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कानूनी केस दर्ज कराना खुदकुशी के लिए उकसाना नहीं, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसलाभारत
24 अग॰ 2026, 11:15 am (38 दिन पहले)· 2

कानूनी केस दर्ज कराना खुदकुशी के लिए उकसाना नहीं, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी रास्ता अपनाना या झूठी एफआईआर दर्ज कराना भी आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता है। अदालत ने घरेलू विवाद से जुड़े एक मामले में महिला के परिजनों के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस को रद्द कर दिया।

देश की सर्वोच्च अदालत ने घरेलू कलह और कानूनी लड़ाइयों से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा कानूनी सिद्धांत तय किया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि किसी भी नागरिक द्वारा अपने अधिकारों के संरक्षण के लिए न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाना या आपराधिक शिकायत दर्ज कराना, खुदकुशी के लिए मजबूर करने की श्रेणी में नहीं आता है। यह फैसला न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने सुनाया है। अदालत के इस आदेश से उन मामलों में कानूनी राहत मिलने का रास्ता साफ हुआ है जहां आपसी विवाद के बाद किसी पक्ष की ओर से उठाए गए कानूनी कदमों को आधार बनाकर आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगा दिए जाते हैं।

महिला के परिजनों पर दर्ज केस हुआ रद्द

इस फैसले के दायरे में एक विशिष्ट मामले को लाया गया जिसमें एक महिला के माता-पिता और भाई के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया था। कानूनी कार्यवाही और घरेलू हिंसा के मामलों की पृष्ठभूमि के बाद महिला के पति ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी। इसके बाद मृतक के भाई ने महिला के परिजनों पर गंभीर आरोप लगाते हुए आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज करवा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी कार्यवाही की गहराई से समीक्षा की और अंततः उस आपराधिक मामले को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि केवल इसलिए कि किसी ने कानूनी नोटिस भेजा या शिकायत दर्ज कराई, उसे आत्महत्या का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारण नहीं माना जा सकता।

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18 अगस्त के फैसले की मुख्य बातें

अपनी इस व्यवस्था में पीठ ने दिनांक 18 अगस्त को स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत या एफआईआर दर्ज कराना, भले ही वह आगे चलकर झूठी ही क्यों न साबित हो जाए, अपने आप में किसी को अपनी जान देने के लिए उत्प्रेरित करने का आधार नहीं बन सकती। पीठ ने आगे यह भी रेखांकित किया कि यदि कोई व्यक्ति कानून सम्मत तरीके से अपने हक की मांग करता है और दूसरा पक्ष इस तनाव के बीच आत्महत्या जैसा चरम कदम उठा लेता है, तो शिकायतकर्ता को आपराधिक रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी चेताया कि आत्महत्या के मामलों में केवल सुसाइड नोट के आधार पर शुरुआती मामला तय नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए संपूर्ण परिस्थितियों का आकलन करना अनिवार्य होता है।

संवेदनशील व्यक्ति बनाम सामान्य व्यक्ति का पैमाना

कानूनी विश्लेषण के दौरान पीठ ने यह भी विचार किया कि क्या आरोपी पक्ष का आचरण किसी सामान्य व्यक्ति को ऐसा कठोर कदम उठाने पर विवश कर सकता था, या फिर मृतक अत्यधिक संवेदनशील स्वभाव का था। यह पूरा घटनाक्रम मार्च 2020 का है जब गुजरात में एक पति-पत्नी के बीच गंभीर विवाद हुआ था। महिला ने अपने पति पर मारपीट का आरोप लगाया था जिसके बाद वह अपने बेटे के साथ अहमदाबाद में अपने माता-पिता के निवास पर चली गई थी। इसके बाद महिला ने पति के विरुद्ध घरेलू हिंसा और मारपीट की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके कुछ समय बाद मृतक के भाई ने महिला के माता-पिता और भाई को आरोपी बनाते हुए कानूनी शिकायत दर्ज कराई थी जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने मृतक को प्रताड़ित किया और गुजारा भत्ते का नोटिस भेजकर उसे आत्महत्या के लिए बाध्य किया।

गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील

इस पूरे घटनाक्रम के बाद महिला के माता-पिता और भाई ने निचली अदालत या पुलिस द्वारा दर्ज उस एफआईआर को रद्द कराने के लिए गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि, सितंबर 2025 में हाईकोर्ट ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसके परिणामस्वरुप उन्हें सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से यह मजबूत दलील दी गई कि गुजारा भत्ता मांगना और एफआईआर दर्ज कराना पूरी तरह से वैधानिक प्रक्रिया है और इसे आत्महत्या के लिए उकसाना करार नहीं दिया जा सकता। वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकार की ओर से अदालत के समक्ष मृतक का सुसाइड नोट प्रस्तुत किया गया ताकि मामले की वास्तविकता को परखा जा सके।

अदालत ने सुसाइड नोट का बारीकी से निरीक्षण किया और पाया कि वह पत्र मृतक के बड़े भाई, बड़ी बहन, पत्नी और सास-ससुर समेत कई रिश्तेदारों को संबोधित किया गया था। मृतक ने अपनी विफल शादीशुदा जिंदगी के लिए अपीलकर्ताओं को जिम्मेदार जरूर ठहराया था, लेकिन उसने अपने नोट में ऐसा कोई भी विशिष्ट आरोप नहीं लगाया था जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने उसे इस हद तक प्रताड़ित किया था कि उसके पास जीवन समाप्त करने के अलावा कोई अन्य विकल्प न बचा हो।

आईपीसी की धारा 107 की कानूनी व्याख्या

इस कानूनी स्थिति को और स्पष्ट करते हुए सर्वोच्च अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 107 का उल्लेख किया। इस धारा के अंतर्गत उकसाने या दुष्प्रेरण के कानूनी अर्थ को परिभाषित किया गया है जिसके तहत किसी व्यक्ति को कोई कार्य करने के लिए प्रेरित करना, उसकी साजिश रचना या किसी अवैध omission के जरिए सहायता करना शामिल है। पीठ ने पाया कि इस मामले में न तो एफआईआर और न ही सुसाइड नोट के भीतर उकसाने के लिए आवश्यक कानूनी तत्व मौजूद थे। अदालत ने इस आरोप को भी सिरे से खारिज कर दिया कि केवल इसलिए अपीलकर्ताओं को दोषी माना जा सकता है क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी को वैधानिक कदम उठाने की सलाह दी थी।

अन्याय और मतभेदों पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि दाम्पत्य जीवन में अक्सर ऐसे तनावपूर्ण दौर आते हैं जहां पति-पत्नी एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं और कानूनी उपायों का सहारा लेते हैं। इस प्रकार के कानूनी कदम उठाना अपने आप में उकसाने का कृत्य नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि अपीलकर्ता मृतक से अलग रह रहे थे, इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि उनका मृतक पर ऐसा कोई नियंत्रण या प्रभाव था जिससे वह आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो गया हो। अंत में अदालत ने यह भी जोड़ा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मृतक के अपने आंतरिक अपराधबोध ने उसके इस अंतिम निर्णय में कोई भूमिका निभाई हो।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या मुख्य बात कही है?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी रास्ता अपनाना या एफआईआर दर्ज कराना, भले ही वह बाद में झूठी साबित हो, आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं है।
यह मामला किस वर्ष और किस राज्य के विवाद से जुड़ा है?
यह मामला मार्च 2020 में गुजरात के एक पति-पत्नी के बीच हुए विवाद से जुड़ा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने किन न्यायाधीशों की बेंच के तहत यह फैसला सुनाया?
यह फैसला जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच द्वारा सुनाया गया है।
अदालत ने किस कानूनी धारा का विशेष रूप से उल्लेख किया?
अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 107 का जिक्र किया जिसमें उकसाने के कानूनी अर्थ को परिभाषित किया गया है।
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