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कुल्लू की सैंज घाटी में पार्वती प्रोजेक्ट की टनल से बहा मटमैला पानी, पालचरा में मकान और दुकानें मलबे में समाईंहिमाचल प्रदेश
21 सित॰ 2026, 1:08 pm (19 घंटे पहले)· 0

कुल्लू की सैंज घाटी में पार्वती प्रोजेक्ट की टनल से बहा मटमैला पानी, पालचरा में मकान और दुकानें मलबे में समाईं

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में एनएचपीसी पार्वती जल विद्युत परियोजना चरण-दो की टनल से भारी रिसाव के बाद पालचरा गांव में सैलाब आ गया, जिससे कई मकान, दुकानें और खेत मलबे से घिर गए।

हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र कुल्लू स्थित सैंज घाटी में जल विद्युत परियोजना की एक सुरंग से अचानक फूटे पानी ने भारी तबाही मचाई है। एनएचपीसी की पार्वती जल विद्युत परियोजना चरण-दो के एडिट-5 हिस्से से अत्यधिक मात्रा में पानी का रिसाव होने लगा। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के चलते ढलानों से होता हुआ भारी मटमैला पानी और मलबा नीचे बसे पालचरा गांव में घुस गया, जिससे स्थानीय निवासियों में चीख-पुकार मच गई और संपत्ति का भारी नुकसान हुआ।

पालचरा और थल्यारू में अफरा-तफरी, रात में घरों से भागे लोग

शनिवार की रात जब ग्रामीण सोने की तैयारी कर रहे थे, तभी अचानक मटमैले पानी का तेज सैलाब रिहायशी इलाके में दाखिल हो गया। ग्रामीणों के मुताबिक, करीब 11 बजे हालात इतने बिगड़ गए कि लोगों को अपनी जान बचाने के लिए तुरंत घरों से बाहर भागना पड़ा। गांव के लोगों ने आपसी तालमेल और एकजुटता दिखाते हुए प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया। कई परिवारों के अपने आशियाने उजड़ जाने के कारण उन्हें पूरी रात दूसरे ग्रामीणों के घरों में शरण लेनी पड़ी।

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मकानों, दुकानों और होमस्टे में घुसा मलबा, फसलों को नुकसान

टनल से हुए इस भारी जलभराव और मलबे के कारण गांव के बुनियादी ढांचे को गहरी चोट पहुंची है। प्राथमिक सूचना के अनुसार, दो मकान पूरी तरह मलबे में दब गए हैं, जबकि एक नया मकान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इसके अलावा दो दुकानों और दो अन्य रिहायशी मकानों को भी गंभीर क्षति पहुंची है। गांव के डावेराम, जयराम, गंगा राम, ठाकुर दास और लुदर चंद के घरों, दुकानों और होमस्टे में मलबा भर गया। खेती के खेतों में गाद भर जाने से खड़ी फसलों को भी बड़ा नुकसान पहुंचा है।

तीसरी बार टनल रिसाव की घटना, प्रशासन और परियोजना प्रमुख पहुंचे

घटना की सूचना मिलते ही उपमंडलाधिकारी नागरिक पंकज शर्मा और परियोजना प्रमुख रणजीत सिंह प्रशासनिक दल के साथ मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने प्रभावित ग्रामीणों से बातचीत कर जमीनी स्थिति का मुआयना किया और हरसंभव मदद उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाया। ग्रामीणों ने मांग रखी है कि प्रशासन जल्द से जल्द संपत्ति और फसलों के नुकसान का आधिकारिक आकलन करे और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम सुनिश्चित करे।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इस घटना पर कड़ा आक्रोश जताया है। जिला परिषद सदस्य विभा सिंह ने बताया कि रैला पंचायत में यह समस्या अत्यंत चिंताजनक रूप ले चुकी है और पिछले साल भी यहां इसी तरह का रिसाव हुआ था। वहीं रैला-2 के उपप्रधान मोती राम ने स्पष्ट किया कि पालचरा और थल्यारू गांव में यह तीसरी बार ऐसा हादसा हुआ है। उन्होंने एनएचपीसी प्रबंधन से प्रभावितों को त्वरित आर्थिक सहायता देने और टनल रिसाव की समस्या का एक स्थायी तकनीकी समाधान निकालने का आग्रह किया है।

सवाल-जवाब

सैंज घाटी में पानी का रिसाव किस परियोजना से हुआ?
यह रिसाव एनएचपीसी की पार्वती जल विद्युत परियोजना चरण-दो के एडिट-5 से हुआ।
इस घटना में कौन से गांव सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं?
इस सैलाब से कुल्लू जिले की सैंज घाटी के पालचरा और थल्यारू गांव सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
गांव में कितना बुनियादी नुकसान दर्ज किया गया है?
ग्रामीणों के अनुसार दो मकान मलबे में दब गए, एक नया मकान क्षतिग्रस्त हुआ और दो दुकानों व दो अन्य घरों को भारी नुकसान पहुंचा।
ग्रामीणों को किस समय अपने घरों से सुरक्षित निकलना पड़ा?
शनिवार रात करीब 11 बजे पानी घुसने के बाद ग्रामीणों ने आपसी मदद से प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया।
प्रशासन की ओर से मौके पर कौन से अधिकारी पहुंचे?
उपमंडलाधिकारी नागरिक पंकज शर्मा और परियोजना प्रमुख रणजीत सिंह ने मौके पर पहुंचकर प्रभावित लोगों से स्थिति का जायजा लिया।
क्या इस टनल से रिसाव की घटना पहले भी हो चुकी है?
हां, स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अनुसार पिछले साल भी यह समस्या हुई थी और यहां यह तीसरी बार रिसाव का मामला सामने आया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rohan Gupta@rohan-gupta·17 घंटे पहले

पार्वती प्रोजेक्ट की टनल से बार-बार पानी का रिसाव होना केवल एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि इको-सेंसिटिव हिमालयी क्षेत्र में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए एक गंभीर तकनीकी चेतावनी है। यह घटना दर्शाती है कि पर्वतीय इलाकों में निर्माण के दौरान भूवैज्ञानिक जोखिमों का आकलन करने और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन करने की कितनी आवश्यकता है। अगर एनएचपीसी प्रबंधन ने समय रहते इस तकनीकी खामी का स्थायी समाधान नहीं निकाला, तो यह बार-बार होने वाला संकट भविष्य में और भी बड़ी मानवीय और पर्यावरणीय आपदा का रूप ले सकता है, जिससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को अपूरणीय क्षति होगी बल्कि कॉरपोरेट जवाबदेही पर भी बड़े सवाल खड़े होंगे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·18 घंटे पहले

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में पार्वती जल विद्युत परियोजना की टनल से तीसरी बार हुआ रिसाव केवल एक स्थानीय हादसा नहीं, बल्कि पर्वतीय पारिस्थितिकी और विकास मॉडल के बीच गंभीर टकराव का प्रतीक है। यह बार-बार होने वाली दुर्घटना दर्शाती है कि परियोजना के तकनीकी डिजाइनों और सुरक्षा मानकों में बड़ी खामियां हैं। यदि समय रहते इसका स्थायी भू-तकनीकी समाधान और सख्त पर्यावरणीय ऑडिट नहीं किया गया, तो यह लापरवाही क्षेत्र में किसी बड़ी मानवीय और प्राकृतिक त्रासदी का कारण बन सकती है, जिसकी जवाबदेही प्रशासन और प्रबंधन को तय करनी होगी।

Ravikash Gupta@ravikash·18 घंटे पहले

यह घटना सिर्फ एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हिमालयी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के दौरान भू-तकनीकी जोखिमों की लगातार अनदेखी की जा रही है। बार-बार टनल से पानी और मलबा बहने से स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका, कृषि और संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंच रहा है, जो निवेशकों और कॉर्पोरेट जगत के लिए भी चिंता का विषय है कि क्या ऐसी परियोजनाओं में पर्यावरण और सुरक्षा मानकों का समुचित पालन हो रहा है या नहीं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·18 घंटे पहले

यह घटना महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि आपराधिक लापरवाही और बार-बार सुरक्षा मानकों के उल्लंघन का गंभीर मामला है। पालचरा गांव में तीसरी बार टनल से रिसाव होना यह साबित करता है कि परियोजना प्रबंधन ने पिछले हादसों से कोई सबक नहीं लिया। जनरेटर और निर्माण से जुड़े इस तरह के मामलों में यदि तकनीकी विफलता बार-बार जानमाल को जोखिम में डालती है, तो भारतीय दंड संहिता के तहत सार्वजनिक सुरक्षा खतरे में डालने और लापरवाही से चोट पहुँचाने के धाराओं के अंतर्गत आपराधिक जवाबदेही तय होनी चाहिए। प्रशासन को त्वरित राहत के साथ-साथ परियोजना प्रबंधन के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर गहन कानूनी जाँच बिठानी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसे हादसों को रोका जा सके।

Rohan Verma@rohan-verma·18 घंटे पहले

यह बार-बार होने वाली दुर्घटना साफ दिखाती है कि पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यावरण और बुनियादी ढांचे के बीच संतुलन की अनदेखी किस हद तक भारी पड़ सकती है। यदि ऐसी तकनीकी त्रुटियों पर तुरंत कड़े नियम और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो यह लापरवाही ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा संकट बन जाएगी, जिससे भविष्य में पुनर्वास और मुआवजे की मांग और अधिक जटिल हो जाएगी।

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