भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक रुख में अब बुनियादी बदलाव आ चुका है, जहां देश किसी भी रणनीतिक भ्रम में रहने को तैयार नहीं है। नई दिल्ली में आयोजित एक रक्षा सम्मेलन के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रेखांकित किया कि समकालीन दौर में सुरक्षा संबंधी खतरे किसी एक भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि उनका दायरा लगातार विस्तृत हो रहा है। ऐसे बदलते वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुरानी हिचकिचाहट और पारंपरिक ढर्रे को छोड़ना अनिवार्य हो गया है। राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत शांति का पक्षधर बना रहेगा, लेकिन कमजोरी की कीमत पर शांति किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं की जाएगी। राष्ट्र के पास बातचीत के माध्यम से समाधान खोजने की क्षमता के साथ-साथ गंभीर परिस्थितियों में कठोर सैन्य निर्णय लेने का दृढ़ संकल्प भी मौजूद है।
नैतिकता और सैन्य शक्ति के बीच संतुलन
रक्षा नीतियों की ऐतिहासिक कमियों का विश्लेषण करते हुए रक्षा मंत्री ने आजादी के बाद के दशकों में अपनाई गई रणनीतियों के कमजोर पहलुओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक यह भ्रांति बनी रही कि नैतिकता और शक्ति एक-दूसरे के विपरीत हैं। इसी सोच के कारण कई पुरानी नीतियां इस उम्मीद पर तय की गईं कि विश्व के अन्य सभी देश भी भारत की तरह शांति और सद्भाव ही चाहते हैं। हालांकि जमीनी धरातल पर वास्तविकता हमेशा इससे अलग रही है। सॉफ्ट पावर किसी भी राष्ट्र के वैश्विक प्रभाव और सांस्कृतिक साख को तो मजबूती दे सकती है, परंतु वह कभी भी वास्तविक हथियारों, सैन्य ताकत और सामरिक तैयारी की जगह नहीं ले सकती।
कूटनीतिक बातचीत के दौरान किसी देश के रुख को वैश्विक स्तर पर तभी गंभीरता से लिया जाता है, जब उसके पीछे एक मजबूत सैन्य ढांचा मौजूद हो। रक्षा मंत्री ने जोर देकर कहा कि बिना वास्तविक ताकत के की जाने वाली कूटनीति को बाकी दुनिया लाचारी या कमजोरी मानने की भूल कर बैठती है। मजबूत शक्ति के बिना शांति की उम्मीद बेमानी साबित होती है।
सख्त सैन्य कार्रवाई और बदली हुई रणनीति
वर्तमान सरकार की रक्षा प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत के पास कूटनीतिक तर्क रखने की पूरी क्षमता है और आवश्यकता पड़ने पर ठोस ताकत प्रदर्शित करने का भी दम है। विरोधी पक्ष को जो भाषा समझ में आएगी, उसे उसी भाषा में समुचित प्रत्युत्तर दिया जाएगा। भारत अब केवल शांति की दुहाई देकर निष्क्रिय बैठने वाला देश नहीं रहा है।
देश द्वारा पूर्व में किए गए सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर जैसे बड़े सैन्य अभियान इसी बदली हुई सोच के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। इन निर्णायक कदमों ने वैश्विक बिरादरी के समक्ष स्पष्ट कर दिया कि अपने राष्ट्रीय हितों पर आंच आने की स्थिति में भारत सीमा पार जाकर भी प्रहार करने से पीछे नहीं हटेगा। यह रुख किसी अन्य मुल्क पर अकारण आक्रमण करने का नहीं है, बल्कि अपने नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता की हिफाजत का अडिग संकल्प है। इसके साथ ही देश अब किसी भी प्रकार के परमाणु ब्लैकमेल को सहन नहीं करेगा।
वैश्विक मंचों पर रणनीतिक साझेदारी का विस्तार
पिछले एक दशक के दौरान भारत ने अपने व्यापक रणनीतिक हितों को साधने के लिए वैश्विक पटल पर नए और मजबूत समीकरण स्थापित किए हैं। एक तरफ जहां घरेलू स्तर पर सेना का आधुनिकीकरण और रक्षा उपकरणों का स्वदेशीकरण तेजी से आगे बढ़ा, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक मोर्चे पर भी अभूतपूर्व सक्रियता देखने को मिली है। इसके साथ ही देश की 7.8 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर ने सामरिक मोर्चे पर भारत की स्थिति को और अधिक सुदृढ़ किया है।
आज भारत क्वाड के माध्यम से पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था को सुदृढ़ करने की वकालत कर रहा है। इसके अतिरिक्त आई2यू2 समूह के जरिए इजराइल, यूएई और अमेरिका जैसे प्रमुख साझेदारों के साथ तकनीकी और रणनीतिक तालमेल को नया आयाम दिया गया है। क्षेत्रीय और बहुपक्षीय स्तर पर बिम्सटेक, ब्रिक्स और एससीओ जैसे महत्वपूर्ण संगठनों में भी भारत की भागीदारी निर्णायक रूप से मजबूत हुई है। इन समन्वित प्रयासों के चलते भारत वैश्विक मंचों पर जटिल चुनौतियों के समाधान हेतु अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने वाला एक अत्यंत मजबूत स्तम्भ बनकर उभरा है।




















