मई 1999 के अंतिम सप्ताह में लद्दाख की बर्फ से ढकी ऊंची चोटियों पर जब कारगिल युद्ध अपनी पूरी भयावहता के साथ जारी था, तब भारतीय वायु सेना ने ऑपरेशन सफेद सागर की शुरुआत की थी। इस रणनीतिक हवाई अभियान का उद्देश्य नियंत्रण रेखा के पार से घुसपैठ कर भारतीय सीमा में कब्जा जमाए बैठे घुसपैठियों और दुश्मनों को खदेड़ना था। इसी ऐतिहासिक सैन्य अभियान के दौरान भारतीय वायु सेना के दो बहादुर अधिकारियों स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा और फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता की गाथाएं हमेशा के लिए अमर हो गईं। सर्वोच्च बलिदान, अटूट देशभक्ति और बेजोड़ सैन्य साथीपन की यह गाथा आज भी भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।
स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की शुरुआती जिंदगी और करियर
22 मई 1963 को राजस्थान के कोटा शहर में जन्मे अजय आहूजा बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और निडर स्वभाव के थे। अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में प्रवेश पाया, जहां उन्होंने कठिन सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। 14 जून 1985 को उन्हें भारतीय वायु सेना में एक फाइटर पायलट के रूप में कमीशन प्रदान किया गया। अपने 14 वर्षों के शानदार और समर्पित करियर के दौरान उन्होंने मिग-21 और मिग-23 जैसे अग्रिम पंक्ति के कई लड़ाकू विमानों में उत्कृष्ट महारत हासिल की।
वे केवल एक निपुण फाइटर पायलट ही नहीं थे, बल्कि एक योग्य फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर भी थे। उनके पास 1,000 घंटे से भी अधिक की जटिल और चुनौतीपूर्ण उड़ान का विशाल अनुभव था। कारगिल युद्ध छिड़ने के समय वे बठिंडा स्थित प्रतिष्ठित नंबर 17 स्क्वाड्रन 'गोल्डन एरोज' के फ्लाइट कमांडर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। अपने सहयोगियों के बीच अपनी नेतृत्व क्षमता और शांत स्वभाव के लिए जाने जाने वाले आहूजा किसी भी कठिन से कठिन परिस्थिति में आगे बढ़कर नेतृत्व करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।
27 मई 1999: बटालिक सेक्टर का खतरनाक मिशन
27 मई 1999 की तारीख कारगिल युद्ध के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण मोड़ बनकर आई। स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा बटालिक सेक्टर के मुंथो धालो इलाके में एक टोही और फोटो-जासूसी मिशन का नेतृत्व कर रहे थे। उनका मुख्य काम दुश्मन के ठिकानों और मिसाइल पॉकेट्स की सटीक तस्वीरें लेकर भारतीय सेना को देना था।
इसी मिशन के दौरान श्रीनगर एयरबेस से चार लड़ाकू विमानों के एक समूह ने दुश्मन की चौकियों पर बमबारी के उद्देश्य से उड़ान भरी थी। इस समूह में 26 वर्षीय युवा पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता भी शामिल थे, जो मिग-27 लड़ाकू विमान उड़ा रहे थे। नचिकेता का काम मुंथो धालो में 15,000 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित दुश्मन के गोला-बारूद के मुख्य डिपो पर रॉकेट से सटीक हमला करना था।
मुंथो धालो में तकनीकी खराबी और आपातकालीन इजेक्शन
जैसे ही नचिकेता ने अपने मिग-27 से दुश्मन के ठिकाने पर रॉकेट दागे, उनके विमान का इंजन अचानक बंद हो गया। मिग-27 एक सिंगल-इंजन विमान था, इसलिए हवा में दोबारा इंजन शुरू करने की प्रक्रिया काम नहीं कर सकी। विमान बहुत तेजी से पहाड़ी ढलानों की ओर गिरने लगा।
उस भयानक स्थिति को याद करते हुए बाद में सामने आई जानकारियों में स्पष्ट हुआ कि बर्फीली चोटियों को बहुत करीब से अपनी ओर आते देख नचिकेता के पास इजेक्ट करने के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं बचा था। यदि वे कुछ सेकंड की भी देरी करते तो उनका विमान सीधे पहाड़ से टकराकर नष्ट हो जाता। नचिकेता ने 15,000 फीट की ऊंचाई पर आपातकालीन इजेक्शन लीवर खींचा और पैराशूट के जरिए सुरक्षित लेकिन दुश्मन के कब्जे वाले बेहद ठंडे इलाके में उतरे।
अपने साथी की तलाश में अजय आहूजा का साहसिक निर्णय
जब अजय आहूजा को रेडियो पर यह सूचना मिली कि नचिकेता का मिग-27 दुर्घटनाग्रस्त हो गया है और वे दुश्मन की सीमा के पास इजेक्ट कर चुके हैं, तो उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपने निर्धारित मिशन का प्रोफाइल तुरंत बदल दिया। अपने साथी की जान बचाना उनके लिए प्राथमिकता बन गया। वे जानते थे कि वह इलाका दुश्मन की सतह से हवा में मार करने वाली घातक मिसाइलों से घिरा हुआ था, फिर भी वे अपने मिग-21 विमान के साथ उस खतरनाक क्षेत्र में गहराई तक चले गए।
अजय आहूजा ने नचिकेता के संभावित क्रैश साइट की पहचान की और अपने साथ उड़ रहे दूसरे विमान को सुरक्षित वापस लौट जाने का निर्देश दिया। वे खुद नचिकेता की तलाश में उसी इलाके में लगातार मंडराते रहे। इसी दौरान पाकिस्तानी सेना ने सतह से हवा में मार करने वाली स्टिंगर मिसाइल से उनके मिग-21 को निशाना बनाया। मिसाइल लगते ही उनका विमान क्षतिग्रस्त हो गया और उन्हें भी मजबूरी में इजेक्ट करना पड़ा।
अजय आहूजा की शहादत और मरणोपरांत सम्मान
36 वर्षीय स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा पैराशूट के जरिए सुरक्षित जमीन पर उतरे, लेकिन वे दुर्भाग्य से दुश्मन की सेना के कब्जे वाले क्षेत्र में जा पहुंचे। वहां पाकिस्तानी सैनिकों ने युद्ध के अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करते हुए उन्हें बंदी बना लिया और बेहद निर्दयता से उनकी हत्या कर दी। भारतीय वायु सेना ने उनके इस अद्वितीय समर्पण, अदम्य साहस और साथी के प्रति वफादारी के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के तीसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'वीर चक्र' से अलंकृत किया।
नचिकेता की ज़मीनी मुठभेड़ और दुश्मनों द्वारा गिरफ्तारी
दूसरी ओर, पैराशूट से उतरने के बाद नचिकेता खुद को बर्फीली पहाड़ियों के बीच एकदम अकेला पाया। उनके पास आत्मरक्षा के लिए केवल एक 9एमएम पिस्तौल और 16 राउंड गोलियां थीं। जल्द ही उन्होंने देखा कि 5 से 6 हथियारबंद दुश्मन सैनिक उनकी तरफ बढ़ रहे हैं। नचिकेता ने अपनी पिस्तौल से बहादुरी से फायरिंग शुरू की और पहली मैगजीन की 8 गोलियां दाग दीं।
जब वे दूसरी मैगजीन लोड करने का प्रयास कर रहे थे, तब तक एक दुश्मन सैनिक उनके बिल्कुल करीब पहुंच गया। उसने अपनी एके-47 राइफल की नली सीधे नचिकेता के मुंह में घुसा दी। मौत बिल्कुल सामने थी और उस सैनिक की उंगली ट्रिगर पर थी। लेकिन तभी 5वीं नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री के कैप्टन कमर ने दखल दिया और उस सैनिक को गोली चलाने से रोक दिया। कैप्टन कमर ने नचिकेता को प्राथमिक उपचार भी दिया, हालांकि बाद में युद्ध के दौरान कैप्टन कमर भी मारा गया।
आठ दिनों की भीषण यातना और सम्मानजनक वापसी
गिरफ्तारी के बाद नचिकेता को एक पाकिस्तानी सैन्य शिविर में ले जाया गया, जहां उन्हें आठ दिनों तक कड़े कारावास में रखा गया। शुरुआत में उनसे सामान्य पूछताछ की गई, लेकिन जब उन्होंने कोई भी रणनीतिक जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया, तो उन्हें इस्लामाबाद और फिर रावलपिंडी स्थित आईएसआई की विशेष पूछताछ इकाई को सौंप दिया गया।
वहां उन्हें मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से तोड़ने के लिए अमानवीय यातनाएं दी गईं। उन्हें कई दिनों तक बिना खाने और पानी के रखा गया, तेज रोशनी वाले हाई-वोल्टेज बल्बों के नीचे सोने नहीं दिया गया और लगातार खड़ा रखकर शारीरिक प्रताड़ना दी गई। इन तमाम अत्याचारों के बावजूद नचिकेता ने भारतीय सेना का कोई भी राज दुश्मन के सामने जाहिर नहीं होने दिया। आखिरकार, कूटनीतिक दबाव के बाद आठ दिनों की कैद के बाद उन्हें रेड क्रॉस के माध्यम से भारत को सौंप दिया गया। वे बाद में भारतीय वायु सेना में ग्रुप कैप्टन के पद से सेवानिवृत्त हुए।
अमर गाथा और आज के दौर में इसकी प्रासंगिकता
कारगिल युद्ध के ये दो नायक भारत की स्वतंत्रता और संप्रभुता के प्रतीक हैं। हाल के दिनों में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर 'ऑपरेशन सफेद सागर' नाम से आई नाटकीय प्रस्तुति ने इस महान ऐतिहासिक घटना को एक बार फिर देशवासियों के सामने जीवंत किया है, जिसमें अभिनेता सिद्धार्थ ने स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की भूमिका निभाई है। 'विंग्स ऑफ वैलर' जैसी सैन्य पुस्तकों में भी इन वीरों की विस्तृत कहानियों का उल्लेख मिलता है, जो आने वाली हर पीढ़ी को यह याद दिलाती हैं कि देश की सुरक्षा और आजादी की कीमत हमारे वीर जवानों के रक्त और बलिदान से चुकाई जाती है।





















