उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में बाढ़ का पानी कम होते ही शारदा नदी ने तबाही का नया दौर शुरू कर दिया है। नदी के जलस्तर में गिरावट आने के साथ ही तटवर्ती क्षेत्रों में भूमि कटान की रफ्तार काफी तेज हो चुकी है। पानी का बहाव किनारों की उपजाऊ मिट्टी को बड़ी तेजी से काटकर अपने साथ बहा ले जा रहा है। इसके कारण खेतों में खड़ी लहलहाती फसलें पलक झपकते ही नदी के आगोश में समाती जा रही हैं। बाढ़ और जलभराव के संकट से जूझने के बाद अब किसान कटान की दोहरी मार झेलने को मजबूर हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में अफरा-तफरी और बेबसी का माहौल बना हुआ है।
बिजुआ ब्लॉक के पकरिया सल्लिहा में तबाही का मंजर
कटान की सबसे भीषण स्थिति बिजुआ ब्लॉक क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पकरिया सल्लिहा गांव में देखी जा रही है। यहां शारदा नदी का तेज बहाव किनारे के खेतों को लगातार निगल रहा है। किसान हर साल अपनी मेहनत और पूंजी लगाकर जिन फसलों को सींचते हैं, वे फसलें पककर तैयार होने से पहले ही पानी की धारा में विलीन हो रही हैं। खेतों के किनारे की मिट्टी बड़े-बड़े टुकड़ों में टूटकर नदी में गिर रही है। गांव के किसान किनारे खड़े होकर अपनी जमीन और फसल को नदी में समाते हुए देखने को विवश हैं, लेकिन बहाव की विभीषिका के आगे कोई भी उपाय काम नहीं आ रहा है। हर वर्ष की तरह इस बार भी नदी का यह रूप किसानों के सुनहरे भविष्य के सपनों को पूरी तरह तहस-नहस कर रहा है।
बेटी के पीले हाथ करने की उम्मीदों पर फिरा पानी
इस आपदा की मार पकरिया सल्लिहा गांव के किसान राम बहादुर पर बेहद भारी पड़ी है। राम बहादुर ने अपनी तीन एकड़ कृषि भूमि पर धान की रोपाई की थी। इस फसल को तैयार करने के लिए उन्होंने पहले पुराना गेहूं बेचा और बचा हुआ खर्च पूरा करने के लिए कर्ज भी लिया। शुरुआती दौर में फसल की पैदावार काफी बेहतरीन नजर आ रही थी, जिससे राम बहादुर का हौसला बढ़ा हुआ था। इसी अच्छी फसल की उम्मीद के सहारे उन्होंने अपनी बेटियों का विवाह तय कर दिया था। उनका सोचना था कि धान की कटाई और बिक्री के बाद मिलने वाले पैसों से वे अपनी बेटियों की शादी का सारा इंतजाम धूमधाम से पूरा कर लेंगे।
किसानों के सामने खड़ा हुआ आजीविका का बड़ा संकट
हालांकि, शारदा नदी के उफान और कटान ने राम बहादुर के इन सभी अरमानों को एक झटके में चकनाचूर कर दिया। देखते ही देखते उनकी पूरी तीन एकड़ की धान की फसल नदी की विनाशकारी धारा में समा गई। खेत की उपजाऊ जमीन बह जाने और फसल का नामोनिशान मिट जाने से राम बहादुर के सामने न केवल बेटियों की शादी टलने का संकट पैदा हो गया है, बल्कि कर्ज चुकाने और परिवार का पेट पालने की गंभीर चुनौती भी आ खड़ी हुई है। पूरे बिजुआ ब्लॉक में ऐसे कई किसान हैं जो अपनी आंखों के सामने खेतों को नदी में तब्दील होते देखकर पूरी तरह टूट चुके हैं और मदद की आस लगाए बैठे हैं।



















