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नालसार यूनिवर्सिटी के छात्रों पर लगा BCI का रजिस्ट्रेशन बैन वापस, SCBA के विरोध के बाद फैसलाभारत
13 अग॰ 2026, 10:37 pm (3 घंटे पहले)· 2

नालसार यूनिवर्सिटी के छात्रों पर लगा BCI का रजिस्ट्रेशन बैन वापस, SCBA के विरोध के बाद फैसला

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने हैदराबाद की नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के छात्रों पर वकील रजिस्ट्रेशन का प्रतिबंध वापस ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. विकास सिंह द्वारा इस कदम को गैरकानूनी और मनमाना बताने के बाद यह आदेश रद्द किया गया।

हैदराबाद स्थित प्रतिष्ठित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों के हक में बड़ी राहत की खबर सामने आई है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने वर्ष 2026 बैच के लॉ ग्रेजुएट्स के एडवोकेट एनरोलमेंट पर लगाया गया अपना व्यापक प्रतिबंध औपचारिक रूप से वापस ले लिया है। देश की सर्वोच्च वकीलों की संस्था सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा इस फैसले को असंवैधानिक और मनमाना करार देने के बाद नियामक संस्था को अपना कदम पीछे खींचना पड़ा। इस निर्णय के निरस्त होने से सैकड़ों भावी वकीलों के करियर पर मंडरा रहा अनिश्चितता का संकट समाप्त हो गया है।

दीक्षांत समारोह में विरोध और BCI का विवादित निर्देश

विवाद की शुरुआत हैदराबाद की नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित दीक्षांत समारोह के दौरान हुई। समारोह में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की उपस्थिति को लेकर कुछ छात्रों ने अपना विरोध दर्ज कराया था और एक अभियान चलाया था। इस घटनाक्रम के तुरंत बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने एक कड़ा निर्देश जारी कर दिया। BCI ने अपने आदेश में कहा था कि जब तक अगला निर्देश जारी नहीं होता, तब तक वर्ष 2026 में नालसार यूनिवर्सिटी से अपनी लॉ की डिग्री पूरी करने वाले किसी भी छात्र को देश के किसी भी राज्य की बार काउंसिल में वकील के रूप में पंजीकृत नहीं किया जाएगा। इस सामूहिक प्रतिबंध से 2026 बैच के सभी युवा ग्रेजुएट्स का पेशेवर भविष्य अधर में लटक गया था।

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SCBA की आपत्ति और 13 अगस्त का पत्र

BCI के इस अप्रत्याशित रुख के बाद कानूनी बिरादरी में गहरा असंतोष फैल गया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष डॉ. विकास सिंह ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए 13 अगस्त को BCI चेयरमैन को एक औपचारिक पत्र लिखा। उन्होंने अपने पत्र में BCI के इस कदम की तीखी आलोचना की और इसे पूरी तरह से मनमाना, गैरकानूनी तथा असंगत करार दिया। SCBA अध्यक्ष ने तर्क दिया कि शैक्षणिक संस्थान और विश्वविद्यालय हमेशा से ही स्वतंत्र विचारों, निर्भीक चर्चाओं और अभिव्यक्ति की आजादी के प्रमुख केंद्र रहे हैं। किसी संवैधानिक पद पर आसीन अथॉरिटी के साथ छात्रों की असहमति या विरोध के आधार पर उन्हें वकालत के पेशे में आने से रोकना पूरी तरह से अनुचित है।

डॉ. विकास सिंह ने पत्र में कहा कि विश्वविद्यालय "स्वतंत्र विचार, निर्भीक बहस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के केंद्र होते हैं।" उन्होंने स्पष्ट किया कि छात्रों को उनके संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करने पर सजा देना या उन्हें डराना लोकतंत्र और कानून के शासन के सिद्धांतों के खिलाफ है।

एडवोकेट्स एक्ट 1961 और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

SCBA अध्यक्ष ने अपने पत्र में विधिक और संवैधानिक पहलुओं को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में कानूनी पेशे को संचालित करने वाला मुख्य कानून एडवोकेट्स एक्ट, 1961 है। यह अधिनियम केवल व्यक्तिगत रूप से वकीलों की योग्यता और पंजीकरण के मानदंडों को नियंत्रित करता है। इसमें किसी विश्वविद्यालय के पूरे बैच पर इस प्रकार का सामूहिक प्रतिबंध लगाने या उन्हें दंडित करने का कोई वैधानिक अधिकार या प्रावधान मौजूद नहीं है।

इसके अलावा, डॉ. विकास सिंह ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का विशेष रूप से उल्लेख किया। यह अनुच्छेद हर भारतीय नागरिक को अपनी पसंद का व्यापार, व्यवसाय या पेशा चुनने और उसका अभ्यास करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। BCI का निर्देश सीधे तौर पर छात्रों के इस मौलिक अधिकार का हनन कर रहा था। देश में लीगल प्रोफेशन की शीर्ष नियामक संस्था होने के नाते BCI का मुख्य दायित्व संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना है, न कि सामूहिक दंड की व्यवस्था लागू करना।

BCI का फैसला वापस और भावी वकीलों को राहत

SCBA द्वारा दर्ज कराए गए कड़े विरोध और कानूनी तर्कों के सामने BCI को अपने स्टैंड पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा। आखिरकार BCI ने NALSAR यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के छात्रों पर लगाए गए इस प्रतिबंध को पूरी तरह वापस ले लिया। इस आदेश के निरस्त होने से अब 2026 बैच के सभी ग्रेजुएट्स बिना किसी अड़चन के देश की किसी भी स्टेट बार काउंसिल में अपना एनरोलमेंट करा सकेंगे और एक वकील के रूप में अपनी प्रैक्टिस शुरू कर सकेंगे।

सवाल-जवाब

BCI ने नालसार यूनिवर्सिटी के छात्रों पर क्या प्रतिबंध लगाया था?
BCI ने 2026 बैच के नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के किसी भी छात्र का देश की किसी भी स्टेट बार काउंसिल में एडवोकेट के रूप में रजिस्ट्रेशन करने पर रोक लगा दी थी।
BCI के इस विवादित आदेश का विरोध किसने किया?
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष डॉ. विकास सिंह ने BCI चेयरमैन को पत्र लिखकर इस आदेश को पूरी तरह मनमाना, गैरकानूनी और असंगत बताया।
SCBA अध्यक्ष ने संविधान के किस अनुच्छेद का उल्लेख किया?
डॉ. विकास सिंह ने अनुच्छेद 19(1)(g) का हवाला दिया, जो भारतीय नागरिकों को अपनी पसंद का पेशा चुनने और वकालत करने का मौलिक अधिकार देता है।
नालसार यूनिवर्सिटी के छात्रों के खिलाफ यह कदम क्यों उठाया गया था?
विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की उपस्थिति का विरोध करने वाले छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में यह निर्देश जारी किया गया था।
एडवोकेट्स एक्ट 1961 को लेकर SCBA ने क्या स्पष्ट किया?
SCBA ने स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट 1961 केवल वकीलों के एनरोलमेंट की योग्यताओं को नियंत्रित करता है और इसमें सामूहिक प्रतिबंध का कोई प्रावधान नहीं है।
इस विवाद का अंतिम परिणाम क्या निकला?
व्यापक कानूनी विरोध के बाद BCI को अपना फैसला वापस लेना पड़ा, जिससे 2026 बैच के लॉ ग्रेजुएट्स के वकालत पंजीकरण का रास्ता साफ हो गया।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·33 मिनट पहले

यह मामला नियामक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र और एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के दायरे पर एक गंभीर कानूनी सवाल खड़े करता है। सामूहिक रूप से वकालत से रोकना नैसर्गिक न्याय और अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत मिले आजीविका के अधिकार का सीधा उल्लंघन था। हालांकि राहत मिल गई है, लेकिन भविष्य में ऐसे प्रशासनिक आदेशों को रोकने के लिए वैधानिक दिशानिर्देश तय करना जरूरी है, ताकि संस्थागत विरोध को पेशेवर करियर पर भारी पड़ने से रोका जा सके।

Arjun Mehta@arjun-mehta·33 मिनट पहले

यह घटना विधिक नियामकों और शैक्षणिक स्वायत्तता के बीच बढ़ते टकराव को उजागर करती है। एडवोकेट्स एक्ट के तहत पेशेवर पात्रता तय करने वाली संस्थाओं द्वारा असहमति के आधार पर सामूहिक प्रतिबंध लगाना वैधानिक सीमाओं का गंभीर अतिक्रमण था। यदि इस प्रशासनिक ओवररीच पर न्यायिक समीक्षा या स्पष्ट संसदीय दिशानिर्देश नहीं आए, तो यह उच्च शिक्षा परिसरों में वैचारिक स्वतंत्रता को कुचलने का एक खतरनाक प्रशासनिक हथियार बन सकता है, जो भविष्य में लोकतांत्रिक संवाद के लिए गंभीर चुनौती पेश करेगा।

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