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कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: डिपोर्ट होने से ठीक पहले बचा अब्दुल रहीम, जानिये पूरा मामलाकर्नाटक
8 जुल॰ 2026, 10:55 pm (84 दिन पहले)· 2

कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: डिपोर्ट होने से ठीक पहले बचा अब्दुल रहीम, जानिये पूरा मामला

बेंगलुरु के एक डिटेंशन सेंटर में बंद अब्दुल रहीम को सरकार बांग्लादेशी मानकर बाहर निकालने वाली थी, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट ने उसके दावों के बाद डिपोर्टेशन पर रोक लगा दी है।

जिसे सरकारी एजेंसियां एक खूंखार और शातिर घुसपैठिया मानकर सरहद पार धकेलने की पूरी तैयारी कर चुकी थीं, डिटेंशन सेंटर की कालकोठरी में बंद उस शख्स की किस्मत का फैसला ऐन वक्त पर पलक झपकते ही बदल गया। बेंगलुरु के फारन रीजनल रजिस्‍ट्रेशन ऑफिस (FRRO) ने जिसे मोहम्मद रहीम हावलदार नाम का अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी करार देकर देश निकाला का फरमान जारी कर दिया था, उस पर कर्नाटक हाईकोर्ट में एक ऐसा सनसनीखेज मोड़ आया जिसने पूरे सिस्टम को हिलाकर रख दिया। दो दिन पहले अदालत के सामने खड़े होकर उस कथित विदेशी ने जब पूरी दहाड़ के साथ खुद को बेकसूर और इस माटी का लाल बताया, तो जज भी चौंक उठे।

कोर्ट में याचिकाकर्ता का भावुक और ठोस पक्ष

जस्टिस सूरज गोविंदराज की अदालत में याचिकाकर्ता अब्दुल रहीम ने चीख-चीखकर कहा कि वह किसी साजिश और गलत पहचान का शिकार हुआ है। वह कोई सरहद पार से आया घुसपैठिया नहीं बल्कि अप्रैल 1979 में देश की राजधानी नई दिल्ली के सीमापुरी में जन्मा और इसी मुल्क की हवाओं में पला-बढ़ा एक सच्चा हिंदुस्तानी है। अदालत को जैसे ही भनक लगी कि इस मामले में कोई बहुत बड़ी चूक या गंभीर सवाल छिपा हो सकता है, जज ने बिना वक्त गंवाए सरकार के डिपोर्टेशन के आदेश पर तुरंत स्टे लगा दिया। इस तरह आनन-फानन में होने वाले देश निकाले पर अचानक ब्रेक लग गया और कोर्ट ने हुक्म दिया कि बिना पुख्ता सत्यापन के कोई कदम न उठाया जाए।

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क्या है मामला और क्यों शुरू हुआ विवाद

इसी साल मार्च महीने में बेंगलुरु पुलिस ने संदिग्ध अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान के लिए एक विशेष अभियान चलाया था। इस मुहिम के दौरान अब्दुल रहीम को हिरासत में लिया गया और तब से वह बेंगलुरु के एक डिटेंशन सेंटर (हिरासत केंद्र) में बंद है। हिरासत में लिए जाने के बाद, FRRO ने विदेशी अधिनियम के तहत कार्रवाई शुरू करते हुए उसके डिपोर्टेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। जहां एक तरफ एफआरआरओ का दावा है कि हिरासत में लिया गया शख्स मोहम्मद रहीम हावलदार नाम का एक अवैध बांग्लादेशी नागरिक है, वहीं दूसरी तरफ याचिकाकर्ता का कहना है कि वह एक भारतीय नागरिक है और देश में उसकी जड़ें बेहद गहरी हैं।

दस्तावेजों के जरिए नागरिकता का दावा

अब्दुल रहीम ने खुद को भारतीय साबित करने के लिए अदालत के सामने दस्तावेजों की एक लंबी फेहरिस्त पेश की। उसने अपने दावों के समर्थन में आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे सरकारी दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। इसके साथ ही उसने अदालत को बताया कि वह बेंगलुरु में सरकार द्वारा पंजीकृत वेस्ट मैनेजमेंट और स्क्रैप ट्रेडिंग का बिजनेस चलाता है और उसके पास वैध GST रजिस्‍ट्रेशन प्रमाण पत्र भी मौजूद है। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि बिना कोई नोटिस दिए ही उसके डिपोर्टेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई जो उसके और उसके परिवार के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

आगे क्या होगा और कानूनी स्थिति

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि उत्तर प्रदेश की एक सत्र अदालत ने इसे बांग्लादेश से अवैध प्रवेश के मामले में दोषी ठहराया था, जिसे इसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। अदालत ने माना कि इस मामले में कई ऐसे सवाल हैं जिनका सत्यापन किया जाना बेहद जरूरी है। हाईकोर्ट ने एफआरआरओ को निर्देश दिया है कि कोई भी कदम उठाने से पहले रहीम की असल पहचान का पता लगाया जाए। इस मामले की अगली सुनवाई अब 14 जुलाई को होगी।

सवाल-जवाब

अब्दुल रहीम का मामला क्या है?
अब्दुल रहीम को बेंगलुरु पुलिस ने अवैध बांग्लादेशी मानकर हिरासत में लिया था, लेकिन उन्होंने इसे गलत पहचान का मामला बताते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
अब्दुल रहीम ने अपनी नागरिकता के लिए क्या सबूत दिए हैं?
उन्होंने आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी, राशन कार्ड और जीएसटी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जैसे भारतीय सरकारी दस्तावेज अदालत में पेश किए हैं।
हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया है?
अदालत ने डिपोर्टेशन की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है और अधिकारियों को रहीम की पहचान का फिर से पुख्ता सत्यापन करने का निर्देश दिया है।
अगली सुनवाई कब होगी?
इस मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई को तय की गई है।
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