भारत के मुख्य संवैधानिक न्यायालय ने अंधविश्वास और कुरुतियों के नाम पर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। ओडिशा में करीब दो दशक से भी अधिक पुराने एक जघन्य हत्या के मामले में सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि महिलाओं को प्रताड़ित करने और उनकी जान लेने वाली कुप्रथाओं को किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जाएगा। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की दो सदस्यीय पीठ ने मुख्य अभियुक्त बालकू ओराम की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने सामाजिक चेतना को झकझोरते हुए टिप्पणी की कि यदि अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं पर ऐसे अत्याचार होते रहे, तो भारत का संवैधानिक लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।
अंधविश्वास के नाम पर बर्बरता की खौफनाक दास्तान
यह पूरा मामला साल 1998 का है, जब ओडिशा के एक गांव में अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी गई थीं। मुख्य अपराधी बालकू ओराम ने अपने एक साथी के साथ मिलकर एक असहाय महिला के खिलाफ साजिश रची। दोनों अभियुक्तों ने उस बेबस महिला पर डायन होने का झूठा और बेबुनियाद आरोप लगाया। इसके बाद वे महिला को उसके घर से जबरन घसीटकर बाहर ले आए और उस पर बेरहमी से हमला कर दिया। हमलावरों ने महिला की इतनी निर्ममता से पिटाई की कि उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
इस दिल दहला देने वाली घटना का सबसे दर्दनाक पहलू यह था कि पूरी वारदात पीड़ित महिला की मासूम बेटी की आंखों के सामने अंजाम दी गई। अपनी ही मां को तड़प-तड़पकर मरते देखने का वह दृश्य उस बच्ची के मन मस्तिष्क पर जिंदगी भर के लिए एक गहरा सदमा छोड़ गया। इस वारदात की क्रूरता ने न केवल स्थानीय लोगों को बल्कि देश की सर्वोच्च न्यायपालिका को भी हिलाकर रख दिया।
निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर
कानूनी प्रक्रिया के तहत इस मामले की सुनवाई सबसे पहले निचली अदालत में हुई थी, जहां साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर बालकू ओराम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। बाद में अभियुक्त ने इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन ओडिशा हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के निर्णय को बिल्कुल सटीक मानते हुए सजा को यथावत रखा था।
इसके पश्चात मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि हाईकोर्ट का आदेश पूरी तरह से न्यायसंगत और कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप है। शीर्ष अदालत ने बालकू ओराम की अपील को खारिज करते हुए कहा कि न्याय की व्यवस्था में तर्कहीन मान्यताओं और कुप्रथाओं के स्थान पर कानून के शासन की ही जीत होनी चाहिए।
संवैधानिक लोकतंत्र और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर जोर
अपने विस्तृत आदेश में सर्वोच्च अदालत ने देश में जारी अंधविश्वास की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार देता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का संदेश देता है। ऐसे में किसी भी महिला को डायन कहकर प्रताड़ित करना या उसकी हत्या करना एक अक्षम्य अपराध है। कड़े कानूनी प्रावधानों के बावजूद समाज के कुछ हिस्सों में ऐसी घटनाओं का जारी रहना बेहद चिंताजनक है।
अदालत ने सख्त लहजे में चेतावनी दी कि महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले और उनके जीवन को खतरे में डालने वाले अपराधियों के साथ कोई रियायत नहीं बरती जाएगी। कोर्ट ने रेखांकित किया कि कानून का राज बनाए रखने के लिए समाज को अपनी संकीर्ण और हिंसक सोच बदलनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने संदेश दिया कि जब तक समाज में महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक लोकतांत्रिक मूल्य अधूरे रहेंगे।




















