लगातार रसायनों के छिड़काव से खेतों की उपजाऊ शक्ति घटने और इंसानी सेहत पर पड़ते दुष्प्रभावों को देखते हुए अब प्राकृतिक कृषि पद्धतियों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। फसलों में बार-बार लगने वाले हानिकारक कीड़ों जैसे दीमक, सुंडी, सफेद मक्खी और ग्रब से निपटने के लिए रसायनों के स्थान पर जैविक फंगस का प्रयोग एक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में उभर रहा है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बायो-फंगस आधारित समाधान मिट्टी के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़े बिना कीट प्रबंधन में बेहद कारगर साबित होते हैं।
हानिकारक कीड़ों पर जैविक फंगस का प्राकृतिक वार
प्रगतिशील किसान मनसुखलाल कुशवाहा का कहना है कि बवेरिया बेसियाना और मेटारिजियम एनिसोप्ली दो ऐसे प्रभावकारी मित्र फंगस हैं जो खेतों में मौजूद हानिकारक कीटों को प्राकृतिक रूप से नष्ट कर देते हैं। इस जैविक प्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को ही निशाना बनाती है। खेत में फसलों की रक्षा करने वाले मित्र कीटों और मिट्टी के सूक्ष्म जीवों पर इसका कोई बुरा असर नहीं पड़ता, जिससे जमीन की जैविक संरचना और प्राकृतिक गुणवत्ता पूरी तरह सुरक्षित रहती है।
80 किलोग्राम जैविक खाद का मिश्रण तैयार करने का तरीका
इस प्राकृतिक कीट नियंत्रक खाद को घर या खेत पर तैयार करने की विधि काफी सरल है। मनसुखलाल कुशवाहा के अनुसार, 75 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद में 3 किलोग्राम बवेरिया बेसियाना या मेटारिजियम एनिसोप्ली फंगस पाउडर को अच्छी तरह मिलाया जाता है। इस तैयार मिश्रण पर रोजाना हल्का पानी छिड़ककर उसमें नमी बनाए रखनी होती है। लगभग 8 से 10 दिनों की अवधि में फंगस गोबर खाद के भीतर पूरी तरह वृद्धि कर लेता है, जिससे करीब 80 किलोग्राम शक्तिशाली जैविक खाद तैयार हो जाती है।
इस तैयार जैविक खाद का छिड़काव खेत की अंतिम जुताई से पहले अथवा जुताई के दौरान पूरे खेत में एक समान रूप से किया जाना चाहिए। जब जुताई की जाती है, तो यह मिश्रण मिट्टी की गहराई तक समा जाता है। मिट्टी में मौजूद दीमक के अंडे, सुंडी के लार्वा, ग्रब और अन्य हानिकारक कीट इस जैविक फंगस के संपर्क में आकर निष्क्रिय हो जाते हैं। 80 किलोग्राम का यह एक पूरा मिश्रण एक हेक्टेयर जमीन के उपचार के लिए पर्याप्त माना जाता है।
लागत में कमी और मिट्टी की लंबी उर्वरता के फायदे
कृषि वैज्ञानिक डॉ. शैलेंद्र गौतम बताते हैं कि यदि किसान जैविक फंगस का नियमित और सही वैज्ञानिक विधि से प्रयोग करें तो फसलों को एक प्राकृतिक सुरक्षा चक्र प्राप्त होता है। इससे महंगे रासायनिक कीटनाशकों की निर्भरता खत्म होती है, जिससे खेती की कुल लागत में सीधी कमी आती है और किसानों का मुनाफा बढ़ता है। इसके अलावा, मिट्टी की उपजाऊ क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है और पर्यावरण या जल स्रोतों पर रासायनिक दवाओं का कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।
डॉ. शैलेंद्र गौतम की सलाह है कि इस प्रक्रिया में उपयोग की जाने वाली गोबर खाद का पूरी तरह सड़ा होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि कच्ची खाद में फंगस का विकास ठीक से नहीं हो पाता। साथ ही 8 से 10 दिनों तक मिश्रण में नमी का स्तर बनाए रखना अनिवार्य है। देश के विभिन्न कृषि क्षेत्रों में किसान तेजी से इस जैविक तरीके को अपनाकर रसायनों से मुक्ति पा रहे हैं और अपनी फसलों को सुरक्षित बना रहे हैं।



















