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लाहौल-स्पीति में ड्रिलबुरी कोरा यात्रा के दौरान बड़ा हादसा, बर्फ पर फिसलने से दो श्रद्धालुओं की मौतहिमाचल प्रदेश
18 सित॰ 2026, 11:48 am (4 दिन पहले)· 3

लाहौल-स्पीति में ड्रिलबुरी कोरा यात्रा के दौरान बड़ा हादसा, बर्फ पर फिसलने से दो श्रद्धालुओं की मौत

हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति जिले में ड्रिलबुरी कोरा पर्वत की परिक्रमा करते समय बर्फबारी के बीच रास्ता फिसलने से दो तीर्थयात्रियों की जान चली गई, जबकि 15 अन्य घायल हो गए।

हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति जिले में एक धार्मिक यात्रा के दौरान बड़ा हादसा सामने आया है। यहां पवित्र ड्रिलबुरी कोरा पर्वत की परिक्रमा के समय बर्फीले रास्ते पर पैर फिसलने से दो श्रद्धालुओं की मौत हो गई। इस दुर्घटना में 15 अन्य लोग भी घायल हुए हैं जिन्हें मामूली चोटें आई हैं। लाहौल-स्पीति आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने इस दुखद घटना की जानकारी साझा की है। अचानक हुए इस हादसे के बाद पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई है और जिला प्रशासन ने तुरंत राहत कार्य शुरू किए।

हादसे का शिकार हुए श्रद्धालुओं की पहचान

प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, इस दुर्घटना में जान गंवाने वालों की पहचान पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग की रहने वाली 74 वर्षीय दावा डोमा भूटिया और लाहौल-स्पीति के केलांग की निवासी 64 वर्षीय यांगजिन के रूप में हुई है। यांगजिन के पिता का नाम कुनू राम है। जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए प्रत्येक मृतक के परिजनों को 25,000 रुपये की तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान की है। अधिकारियों ने बताया कि यह घटना सुबह करीब साढ़े चार बजे हुई जब अचानक मौसम बदला और ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्र में तेज बर्फबारी शुरू हो गई, जिससे पूरा मार्ग अत्यधिक फिसलन भरा हो गया। इसी खतरनाक और बर्फ से ढके रास्ते पर संतुलन बिगड़ने से दोनों महिला तीर्थयात्री नीचे गिर गईं और उनकी मौत हो गई।

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बचाव अभियान और अस्पताल में उपचार

घटना की सूचना मिलते ही जिला प्रशासन और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल की एक संयुक्त टीम ने तुरंत मौके पर पहुंचकर मोर्चा संभाला। राहत दलों ने घटनास्थल से दोनों शवों को सुरक्षित बाहर निकाला और सभी घायलों को तुरंत रेस्क्यू कर केलांग के एक स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया। अधिकारियों ने बताया कि घायल हुए 15 लोगों का इसी अस्पताल में इलाज चल रहा है, जबकि दोनों मृतकों के शवों का पोस्टमार्टम भी यहीं किया जा रहा है।

पुलिस और स्थानीय नेताओं के बयान

पुलिस अधीक्षक शिवानी मेहला ने जानकारी दी कि इस वर्ष पवित्र ड्रिलबुरी कोरा यात्रा में कुल मिलाकर लगभग 300 लोगों ने हिस्सा लिया था, जिसमें से इस दुर्भाग्यपूर्ण हादसे में दो लोगों की जान चली गई। लाहौल-स्पीति के पूर्व मंत्री राम लाल मारकंडे ने घटना पर दुख जताते हुए बताया कि पवित्र ड्रिलबुरी पर्वत की परिक्रमा पर निकली दो महिला श्रद्धालुओं की मौत की दुखद सूचना मिली है। माना जा रहा है कि अत्यधिक ठंड और ऊंचाई से नीचे गिरने के कारण इन श्रद्धालुओं की मृत्यु हुई है, क्योंकि बर्फबारी के बाद तापमान में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। इस तरह की गंभीर स्थितियों को हाइपोथर्मिया कहा जाता है, जिसमें शरीर की आंतरिक गर्मी बहुत तेजी से खत्म होने लगती है और व्यक्ति को बेहद तीव्र ठंड महसूस होती है।

ड्रिलबुरी पर्वत का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व

लाहौल घाटी के तांदी में चंद्रभागा संगम स्थल के ठीक ऊपर स्थित ड्रिलबुरी पर्वत को आचार्य मतिसार गुरु घंटापा का प्रमुख पीठ स्थान माना जाता है। इतिहास के अनुसार, नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य मतिसार सातवीं शताब्दी में लाहौल घाटी आए थे और उन्होंने ड्रिलबुरी पर्वत की गुफाओं में कठिन तपस्या और साधना की थी। इसके अलावा, ड्रिलबुरी पर्वत को करगयुद्पा संप्रदाय के इष्ट देव चक्रसंवर का भी पवित्र पीठ स्थान माना गया है। इस स्थान के गहरे धार्मिक महत्व को देखते हुए दलाई लामा, गलदान त्रिपा, गेलौंग ड्रकपा और तकसंग रिम्बोचे जैसी महान हस्तियां भी यहां की यात्रा कर चुकी हैं। इसी गहरी आस्था के कारण हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पहाड़ की परिक्रमा के लिए आते हैं।

यात्रा का कठिन मार्ग और उसकी मान्यता

यह पवित्र पर्वत करीब नौ किलोमीटर की सीधी चढ़ाई तय करने के बाद लगभग 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। बौद्ध धर्म की मान्यताओं के अनुसार, ड्रिलबुरी पीक की मात्र एक परिक्रमा करना पवित्र कैलाश पर्वत की 13 परिक्रमाएं पूरी करने के बराबर पुण्य फल देता है। अत्यधिक ऊंचाई, कठिन रास्ते और बदलते मौसम के बावजूद श्रद्धालु अपनी अटूट आस्था के साथ इस कठिन यात्रा को पूरा करने पहुंचते हैं, हालांकि अचानक होने वाली बर्फबारी इस मार्ग को बेहद खतरनाक बना देती है।

सवाल-जवाब

ड्रिलबुरी कोरा यात्रा कहां आयोजित की जाती है?
यह यात्रा हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति जिले में स्थित पवित्र ड्रिलबुरी पर्वत पर की जाती है।
इस हादसे में कितने लोगों की जान गई?
बर्फ पर फिसलने से हुई इस दुर्घटना में दो महिला तीर्थयात्रियों की मौत हो गई।
मृतक श्रद्धालुओं की पहचान क्या है?
मृतकों की पहचान दार्जिलिंग की दावा डोमा भूटिया और केलांग की यांगजिन के रूप में हुई है।
ड्रिलबुरी पर्वत कितनी ऊंचाई पर स्थित है?
यह पवित्र पर्वत करीब नौ किलोमीटर की सीधी चढ़ाई के बाद लगभग 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है।
बौद्ध धर्म में इस पर्वत की परिक्रमा का क्या महत्व है?
बौद्ध धर्म के अनुसार ड्रिलबुरी पीक की एक परिक्रमा कैलाश पर्वत की 13 परिक्रमाओं के बराबर मानी जाती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·3 दिन पहले

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ड्रिलबुरी जैसी पवित्र परिक्रमाओं की परंपरा प्राचीन काल से ऋतुचक्र और खगोलीय गणनाओं से जुड़ी रही है। किंतु वर्तमान समय में मौसम के तीव्र और अप्रत्याशित बदलावों को देखते हुए केवल पारंपरिक विश्वास के भरोसे यात्रा संचालन जोखिम भरा है। धार्मिक यात्राओं के पारंपरिक समय निर्धारण के साथ-साथ मौसम पूर्वानुमान तकनीक और मार्ग सुरक्षा प्रबंधन का वैज्ञानिक समन्वय अत्यंत आवश्यक हो गया है, ताकि श्रद्धालुओं की आस्था के साथ उनके जीवन की रक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।

Ravikash Gupta@ravikash·3 दिन पहले

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में धार्मिक पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान का बड़ा आधार है, लेकिन अचानक बदलते मौसम और दुर्गम रास्तों के कारण ऐसी यात्राओं में जोखिम लगातार बढ़ रहा है। लाहौल-स्पीति में तड़के हुई इस घटना से स्पष्ट है कि आपातकालीन राहत के साथ-साथ अब अग्रिम मौसम चेतावनी प्रणाली, सीमित प्रवेश नियंत्रण और प्राथमिक चिकित्सा बैकअप जैसी प्रशासनिक व्यवस्थाओं को और मजबूत करना अनिवार्य हो गया है। धार्मिक यात्राओं को सुरक्षित बनाना न केवल श्रद्धालुओं की जान बचाने के लिए बल्कि क्षेत्रीय पर्यटन अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·3 दिन पहले

रविकश के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर सुधार की तत्काल आवश्यकता है। उच्च हिमालयी तीर्थ यात्राओं में केवल दुर्घटना के बाद दी जाने वाली राहत राशि या बचाव कार्य पर्याप्त नहीं हैं। राज्य सरकार को एक सुदृढ़ लोक नीति और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करनी चाहिए। इसमें यात्रियों का अनिवार्य पंजीकरण, रियल-टाइम मौसम चेतावनियों का एकीकरण और संवेदनशील मार्गों पर प्रशिक्षित आपदा प्रबंधन दलों की अग्रिम तैनाती शामिल होनी चाहिए। धार्मिक पर्यटन और आपदा तंत्र के बीच बेहतर समन्वय ही ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति को रोक सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·3 दिन पहले

हिमालयी और दुर्गम क्षेत्रों में होने वाली धार्मिक यात्राओं में श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए केवल त्वरित राहत कार्य काफी नहीं हैं। शासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को ऐसी उच्च पर्वतीय परिक्रमाओं के लिए मौसम आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली और सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करनी चाहिए। अचानक मौसम बिगड़ने पर यात्रा रोकने या नियंत्रित करने के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए। साथ ही, प्राथमिक चिकित्सा और हाइपोथर्मिया से बचाव के इंतजाम रास्ते में होना जरूरी हैं, ताकि प्रशासनिक चौकसी से ऐसे हादसों को समय रहते रोका जा सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 दिन पहले

रोहन की बात से सहमत होते हुए, सार्वजनिक सुरक्षा और कानूनी जवाबदेही के नजरिए से यह हादसा प्रशासनिक निगरानी की बड़ी कमी को उजागर करता है। जब सैकड़ों श्रद्धालु इतने दुर्गम मार्ग पर परिक्रमा के लिए निकलते हैं, तो केवल अनुग्रह राशि देना काफी नहीं है। पुलिस और स्थानीय प्रशासन को बिना मौसम समीक्षा, अनिवार्य रजिस्ट्रेशन और सुरक्षा जांच के यात्रा की अनुमति देने पर जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। ऐसे उच्च जोखिम वाले आयोजनों में सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने और प्रशासनिक लापरवाही पर विधिक दायित्व तय होना जरूरी है, ताकि भविष्य में सार्वजनिक सुरक्षा से खिलवाड़ न हो।

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