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कर्नाटक में बढ़ा सियासी पारा, कांग्रेस नेता ने उमर खालिद को बताया सच्चा राष्ट्रवादी, BJP ने बोला तीखा हमलाकर्नाटक
15 सित॰ 2026, 6:45 pm (16 दिन पहले)· 1

कर्नाटक में बढ़ा सियासी पारा, कांग्रेस नेता ने उमर खालिद को बताया सच्चा राष्ट्रवादी, BJP ने बोला तीखा हमला

कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद द्वारा जेल में बंद उमर खालिद को 'राष्ट्रवादी' बताने और ABVP पर निशाना साधने के बाद BJP ने कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगाया है।

कर्नाटक में जेल में बंद कार्यकर्ता उमर खालिद को लेकर एक बड़ा राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद द्वारा उमर खालिद के समर्थन में दिए गए बयान के बाद कांग्रेस और BJP के बीच तीखा वाकयुद्ध छिड़ गया है। बेंगलुरु के एक नामी शैक्षणिक संस्थान में प्रस्तावित डॉक्यूमेंट्री स्क्रीनिंग के विरोध के बीच, वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने उमर खालिद को 'सच्चा राष्ट्रवादी' करार दिया। इस बयान के बाद BJP ने कांग्रेस पर तुष्टीकरण और देश विरोधी ताकतों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए चौतरफा हमला बोल दिया है।

विश्वविद्यालय में विवाद की शुरुआत और बीके हरिप्रसाद का बयान

यह पूरा मामला बेंगलुरु के नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) में शुरू हुआ, जहां एक छात्र संगठन ने उमर खालिद पर केंद्रित एक डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग आयोजित करने की योजना बनाई थी। इस आयोजन की खबर मिलते ही छात्र संगठन ABVP ने इसका कड़ा विरोध किया और प्रदर्शन शुरू कर दिए। विश्वविद्यालय परिसर में सुरक्षा व्यवस्था बिगड़ने और संभावित अशांति के डर से प्रशासन ने इस कार्यक्रम को अनिश्चितकाल के लिए टालने का निर्णय लिया। इस प्रशासनिक फैसले और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद ने ABVP की जमकर आलोचना की। उन्होंने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि उमर खालिद एक सच्चे राष्ट्रवादी हैं। इसके साथ ही उन्होंने ABVP पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि ये लोग नाथूराम गोडसे की पूजा करते हैं, जो आजाद भारत का पहला आतंकवादी था। हरिप्रसाद ने कहा कि गोडसे के समर्थकों के पास उमर खालिद की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

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BJP का तीखा पलटवार और संबित पात्रा के आरोप

कांग्रेस नेता के इस बयान पर प्रतिक्रिया देने में BJP ने तनिक भी देरी नहीं की। BJP सांसद संबित पात्रा ने एक विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और कांग्रेस नेतृत्व पर तीखे सवाल दगे। पात्रा ने बीके हरिप्रसाद के इस बयान को अत्यंत शर्मनाक और निंदनीय करार दिया। उन्होंने जनता को याद दिलाया कि उमर खालिद कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं हैं, बल्कि उन पर दिल्ली दंगों की गहरी साजिश रचने का बेहद गंभीर आरोप है। उनके खिलाफ सख्त कानून UAPA के तहत मामला दर्ज किया गया है। BJP सांसद ने स्पष्ट किया कि विभिन्न कानूनी मंचों पर उमर खालिद की जमानत याचिकाएं बार-बार खारिज की जा चुकी हैं, और देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया था। पात्रा ने सवाल किया कि ऐसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे आरोपी की ब्रांडिंग करके कांग्रेस उसे राष्ट्रवादी के रूप में क्यों पेश कर रही है।

ऐतिहासिक संदर्भ और तुष्टीकरण की राजनीति पर निशाना

अपनी बात को मजबूती से रखने के लिए संबित पात्रा ने कांग्रेस के पुराने इतिहास का हवाला देते हुए कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस हमेशा से देश विरोधी तत्वों के साथ खड़ी नजर आती रही है। पात्रा ने कहा कि जिस प्रकार कांग्रेस ने अतीत में यासीन मलिक का गर्मजोशी से स्वागत और समर्थन किया था, वही रवैया आज वे उमर खालिद के प्रति भी दिखा रहे हैं। BJP का आरोप है कि कांग्रेस पार्टी केवल अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखने और तुष्टीकरण की राजनीति को साधने के लिए देश की सुरक्षा एजेंसियों की जांच और न्यायपालिका के निर्णयों की सरेआम अनदेखी कर रही है।

सवाल-जवाब

यह पूरा विवाद कहाँ से शुरू हुआ?
यह विवाद बेंगलुरु के नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) में उमर खालिद पर एक डॉक्यूमेंट्री की प्रस्तावित स्क्रीनिंग के विरोध से शुरू हुआ।
बीके हरिप्रसाद ने उमर खालिद को लेकर क्या बयान दिया?
कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद ने उमर खालिद को एक 'सच्चा राष्ट्रवादी' बताया और उनके विरोधियों पर नाथूराम गोडसे की पूजा करने का आरोप लगाया।
संबित पात्रा ने कांग्रेस के बयानों का कैसे विरोध किया?
BJP सांसद संबित पात्रा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हरिप्रसाद के बयान को शर्मनाक बताया और याद दिलाया कि उमर खालिद दिल्ली दंगों की साजिश के आरोप में UAPA के तहत जेल में हैं।
क्या यूनिवर्सिटी में डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग हुई?
नहीं, छात्र संगठन ABVP के कड़े विरोध और सुरक्षा चिंताओं के कारण यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस कार्यक्रम को फिलहाल टाल दिया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·14 दिन पहले

यह विवाद दर्शाता है कि कैसे शैक्षणिक संस्थानों के भीतर उठने वाले मुद्दे तेजी से राष्ट्रीय स्तर के वैचारिक और राजनीतिक टकराव का रूप ले लेते हैं। आगामी राजनीतिक समीकरणों के मद्देनजर, यह तीखा वाकयुद्ध दोनों प्रमुख दलों द्वारा अपने-अपने कैडर और मुख्य मतदाता वर्ग को लामबंद करने की रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस जहां इस विमर्श से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आक्रामक राष्ट्रवाद के विरोध का संदेश देना चाहती है, वहीं भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा और तुष्टीकरण विरोधी रुख को धार देकर अपनी छवि मजबूत कर रही है। आने वाले समय में यह ध्रुवीकरण चुनावी बहसों को और तीखा बनाएगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·14 दिन पहले

कर्नाटक में उमर ख़ालिद पर जारी यह जुबानी जंग महज़ एक बयानबाज़ी नहीं, बल्कि आगामी चुनावों से पहले वैचारिक ध्रुवीकरण की एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है। बीके हरिप्रसाद द्वारा राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाना और भाजपा का तुष्टीकरण का आरोप लगाना दर्शाता है कि दोनों दल राज्य के स्थानीय शासन से ध्यान हटाकर अति-राष्ट्रवाद के आख्यान को केंद्र में लाना चाहते हैं। आने वाले दिनों में यह बहस अन्य राज्यों में भी राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर सकती है और काडर को लामबंद करने का काम करेगी।

Vikram Yadav@vikram-yadav·14 दिन पहले

अर्जुन के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, क्षेत्रीय राजनीति के नज़रिए से देखें तो राष्ट्रवाद और सुरक्षा से जुड़े ऐसे विवाद किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रहते। बिहार जैसे चुनावी राज्यों में, जहाँ जमीनी राजनीति अक्सर स्थानीय मुद्दों और सामाजिक गणित पर टिकी होती है, वहाँ भी ऐसे मुद्दे कैडर को लामबंद करने और ध्रुवीकरण तेज़ करने का हथियार बनते हैं। जब UAPA और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कानूनी बहसों को राजनीतिक मंच पर लाया जाता है, तो क्षेत्रीय दलों को भी स्पष्ट रुख अपनाने पर मजबूर होना पड़ता है। नतीजा यह होता है कि स्थानीय शासन, रोज़गार और विकास के बुनियादी सवाल हाशिए पर चले जाते हैं और अति-राष्ट्रवाद का विमर्श हावी हो जाता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 दिन पहले

गंभीर आपराधिक मामलों और यूएपीए जैसे सख्त कानूनों के तहत विचाराधीन मुकदमों पर राजनीतिक बयानबाजी अदालती प्रक्रिया और कानून-व्यवस्था के लिए चुनौतियां पैदा करती है। अदालत में सबूतों की समीक्षा और जमानत याचिकाओं पर न्यायिक फैसलों से इतर राजनीतिक मंचों से दी जाने वाली दलीलें जनमानस और सार्वजनिक सुरक्षा को प्रभावित करती हैं। कानूनी दृष्टिकोण से, न्यायपालिका केवल जांच एजेंसियों द्वारा पेश साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करती है। विचाराधीन मामलों पर बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण आने वाले दिनों में शैक्षणिक परिसरों में अशांति और कानून-व्यवस्था की स्थिति को और संवेदनशील बना सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·14 दिन पहले

कर्ण मल्होत्रा के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, बेंगलुरु जैसे वैश्विक टेक और शिक्षा केंद्र में विचाराधीन UAPA मामलों पर बढ़ती राजनीतिक बयानबाज़ी न केवल परिसरों की शांति को प्रभावित करती है, बल्कि क्षेत्र के संस्थागत ब्रांड और आर्थिक स्थिरता पर भी दीर्घकालिक असर डालती है। उप-न्यायाधीन मामलों का ऐसा तीखा राजनीतिक ध्रुवीकरण नीतिगत प्राथमिकताओं से ध्यान भटकाता है, जिससे सार्वजनिक शासन और निवेश माहौल पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगते हैं। कानूनी प्रक्रियाओं में राजनीतिक बयानों से बचा जाना चाहिए ताकि प्रशासनिक व आर्थिक स्थिरता कायम रहे।

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