अमेज़न के जंगलों और वहां बहने वाली जलधाराओं के आसपास रहने वाले स्थानीय समुदायों के बीच पिंक रिवर डॉल्फिन को लेकर कई तरह की दिलचस्प कहानियां प्रचलित हैं। वहां के निवासियों के बीच एक बेहद अनोखी लोककथा पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसके मुताबिक ये गुलाबी जीव रात के समय किसी सुंदर और गोरे इंसान का रूप धर लेते हैं। स्थानीय लोगों का ऐसा मानना है कि रात ढलते ही ये सुंदर रूप बदलकर गांवों में पहुंच जाती हैं और वहां महिलाओं को अपने मोहपाश में फंसाकर उनका अपहरण कर लेती हैं।
दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की डॉल्फिन
पहली नजर में देखने पर ये जीव किसी कृत्रिम खिलौने की तरह प्रतीत होते हैं। इनका शरीर हल्के गुलाबी रंग का होता है, सिर तरबूज के आकार की तरह थोड़ा उभरा हुआ रहता है और इनकी चोंच लंबी होती है जिसमें करीब 100 दांत मौजूद होते हैं। शारीरिक बनावट के कारण ये किसी प्लास्टिक के आकर्षक खिलौने जैसी लग सकती हैं, लेकिन असलियत में ये पृथ्वी पर मौजूद मीठे पानी की डॉल्फिन की सबसे विशाल प्रजाति हैं। इनकी कुल लंबाई आठ फीट से अधिक हो सकती है और इनका वजन 200 किलोग्राम तक पहुंच जाता है।
मछुआरों के जाल से चालाकी से चुराती हैं मछलियां
इन जलीय जीवों की चतुर और शातिर हरकतें हाल ही में कैमरे में कैद की गई हैं। नेशनल ज्योग्राफिक से जुड़े वन्यजीव फोटोग्राफर थॉमस पेशाक ने पानी के भीतर इन डॉल्फिनों द्वारा की जाने वाली चोरी की गतिविधियों को अपने कैमरे में रिकॉर्ड किया है। ये डॉल्फिन इतनी अधिक बुद्धिमान और चालाक होती हैं कि पानी में किसी नाव के चलने की आवाज आते ही भांप लेती हैं कि भोजन तैयार है। ये पानी में तैरती हुई नावों के करीब पहुंचती हैं और मछुआरों द्वारा लगाए गए जालों में छेद करके अंदर सुरक्षित रखी मछलियों को आसानी से चुरा लेती हैं, जिसके चलते इन्हें शातिर चोर की संज्ञा दी जा रही है।
माथे के मेलन अंग से तैयार करती हैं सोनार मैप
अमेज़न क्षेत्र की नदियों का जल बहुत अधिक गंदला और मटमैला होता है, जिसकी वजह से पानी के भीतर अपनी सामान्य आंखों से कुछ भी देख पाना पूरी तरह असंभव होता है। ऐसी कठिन परिस्थितियों में इन डॉल्फिनों की शारीरिक बनावट उनकी मदद करती है। इनके सिर के ऊपरी हिस्से पर एक उभरा हुआ भाग होता है जिसे मेलन कहा जाता है। यह अंग एक प्रभावी साउंड एम्प्लीफायर की तरह काम करता है। इकोलोकेशन तकनीक के जरिए ये पानी के भीतर की हर वस्तु का सटीक दिमागी नक्शा पलभर में तैयार कर लेती हैं।
बदले की भावना और मछुआरों का बढ़ता आक्रोश
मछलियों के शिकार को चुराने और बड़ी मेहनत से तैयार किए गए जालों को फाड़ डालने की आदत की वजह से स्थानीय मछुआरे इन जीवों से अत्यधिक नफरत करते हैं। कई क्षेत्रों में स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो जाती है कि मछुआरे अपनी नावों के नुकीले पंखों और बंदूकों का इस्तेमाल करके इन डॉल्फिनों पर सीधा हमला कर देते हैं। इस मानवीय संघर्ष के कारण हर साल दर्जनों बेकसूर डॉल्फिन अपनी जान गंवा बैठती हैं।
प्रदूषण और जंगलों की आग का घातक असर
केवल इंसानी गुस्सा ही नहीं, बल्कि पर्यावरण से जुड़े कई गंभीर संकट भी इन जीवों के अस्तित्व पर भारी पड़ रहे हैं। अमेज़न के जंगलों में अक्सर लगने वाली भीषण आग के धुएं के कारण इन डॉल्फिनों को फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियां जकड़ रही हैं। इसके अलावा, सोने के अवैध खनन के दौरान पानी में मिलने वाला खतरनाक पारा और बड़ी मात्रा में फैलता प्लास्टिक कचरा इनके खून में घुल रहा है। इन जानलेवा कारणों से इनकी कुल आबादी तेजी से कम हो रही है और ये जीव खतरे के दायरे में आ चुके हैं।
बचाव के लिए विकसित किए गए आधुनिक उपाय
इन अनमोल जलीय जीवों को विलुप्त होने से बचाने के लिए अब वैज्ञानिक और स्थानीय मछुआरे मिलकर सकारात्मक दिशा में प्रयास कर रहे हैं। मछुआरों के शिकार पकड़ने वाले जालों में पिंगर्स नाम के केले के आकार के छोटे उपकरण लगाए जा रहे हैं। ये विशेष उपकरण एक खास तरह की ध्वनि उत्सर्जित करते हैं जिससे डॉल्फिन उस दायरे से दूर रहती हैं। इस तकनीक की मदद से एक तरफ जहां मछुआरों का आर्थिक नुकसान होना बंद हुआ है, वहीं दूसरी तरफ इन दुर्लभ डॉल्फिनों की अनमोल जान भी सुरक्षित बच रही है।



















