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खेजड़ली में 363 अमर शहीदों को नमन, पारंपरिक आभूषणों से सजी महिलाओं ने दिया प्रकृति संरक्षण का संदेशराजस्थान
21 सित॰ 2026, 10:46 pm (4 दिन पहले)· 0

खेजड़ली में 363 अमर शहीदों को नमन, पारंपरिक आभूषणों से सजी महिलाओं ने दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश

जोधपुर के खेजड़ली गांव में 296 वर्ष पुराने ऐतिहासिक बलिदान की स्मृति में शहीदी मेले का आयोजन हुआ, जहां बिश्नोई समाज के हजारों श्रद्धालुओं ने आहुति देकर पर्यावरण रक्षा का संकल्प दोहराया।

राजस्थान में जोधपुर जिले के ऐतिहासिक खेजड़ली गांव में पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले 363 अमर शहीदों की स्मृति में भव्य शहीदी मेले का आयोजन किया गया। सोमवार को आयोजित इस पावन समागम में बिश्नोई समाज के हजारों लोग पहुंचे और पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल कायम करने वाली वीरांगना अमृता देवी तथा अन्य बलिदानियों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। आज से 296 वर्ष पूर्व खेजड़ी के पेड़ों को कुल्हाड़ियों से बचाने के लिए ग्रामीणों ने जो अद्वितीय त्याग किया था, उसी ऐतिहासिक घटना की याद में यह वार्षिक मेला श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित किया जाता है।

पारंपरिक वेशभूषा और स्वर्ण आभूषणों में नजर आईं महिलाएं

इस वर्ष खेजड़ली मेले में बिश्नोई समाज की महिलाओं की भागीदारी विशेष चर्चा का केंद्र रही। समाज की महिलाएं अपनी पारंपरिक वेशभूषा के साथ भारी-भरकम स्वर्ण आभूषण पहनकर समारोह में सम्मिलित हुईं। कई महिलाओं के गले में भारी तोले के हार, हाथों में पारंपरिक सोने के कंगन और कानों में कलात्मक झुमके सुशोभित थे। इनमें सामान्य गृहिणियों से लेकर विभिन्न व्यवसायों से जुड़ी महिलाएं भी शामिल थीं, जिन्होंने आभूषणों की चमक के बीच अपनी परंपरा का निर्वहन किया। कुछ महिलाओं के पहने गए आभूषणों का मूल्य लाखों रुपये से लेकर करीब एक करोड़ रुपये तक आंका गया। इन महिलाओं ने शहीद स्मारक पर शीश नवाकर खेजड़ी वृक्ष और संपूर्ण प्रकृति को सुरक्षित रखने का कड़ा संदेश दिया।

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हवन में नारियल की आहुतियां और कई राज्यों से श्रद्धालुओं का आगमन

शहीदी मेले में केवल जोधपुर ही नहीं, बल्कि राजस्थान के विभिन्न अंचलों जैसे फलोदी, नागौर, बीकानेर, सांचौर, जालोर और पाली जिलों से बड़ी तादाद में लोग पहुंचे। इसके अतिरिक्त राजस्थान की सीमाओं से परे हरियाणा, पंजाब तथा मध्य प्रदेश से भी श्रद्धालु खेजड़ली पहुंचे। सुबह से ही गांव में लोगों के आने का तांता लगा रहा। मेले के दौरान विधिवत धार्मिक अनुष्ठान और पवित्र हवन का आयोजन किया गया, जिसमें उपस्थित जनसमूह ने नारियल की आहुति देकर शहीदों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की। हवन समाप्ति के उपरांत सभी लोग कतारबद्ध होकर शहीद स्मारक पहुंचे और 363 बलिदानियों के चरणों में नमन किया।

296 वर्ष पूर्व वृक्ष रक्षा के लिए हुआ था ऐतिहासिक बलिदान

खेजड़ली में प्रकृति रक्षा का यह अध्याय 296 वर्ष पूर्व महाराजा अभय सिंह के शासनकाल में लिखा गया था। उस दौर में राजमहल के निर्माण कार्य के लिए लकड़ी की आवश्यकता पड़ी, जिसे पूरा करने के लिए सैनिकों का दल खेजड़ी के वृक्ष काटने खेजड़ली गांव पहुंचा था। जब सैनिकों ने कुल्हाड़ियों से हरे-भरे पेड़ों पर वार करना शुरू किया, तब गांव की अमृता देवी निर्भीकता से पेड़ों से लिपट गईं। मां के इस अद्वितीय कदम को देखकर उनकी तीन पुत्रियां आसू, रत्नी और भागू बाई भी पेड़ों से चिपक गईं। देखते ही देखते पूरा गांव इस अहिंसक आंदोलन में कूद पड़ा और एक-एक करके ग्रामीण वृक्षों से लिपटते चले गए। सैनिकों द्वारा की गई निर्मम कार्रवाई में कुल 363 लोगों ने अपने प्राण त्याग दिए, जिनमें 71 महिलाएं और 292 पुरुष शामिल थे।

प्रतिवर्ष भादवा सुदी दशमी को लगता है मेला

जब महाराजा अभय सिंह को 363 निर्दोष लोगों के इस अप्रतिम बलिदान का समाचार मिला, तो उन्होंने तुरंत पेड़ों की कटाई रुकवाने का फरमान जारी किया। इसके साथ ही बिश्नोई समाज को विधिवत लिखित आश्वासन दिया गया कि भविष्य में मारवाड़ क्षेत्र में कभी भी खेजड़ी के पेड़ों को नहीं काटा जाएगा। इसी ऐतिहासिक घटना और समाज के सर्वोच्च त्याग के सम्मान में प्रत्येक वर्ष भादवा की दशमी तिथि को खेजड़ली में यह शहीदी मेला आयोजित होता है। बिश्नोई समाज सदियों से वृक्षों के साथ वन्यजीवों के संरक्षण में जुटा रहा है, और खेजड़ली की यह शहादत आज भी संपूर्ण विश्व के लिए पर्यावरण रक्षा की सबसे प्रेरक गाथा मानी जाती है।

सवाल-जवाब

खेजड़ली शहीदी मेला कहां और कब आयोजित हुआ?
यह मेला राजस्थान के जोधपुर जिले के खेजड़ली गांव में सोमवार को भादवा की दशमी के अवसर पर आयोजित हुआ।
खेजड़ली में कितने लोगों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था?
आज से 296 वर्ष पूर्व खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए कुल 363 लोगों ने बलिदान दिया था, जिनमें 71 महिलाएं और 292 पुरुष शामिल थे।
पेड़ों की रक्षा के लिए सबसे पहले किसने विरोध किया था?
सबसे पहले गांव की अमृता देवी ने विरोध करते हुए पेड़ को गले लगाया, जिसके बाद उनकी तीन पुत्रियां आसू, रत्नी और भागू बाई भी पेड़ों से लिपट गईं।
इस वर्ष मेले में महिलाओं की क्या खास चर्चा रही?
मेले में बिश्नोई समाज की महिलाएं भारी पारंपरिक स्वर्ण आभूषण पहनकर पहुंचीं, जिनमें से कई के आभूषणों का मूल्य लाखों से एक करोड़ रुपये तक आंका गया।
मेले में किन-किन क्षेत्रों से लोग पहुंचे थे?
राजस्थान के फलोदी, नागौर, बीकानेर, सांचौर, जालोर और पाली के अलावा हरियाणा, पंजाब तथा मध्य प्रदेश से भी श्रद्धालु पहुंचे।
बलिदान के बाद तत्कालीन शासक ने क्या कदम उठाया था?
महाराजा अभय सिंह ने घटना की जानकारी मिलते ही पेड़ों की कटाई पर रोक लगाई और मारवाड़ में खेजड़ी न काटने का लिखित आश्वासन दिया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Tanvi Desai@tanvi-desai·4 दिन पहले

मेले में परंपरा और पर्यावरण की बात तो ठीक है, पर करोड़ों के गहने पहनकर आना थोड़ा अजीब सा लगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

अमृता देवी और उनके साथियों का यह बलिदान पर्यावरण संरक्षण की सबसे पुरानी और बड़ी मिसाल है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

अर्जुन जी, बलिदान तो बड़ा है, पर करोड़ों के गहने पहनकर पर्यावरण बचाने पहुँचना थोड़ा अजीब सामेल नहीं लगता?

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

मेले में करोड़ों के आभूषण पहनकर आना और प्रकृति बचाने का संदेश देना, दोनों बातें कुछ मेल नहीं खातीं।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

करण भाई, परंपरा निभाने और पर्यावरण बचाने का आपस में कोई विरोध नहीं है, गहने उनके अपने हैं तो पहन लिए.

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