्धतियों को आजमाना शुरू किया। केंद्रीय कृषि संस्थानों के वैज्ञानिकों की सलाह और कृषि विकास योजनाओं के माध्यम से उन्हें दूसरे राज्यों के कृषि केंद्रों को देखने का मौका मिला, जिससे उन्हें खेतों में नए प्रयोग करने का गहरा हौसला मिला।

सीमित जमीन और वैज्ञानिक प्रयोगों से ज्वार का बंपर उत्पादन

सुमेरसिंह के परिवार के पास कुल साठ बीघा जमीन है, लेकिन पूरे साल खेती के काम आने वाली उपजाऊ जमीन केवल तेरह बीघा ही है। इसी सीमित जमीन पर वे लगातार नए कृषि प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने मल्चिंग और बूंद-बूंद सिंचाई यानी ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों का पूरा इस्तेमाल करके सब्जियों के उत्पादन को काफी अधिक बढ़ाया है। शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों की देखरेख में उन्होंने इस बार ज्वार की विशेष किस्म की बिजाई की है, जिसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान दिल्ली द्वारा तैयार किया गया है। यह खास फसल महज एक महीने के भीतर करीब बारह फीट तक ऊंची हो चुकी है। आज अपनी इसी तेरह बीघा सीमित जमीन का सही प्रबंधन और वैज्ञानिक उपयोग करके वे सालभर में चौदह से पंद्रह लाख रुपए तक की कमाई कर रहे हैं।

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साढ़े तीन बीघा जमीन पर नर्सरी से होती है पांच लाख की कमाई

पारंपरिक फसलों के भरोसे बैठने के बजाय सुमेरसिंह ने सब्जियों के पौधे तैयार करने की आधुनिक तकनीक सीखी और अपने खेत के साढ़े तीन बीघा हिस्से में एक उन्नत नर्सरी की स्थापना की। इस नर्सरी में फूलगोभी, पत्तागोभी, मिर्च, बैंगन और टमाटर जैसी सब्जियों के लगभग दो लाख हाइब्रिड पौधे हर साल तैयार किए जाते हैं। केवल इस नर्सरी के कारोबार से उन्हें सालाना करीब पांच लाख रुपए की शुद्ध आय मिल जाती है। इसके अलावा उनके इस प्रयास से क्षेत्र के अन्य किसानों को भी बहुत फायदा होता है, जिन्हें अब अपने खेतों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले स्वस्थ पौधे स्थानीय स्तर पर ही आसानी से मिल जाते हैं।

सब्जी, अनाज और डेयरी से बनाई त्रिकोणीय आमदनी

अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के लिए सुमेरसिंह ने विविधीकरण के मॉडल को अपनाया है और वे मुख्य रूप से तीन अलग-अलग माध्यमों से आमदनी कमा रहे हैं। वे करीब सात बीघा जमीन पर गोभी, टमाटर, हरी प्याज, मिर्च, लौकी और चौलाई जैसी सब्जियां उगाते हैं और सभी तरह के खर्च घटाने के बाद लगभग आठ लाख रुपए सालाना बचा लेते हैं। बची हुई जमीन पर वे मूंग, मोठ, बाजरा, ग्वार, तिल, ईसबगोल, गेहूं और रायड़ा जैसी पारंपरिक फसलें उगाकर ढाई से तीन लाख रुपए की अतिरिक्त बचत करते हैं। खेतों की सिंचाई के लिए उनके पास दो कुएं और एक डिग्गी है तथा पूरी तेरह बीघा जमीन पर ड्रिप सिंचाई प्रणाली का पूरा नेटवर्क फैला हुआ है। खेती के साथ-साथ उनके पास चार उन्नत नस्ल की गाएं भी हैं, जिनसे हर रोज आठ से दस लीटर दूध प्राप्त होता है। घर की जरूरत का दूध निकालकर बाकी बचे दूध से शुद्ध देसी घी तैयार करके वे सालाना एक से डेढ़ लाख रुपए और कमा लेते हैं। इसके साथ ही पशुओं के गोबर और कचरे से तैयार होने वाली जैविक खाद का इस्तेमाल करके वे रासायनिक खादों पर होने वाले खर्च को भी काफी हद तक बचा रहे हैं।

सवाल-जवाब

सुमेरसिंह कछवाहा किस क्षेत्र के रहने वाले हैं?
सुमेरसिंह कछवाहा जोधपुर जिले के पीपाड़ क्षेत्र के जालीवाड़ा खुर्द गांव के निवासी हैं।
उनकी सालाना कृषि आय कितनी हो गई है?
आधुनिक तकनीकों को अपनाने के बाद उनकी सालाना कृषि आय बढ़कर करीब चौदह से पंद्रह लाख रुपए तक पहुंच गई है।
वे कुल कितनी जमीन पर खेती करते हैं?
उनके परिवार के पास साठ बीघा जमीन है, लेकिन बारह महीने खेती योग्य जमीन केवल तेरह बीघा ही उपलब्ध है।
नर्सरी व्यवसाय से उन्हें कितनी कमाई होती है?
साढ़े तीन बीघा जमीन पर विकसित आधुनिक नर्सरी से उन्हें करीब पांच लाख रुपए की सालाना शुद्ध आय प्राप्त होती है।
वे सिंचाई के लिए किन संसाधनों का उपयोग करते हैं?
उनके खेत में सिंचाई के लिए दो कुएं और एक डिग्गी है तथा पूरी तेरह बीघा जमीन पर ड्रिप सिंचाई का जाल बिछा हुआ है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·26 दिन पहले

यह सफलता की कहानी सिर्फ कृषि नवाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक आजीविका सुरक्षा का एक मजबूत मॉडल प्रस्तुत करती है। आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक पद्धतियों के प्रभावी उपयोग से न केवल पारिवारिक आय में भारी बढ़ोतरी हुई है, बल्कि इस प्रकार के सफल आर्थिक बदलाव ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं के पलायन को रोकने और अपराध दर में कमी लाने में भी परोक्ष रूप से बड़ी भूमिका निभाते हैं। आर्थिक स्थिरता से स्थानीय स्तर पर सुरक्षा और न्याय व्यवस्था सुदृढ़ होती है।

Rohan Verma@rohan-verma·26 दिन पहले

यह मॉडल स्पष्ट रूप से साबित करता है कि वैज्ञानिक खेती और फसल विविधीकरण से किसानों की माली हालत सुधर सकती है। उत्तर प्रदेश जैसे कृषि-प्रधान राज्य में भी यदि ऐसी आधुनिक तकनीकों और नर्सरी प्रबंधन को बढ़ावा मिले, तो ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक समृद्धि आ सकती है और खेती एक लाभ का सौदा बन सकती है।

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