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जोधपुर में 11 किलो दूब से सजी तीन फीट की अनूठी गणेश प्रतिमा, विसर्जन के बाद पार्क में बिखेरेगी हरियालीराजस्थान
21 सित॰ 2026, 5:38 pm (4 दिन पहले)· 0

जोधपुर में 11 किलो दूब से सजी तीन फीट की अनूठी गणेश प्रतिमा, विसर्जन के बाद पार्क में बिखेरेगी हरियाली

जोधपुर के प्रताप नगर में पर्यावरण प्रेमी सूरजमल पंवार ने 11 किलो दूब और मिट्टी से गणपति की जीवंत हरी प्रतिमा तैयार की है, जिसे उत्सव के बाद पार्क में रोपा जाएगा।

गणेश उत्सव के पावन अवसर पर आमतौर पर मिट्टी, प्लास्टर ऑफ पेरिस या धातुओं से गढ़ी गई प्रतिमाएं पंडालों और घरों में विराजती हैं, परंतु जोधपुर में प्रकृति प्रेम और गहरी आस्था का एक अद्भुत संगम सामने आया है। शहर के प्रताप नगर क्षेत्र में रहने वाले पर्यावरण प्रेमी सूरजमल पंवार ने दूब यानी हरी घास से भगवान गणेश की लगभग तीन फीट ऊंची एक जीवंत प्रतिमा तैयार की है। पूरी तरह हरी-भरी यह मूर्ति न केवल दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है, बल्कि समाज को पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति संवर्धन का ठोस संदेश भी दे रही है।

मिट्टी के आधार पर 11 किलो दूब रोपकर एक महीने में गढ़ा स्वरूप

इस अनूठी रचना को मूर्त रूप देने में सूरजमल पंवार को लगभग एक महीने का समय लगा। निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत में उन्होंने सबसे पहले शुद्ध मिट्टी की सहायता से भगवान गणपति की आधार संरचना और उनका शारीरिक आकार तैयार किया। इसके उपरांत विधिवत पूजा-अर्चना और मंत्रोच्चारण के साथ आधार स्वरूप पर लगभग 11 किलो दूब को रोपा गया। रोपाई के बाद करीब 15 से 20 दिनों तक नियमित रूप से उचित मात्रा में जल छिड़काव और देखभाल की गई। जैसे-जैसे घास बढ़ती और फैलती गई, भगवान गणेश का संपूर्ण विग्रह एक सघन, आकर्षक और प्राकृतिक हरी प्रतिमा में परिवर्तित हो गया।

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पर्यावरण संरक्षण का संकल्प और पूर्व के अनोखे प्रयोग

सूरजमल पंवार निरंतर ऐसे रचनात्मक प्रयास करते रहे हैं जिनसे पूजा-अर्चना के साथ-साथ प्रकृति के प्रति जागरूकता फैलाई जा सके। अपनी इस परंपरा के तहत वे पहले भी विशुद्ध मिट्टी की मूर्तियां, 51 चूहों के साथ गणपति स्वरूप और फिटकरी से निर्मित प्रतिमाएं बना चुके हैं। उनका उद्देश्य यह रहा है कि देश और समाज में हरियाली का प्रसार हो तथा पर्यावरण स्वच्छ और समृद्ध बना रहे। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इस बार गणपति को हरी दूब के रूप में साकार किया और भगवान से प्रकृति में निरंतर हरियाली और खुशहाली बनाए रखने का आशीर्वाद मांगा।

जल में बहाने के बजाय पार्क में जीवित रहेगी प्रतिमा की घास

इस पहल की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि उत्सव संपन्न होने के बाद भी यह संदेश थमेगा नहीं। पारंपरिक विसर्जन के तहत प्रतिमा को किसी नदी या जलाशय में प्रवाहित करने के बजाय एक सुंदर पार्क का चयन किया जाएगा। वहां इस प्रतिमा की दूब को दोबारा सुरक्षित ढंग से जमीन में रोपा जाएगा। इससे प्रतिमा में प्रयुक्त दूब जीवित बनी रहेगी और संबंधित सार्वजनिक उद्यान में हरियाली का विस्तार करेगी। इस प्रकार विसर्जन के उपरांत भी भगवान गणेश की स्मृति वर्षभर जीवंत प्रकृति के रूप में विद्यमान रहेगी।

बच्चों में रचनात्मकता और आस्था का विस्तार

सूरजमल पंवार की इस पर्यावरण अनुकूल पहल ने परिवार के नन्हे-मुन्ने बच्चों को भी गहराई से प्रभावित किया है। अपने नाना के इस समर्पण से सीख लेकर बच्चों ने भी अपने स्तर पर छोटे-छोटे गणपति बनाना शुरू कर दिया है। किसी बच्चे ने घर में उपलब्ध साधारण मिट्टी से मूर्तियां बनाई हैं तो किसी ने क्ले का उपयोग करके रचनात्मक रूप दिए हैं। इस तरह परिवार की नई पीढ़ी भी उत्सव की मूल आस्था से जुड़ते हुए पर्यावरण अनुकूल तरीकों को अपना रही है।

लखजी की पोल में भगवान जगन्नाथ के स्वरूप में सजे गणपति

जोधपुर में इस उत्सव के दौरान कला और भक्ति का एक अन्य मनोहारी स्वरूप भी देखने को मिला है। शहर के लखजी की पोल स्थित साढ़ा बास में भगवान जगन्नाथ की तर्ज पर गणपति की प्रतिमा विराजित की गई है। लगभग दो फीट ऊंची इस प्रतिमा में भगवान गणेश को श्याम वर्ण का स्वरूप दिया गया है। भगवान जगन्नाथ की पारंपरिक छवि से प्रेरित यह अनूठा विग्रह भी देखने वालों और दर्शनार्थियों के मध्य भारी कौतूहल और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।

सवाल-जवाब

जोधपुर में दूब से बनी गणेश प्रतिमा की ऊंचाई कितनी है?
प्रताप नगर में तैयार की गई इस अनूठी गणेश प्रतिमा की ऊंचाई लगभग तीन फीट है।
प्रतिमा को बनाने में कितनी दूब का इस्तेमाल किया गया?
इस प्रतिमा के निर्माण में लगभग 11 किलो दूब का प्रयोग किया गया है।
दूब की गणेश प्रतिमा को तैयार करने में कितना समय लगा?
मिट्टी के आधार पर दूब रोपने और उसके पूरी तरह उगने में कुल मिलाकर लगभग एक महीने का समय लगा।
इस अनोखी प्रतिमा का विसर्जन कैसे किया जाएगा?
इसे पानी में बहाने के बजाय किसी सार्वजनिक पार्क में लगाया जाएगा ताकि दूब जीवित रहे और हरियाली बढ़ाए।
प्रतिमा का निर्माण किसने किया है?
जोधपुर के प्रताप नगर निवासी पर्यावरण प्रेमी सूरजमल पंवार ने इस प्रतिमा को तैयार किया है।
सूरजमल पंवार इससे पहले कौन सी अनूठी प्रतिमाएं बना चुके हैं?
वे इससे पहले मिट्टी के गणेश, 51 चूहों वाले गणेश और फिटकरी से गणपति की प्रतिमा बना चुके हैं।
लखजी की पोल में सजी गणेश प्रतिमा की क्या विशेषता है?
वहां भगवान जगन्नाथ की तर्ज पर करीब दो फीट ऊंची श्याम वर्ण की गणेश प्रतिमा स्थापित की गई है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·3 दिन पहले

यह अभिनव पहल धार्मिक परंपराओं को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो जलवायु परिवर्तन और बढ़ते शहरीकरण के इस दौर में टिकाऊ प्रथाओं को बढ़ावा देती है। इस तरह के रचनात्मक मॉडल भविष्य में सार्वजनिक आयोजनों के दौरान जल प्रदूषण को रोकने और हरित क्षेत्रों के विस्तार में महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव ला सकते हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·3 दिन पहले

यह पहल धार्मिक आयोजनों में पर्यावरण संरक्षण को जोड़ने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो जन-जागरूकता बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है। विसर्जन के पारंपरिक तरीकों से होने वाले जल प्रदूषण के संकट के बीच, इस तरह के रचनात्मक विकल्प नीति निर्माताओं और नागरिकों के लिए सतत विकास की दिशा में एक नया मार्ग प्रशस्त करते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·3 दिन पहले

यह अभिनव पहल सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सर्कुलर इकोनॉमी और वेस्ट-टू-वेल्थ जैसे आधुनिक सस्टेनेबिलिटी मॉडल का जमीनी स्तर पर बेहतरीन क्रियान्वयन है। कॉरपोरेट जगत और स्टार्टअप्स के लिए भी यह एक सबक है कि कैसे पारंपरिक त्योहारों को पर्यावरण-अनुकूल और शून्य-अपशिष्ट व्यावसायिक अवसरों में बदला जा सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के दौर में भविष्य के हरित निवेशों को बल मिलेगा।

Rohan Verma@rohan-verma·3 दिन पहले

जोधपुर की यह अनूठी पहल पर्यावरण संरक्षण और आस्था के समन्वय का एक बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ विसर्जन के बाद पार्क में हरियाली बिखेरी जाएगी। ऐसे रचनात्मक प्रयोग देश के अन्य हिस्सों में भी उत्सव मनाने के तरीकों को बदल सकते हैं, जिससे जल प्रदूषण रोकने में सीधी मदद मिलेगी और नागरिकों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना मजबूत होगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 दिन पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह रेखांकित करना आवश्यक है कि उत्सवों में इस तरह के पर्यावरण-अनुकूल नवाचार पारंपरिक जल प्रदूषण की गंभीर समस्या का एक व्यावहारिक और कानूनी रूप से स्वागत योग्य विकल्प प्रस्तुत करते हैं। जब नागरिक खुद इस प्रकार की पहल करते हैं, तो यह स्थानीय स्तर पर जन-भागीदारी को बढ़ावा देता है और अदालतों तथा प्रशासन द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए दिशा-निर्देशों का पालन भी स्वतः सुनिश्चित होता है।

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