आधुनिकता की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां ग्रामीण इलाकों की प्राचीन संस्कृतियां धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, वहीं जोधपुर के पास स्थित लूणावास खारा गांव में आज भी सदियों पुरानी लोक परंपराएं पूरी आस्था और उत्साह के साथ जीवित हैं। इस पावन पर्व रक्षाबंधन के अवसर पर स्थानीय गवाली तालाब पर एक बेहद अनूठा और मनमोहक दृश्य देखने को मिला, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं पारंपरिक राजस्थानी परिधानों में सज-धजकर पहुंचीं। भाई और बहन के बीच के पवित्र प्रेम के प्रतीक इस पर्व पर समंद हिलोरने की पारंपरिक रस्म को देखने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा था। महिलाओं के सिर पर सजे मंगल कलश, चेहरे पर साफ झलकती खुशी और उनके होठों से निकलते पारंपरिक मंगल गीत पूरे वातावरण को पूरी तरह से राजस्थानी संस्कृति के रंग में रंग रहे थे।
ढोल-नगाड़ों के बीच गवाली तालाब पर उमड़ी भीड़
पारंपरिक ढोल और थाली की मनमोहक धुनों के बीच जब महिलाओं की टोलियां नाचते-गाते हुए गवाली तालाब की तरफ आगे बढ़ रही थीं, तो वहां मौजूद हर एक व्यक्ति का ध्यान इस भव्य आयोजन की तरफ आकर्षित हो रहा था। गवाली तालाब के परिसर में पहुंचने के बाद महिलाओं ने पूरी श्रद्धा के साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए तालाब की कुल चार परिक्रमाएं पूरी कीं। इसके बाद बहनों ने अपने भाइयों के साथ मिलकर प्राचीन समंद हिलोरने की रस्म को आगे बढ़ाया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान भाई ने अपनी बहन को तालाब का पवित्र जल पिलाया और ठीक इसी तरह बहन ने भी अपने भाई को जल पिलाकर दोनों के आपसी रिश्ते की मजबूती, दीर्घायु और अटूट प्रेम की ईश्वर से कामना की।
चुनरी ओढ़ाकर भाइयों ने दिया आशीर्वाद
इस अनूठी परंपरा की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर भाइयों ने अपनी बहनों को पारंपरिक चुनरी ओढ़ाई और उनके सुखद भविष्य की कामना करते हुए आशीर्वाद प्रदान किया। एक जैसी पारंपरिक वेशभूषा में सैकड़ों महिलाओं की उपस्थिति और उनके सिर पर सजे सुंदर मंगल कलश ने इस पूरे आयोजन के माहौल को अत्यधिक खास बना दिया था। जब महिलाएं पारंपरिक लोक गीत गाते हुए इस सदियों पुरानी रस्म को निभा रही थीं, तो ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो राजस्थान की प्राचीन लोक संस्कृति अपनी पूरी भव्यता के साथ एक बार फिर से जीवंत हो उठी हो। इस अद्भुत और दुर्लभ आयोजन को अपनी आंखों से देखने के लिए पूरा लूणावास खारा गांव गवाली तालाब के तट पर इकट्ठा हो गया था। छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर आयु वर्ग के लोग भाई-बहन के इस पवित्र और अटूट रिश्ते के साक्षी बने। गांव की भोर के राही टीम के सदस्यों की ओर से इस पूरे आयोजन को सफल बनाने के लिए विशेष और चाक-चौबंद व्यवस्थाएं की गई थीं।
आटे से बनी मात और गुगरी का हुआ प्रसाद वितरण
इस भव्य कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सभी महिलाओं और ग्रामीणों का उत्साह देखते ही बन रहा था। पारंपरिक रीति-रिवाजों के इस क्रम में आटे से विशेष रूप से तैयार की गई मात और गुगरी को प्रसाद के रूप में वहां मौजूद लोगों के बीच वितरित किया गया, जिसे सभी श्रद्धालुओं ने पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ ग्रहण किया। आज के इस आधुनिक और तकनीकी दौर में लूणावास खारा के गवाली तालाब पर दिखाई दी यह तस्वीर एक मजबूत और स्पष्ट संदेश देती नजर आती है कि समय भले ही कितनी तेजी से बदल जाए, लेकिन गांवों की मिट्टी से गहराई से जुड़ी संस्कृति और भाई-बहन के प्रेम की ये अमूल्य परंपराएं आज भी लोगों के दिलों में उसी जीवंतता के साथ जिंदा हैं।





















