आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के बीच सालों से चल रहे कृष्णा नदी जल बंटवारे के पेचीदा विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक अहम सुनवाई हुई। इस दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की तरफ से आई एक स्पष्ट टिप्पणी ने पूरे मामले को केंद्र में ला दिया है। शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ में सुनवाई के दौरान सीजेआई ने इस बात का भरोसा दिया कि वह इस ऐतिहासिक जल विवाद का फैसला सुनाए बिना पद से हटने वाले नहीं हैं। अदालत का यह रुख दिखाता है कि न्यायपालिका अंतरराज्यीय जल विवादों के जल्द निपटारे के प्रति कितनी गंभीर है।
कृष्णा जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख
कृष्णा नदी के पानी के वितरण को लेकर बने इस विवाद की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन न्यायाधीशों वाली पीठ कर रही है। अदालत में सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा कि वह इस मामले का फैसला किए बिना एग्जिट डोर नहीं देखेंगे। इस टिप्पणी को कानूनी और प्रशासनिक हलकों में एक मजबूत संदेश माना जा रहा है, क्योंकि दक्षिण भारत के इन पड़ोसी राज्यों के बीच पानी के बंटवारे का मुद्दा दशकों से अटका पड़ा है।
केंद्र की 2023 की अधिसूचना और आंध्र प्रदेश की आपत्तियां
इस पूरे मामले की जड़ में केंद्र सरकार की वर्ष 2023 में जारी की गई वह अधिसूचना है, जिसमें कृष्णा नदी के पानी के बंटवारे से जुड़े नियम और शर्तें तय की गई थीं। आंध्र प्रदेश सरकार ने इस अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। राज्य का तर्क है कि केंद्र का यह कदम आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 की मूल भावना और उसके वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है।
आंध्र प्रदेश की ओर से दलील दी गई कि राज्य के विभाजन के बाद पानी का आवंटन पुनर्गठन कानून के तहत ही तय किया जाना चाहिए था। हालांकि, केंद्र ने 2023 की अधिसूचना लागू करके इस पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर दिया। इसके अलावा, राज्य का यह भी कहना है कि कृष्णा नदी के ऊपरी हिस्से में मौजूद राज्यों जैसे कर्नाटक और महाराष्ट्र का जल हिस्सा पहले ही अंतिम रूप से तय किया जा चुका है। ऐसे में वर्तमान व्यवस्था आंध्र प्रदेश के अधिकारों और किसानों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।
सितंबर में होगी अगली विस्तृत सुनवाई
मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अपनी व्यस्तताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि वह वर्तमान में सात न्यायाधीशों की एक वृहद संविधान पीठ के गठन और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं में व्यस्त हैं। इसके बावजूद, चूंकि कृष्णा जल विवाद का मामला तीन न्यायाधीशों की पीठ के पास लंबित है, इसलिए इसे जल्द से जल्द ऐसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा जो इस पर नियमित सुनवाई कर सके। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को निर्देश देते हुए इस मामले की अगली सुनवाई सितंबर के पहले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश जारी किया है।
तीन राज्यों के भविष्य पर पड़ेगा सीधा असर
कृष्णा नदी का जल विवाद केवल आंध्र प्रदेश और कर्नाटक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें महाराष्ट्र के हित भी सीधे तौर पर जुड़े हैं। नदी के ऊपरी और निचले तटवर्ती राज्यों के बीच पानी का न्यायसंगत बंटवारा कृषि, बिजली उत्पादन और बड़े पैमाने पर पेयजल आपूर्ति के लिए बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से आने वाला कोई भी अंतिम फैसला इन तीनों प्रमुख राज्यों में कृष्णा नदी के पानी के भविष्य के प्रबंधन का आधार तय करेगा।



















