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कर्मचारियों को अपनी असहमति और शिकायतें रखने का पूरा हक, अनुबंधित कंडक्टर की बर्खास्तगी रद्द कर पद पर लौटायाहिमाचल प्रदेश
24 सित॰ 2026, 11:17 am (44 दिन पहले)· 1

कर्मचारियों को अपनी असहमति और शिकायतें रखने का पूरा हक, अनुबंधित कंडक्टर की बर्खास्तगी रद्द कर पद पर लौटाया

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने अनुबंधित बस परिचालक को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बंद चैट समूह में नीतियों की समीक्षा करना प्रबंधन की सार्वजनिक निंदा नहीं माना जा सकता।

कार्यस्थल पर काम करने वाले कर्मियों की चिंताओं और उनके अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था सामने आई है। अदालत ने दो-टूक शब्दों में साफ किया है कि किसी भी महकमे के भीतर बंद मंचों पर नीतियों की चर्चा करना या अपनी परेशानियां जाहिर करना कोई अनुशासनहीनता नहीं है। इसी आधार पर व्यवस्था देते हुए बेंच ने राज्य परिवहन विभाग के एक कर्मचारी को सेवा से हटाने के फैसले को पूरी तरह अनुचित करार देकर निरस्त कर दिया और उसे काम पर वापस लेने का आदेश सुनाया।

बंद चैट में नियमों की समीक्षा पर गिरी थी गाज

यह पूरा मामला सितंबर 2023 का है, जब कुछ परिचालकों ने मिलकर 'हिमाचल परिचालक एकता' नाम से एक व्हाट्सऐप ग्रुप तैयार किया था। वर्ष 2021 में अनुबंध के आधार पर तैनात किए गए सुनील कुमार ने इस समूह के भीतर दो सामान्य संदेश भेजे थे। इन संदेशों के जरिए महकमे द्वारा लागू किए गए नए सेवा नियमों की समीक्षा की गई थी और कर्मचारियों पर पड़ने वाले उनके नफा-नुकसान का आकलन किया गया था। इस संवाद को हिमाचल प्रदेश सड़क परिवहन निगम के प्रबंधन ने अपनी आचार संहिता और सोशल मीडिया दिशानिर्देशों के प्रतिकूल मान लिया। इसके तुरंत बाद अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन का हवाला देते हुए 10 अक्टूबर, 2023 को कुमार को नौकरी से बर्खास्त करने का फरमान जारी कर दिया गया था।

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प्रबंधन के पहले से तय रवैये पर न्यायिक फटकार

अचानक हुई इस कार्रवाई के खिलाफ पीड़ित कर्मचारी ने न्याय के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। मामले से जुड़े तमाम तथ्यों और तर्कों की पड़ताल करने के बाद अदालत ने निगम की पूरी प्रक्रिया में गंभीर खामियां रेखांकित कीं। अदालत ने टिप्पणी की कि महकमे ने कारण बताओ नोटिस थमाते वक्त ही यह मन बना लिया था कि संबंधित कर्मी सेवा में रखे जाने योग्य नहीं है। इस तरह की एकतरफा धारणा निष्पक्ष जांच और प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है।

संस्थान की बेहतरी के लिए असंतोष सामने आना आवश्यक

फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी दफ्तर या संस्था में कार्यरत लोगों के मन में अपने अधिकारियों या प्रशासनिक नीतियों को लेकर गिला-शिकवा होना बिल्कुल स्वाभाविक प्रक्रिया है। अदालत ने कहा, "खुद संस्था के हित में यह बेहतर है कि ऐसी शिकायतों को जाहिर करने दिया जाए, क्योंकि इससे सुधार हो सकता है।" न्यायपीठ ने यह भी तय किया कि जब तक कर्मचारियों द्वारा अपनी बात रखने से संस्थान की साख को सीधा नुकसान न पहुंच रहा हो, तब तक प्रबंधन को ऐसी अंदरूनी बातचीत में कतई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इस विस्तृत टिप्पणी के साथ बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया गया।

सवाल-जवाब

उच्च न्यायालय ने किस कर्मचारी की बर्खास्तगी का आदेश रद्द किया है?
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश सड़क परिवहन निगम के अनुबंधित परिचालक सुनील कुमार की बर्खास्तगी का आदेश रद्द किया है।
सुनील कुमार को किस कारण नौकरी से निकाला गया था?
उन्होंने 'हिमाचल परिचालक एकता' व्हाट्सऐप ग्रुप में नए नियमों के फायदे और नुकसान को लेकर दो सामान्य संदेश साझा किए थे, जिसे प्रबंधन ने नियमों का उल्लंघन माना था।
प्रबंधन ने बर्खास्तगी का आदेश कब जारी किया था?
हिमाचल प्रदेश सड़क परिवहन निगम ने 10 अक्टूबर, 2023 को सुनील कुमार की सेवाएं समाप्त करने का आदेश दिया था।
कर्मचारियों की शिकायतों को लेकर अदालत ने क्या महत्वपूर्ण टिप्पणी की?
अदालत ने कहा कि संस्था के हित में शिकायतों को जाहिर होने देना चाहिए क्योंकि इससे सुधार हो सकता है, और जब तक प्रतिष्ठा को सीधा नुकसान न हो तब तक प्रबंधन को दखल नहीं देना चाहिए।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·43 दिन पहले

अदालत का यह फैसला बहुत राहत देने वाला है। कई बार निजी व्हाट्सऐप ग्रुप की बातों को भी बड़ा मुद्दा बनाकर नौकरी से निकाल दिया जाता है, जो बिल्कुल गलत है। काम करने की जगहों पर संवाद खुला रहना चाहिए।

Arjun Mehta@arjun-mehta·43 दिन पहले

व्हाट्सऐप ग्रुप में काम की बात करने पर नौकरी से निकालना कौन सा न्याय है? अच्छा हुआ कोर्ट ने सुनील कुमार को वापस काम पर रखने का आदेश दिया, वरना छोटी सी बात पर किसी का घर उजड़ जाता।

Ravikash Gupta@ravikash·43 दिन पहले

अर्जुन भाई, बात तो सही है कि नौकरी नहीं जानी चाहिए थी, पर क्या गारंटी है कि वो ग्रुप सिर्फ काम तक ही सीमित था? कई बार ऐसे मामलों में अंदर की बातें कुछ और ही होती हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·43 दिन पहले

अदालत का फैसला सही है कि बंद ग्रुप में बात करना बगावत नहीं, पर निजी वॉट्सऐप ग्रुप भी आजकल पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहते। महकमा अगर पहले से ही मन बना चुका था, तो शायद इस कंडक्टर को आगे भी संभलकर ही चलना पड़ेगा।

Rohan Verma@rohan-verma·43 दिन पहले

करण भाई, यूपी रोडवेज में भी ऐसे कई मामलों में कर्मचारी अंदरखाने घुटते रहते हैं। अदालत का रुख वाकई राहत देने वाला है।

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