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लॉ के छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार BCI के पास नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने तय की कानूनी सीमाभारत
3 सित॰ 2026, 2:59 pm (28 दिन पहले)· 0

लॉ के छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार BCI के पास नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने तय की कानूनी सीमा

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया का अधिकार क्षेत्र केवल वकीलों के एनरोलमेंट के बाद शुरू होता है, इसलिए लॉ स्टूडेंट्स पर कार्रवाई का अधिकार सिर्फ यूनिवर्सिटी का है।

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के लॉ कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे छात्रों के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) या किसी भी स्टेट बार काउंसिल के पास कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत के अनुसार, किसी छात्र के खिलाफ अनुशासन से जुड़ा कोई भी फैसला लेने की शक्ति केवल उस संस्थान या यूनिवर्सिटी के पास होती है जहाँ छात्र पढ़ाई कर रहा है।

कानूनी सीमा और BCI के अधिकार क्षेत्र पर अदालत का रुख

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए व्यवस्था दी। पीठ ने कहा कि बार काउंसिल का विनियामक और अनुशासनात्मक अधिकार केवल तब लागू होता है जब कोई छात्र अपनी लॉ की डिग्री पूरी करके औपचारिक रूप से वकील के रूप में पंजीकृत (एनरोल) हो जाता है। जब तक कोई व्यक्ति विद्यार्थी के रूप में अध्ययनरत है, तब तक उस पर केवल संबंधित संस्थान के नियम और कानून ही लागू होंगे। संस्थान के सक्षम प्राधिकारी ही किसी भी प्रकार की जांच या अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए अधिकृत हैं।

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नालसार यूनिवर्सिटी मामले से जुड़ा है पूरा विवाद

यह पूरा मामला हैदराबाद स्थित नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के विद्यार्थियों से जुड़ा हुआ है। 13 अगस्त को BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने एक निर्देश जारी किया था। इस निर्देश में वर्ष 2026 में ग्रेजुएट होने वाले नालसार के पूरे बैच के बार एनरोलमेंट पर रोक लगाने की बात कही गई थी। इसके साथ ही, CJI के दीक्षांत समारोह कार्यक्रम को लेकर छात्रों द्वारा चलाए गए अभियान के सिलसिले में विद्यार्थियों और फैकल्टी के खिलाफ जांच शुरू करने का आदेश दिया गया था। हालांकि, इस फैसले का व्यापक विरोध होने पर BCI चेयरमैन ने महज एक घंटे के भीतर अपने आदेश को वापस ले लिया था। सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि BCI द्वारा जारी किया गया ऐसा कोई भी निर्देश कानून के दायरे से बाहर और अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन था।

सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम सुरक्षा अब हुई स्थायी

इससे पहले 14 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने BCI चेयरमैन की इस तरह की एकतरफा कार्रवाई पर सख्त नाराजगी जताई थी। उस समय अदालत ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए नालसार यूनिवर्सिटी के छात्रों और शिक्षकों को BCI या किसी भी राज्य की बार काउंसिल द्वारा की जाने वाली दंडात्मक कार्रवाई से तात्कालिक सुरक्षा प्रदान की थी। गुरुवार को मामले का अंतिम निपटारा करते हुए पीठ ने उस अंतरिम सुरक्षा आदेश को स्थायी रूप दे दिया और याचिका को पूरी तरह से निस्तारित कर दिया।

कैंपस में अभिव्यक्ति की आजादी और जवाबदेही की मांग

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर ने कोर्ट के समक्ष महत्वपूर्ण बिंदु रखे। उन्होंने तर्क दिया कि यद्यपि BCI ने अपना विवादित आदेश वापस ले लिया है, लेकिन यह पड़ताल करना बेहद आवश्यक है कि ऐसा निर्देश किस प्रावधान के तहत और किसके इशारे पर जारी किया गया था। उन्होंने कहा कि यह केवल एक छात्र या एक बैच का विषय नहीं है, बल्कि यूनिवर्सिटी परिसरों में विचार व्यक्त करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल प्रश्न है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने मांग की कि एक वैधानिक संस्था होने के नाते BCI को अपनी जवाबदेही स्पष्ट करनी चाहिए कि किस आधार पर पूरे बैच के भविष्य को संकट में डालने वाला निर्णय लिया गया था। जवाब में BCI चेयरमैन ने अदालत को सूचित किया कि आदेश तुरंत वापस ले लिए गए थे और बार काउंसिल की आधिकारिक बैठक में इस अध्याय को समाप्त घोषित कर दिया गया है।

सवाल-जवाब

क्या BCI लॉ कॉलेज के छात्रों पर दंडात्मक कार्रवाई कर सकती है?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि BCI के पास लॉ छात्रों पर अनुशासनात्मक या दंडात्मक कार्रवाई करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
लॉ छात्रों के अनुशासन का अधिकार किसके पास है?
छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार केवल उस यूनिवर्सिटी या लॉ कॉलेज के पास है जहाँ छात्र नामांकित हैं।
BCI का अधिकार क्षेत्र कब से शुरू होता है?
BCI का विनियामक अधिकार केवल तब शुरू होता है जब कोई ग्रेजुएट वकील के रूप में बार काउंसिल में अपना एनरोलमेंट करा लेता है।
यह मामला किस यूनिवर्सिटी से जुड़ा हुआ था?
यह विवाद हैदराबाद की नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के वर्ष 2026 में ग्रेजुएट होने वाले छात्रों से जुड़ा था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·27 दिन पहले

यह फैसला बार काउंसिल और शैक्षणिक संस्थानों के बीच अधिकारों की स्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींचता है। नालसार विवाद ने दिखा दिया कि नियामक निकायों द्वारा वैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किस तरह परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अकादमिक स्वायत्तता पर सीधा संकट पैदा कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस स्थायी हस्तक्षेप से भविष्य में विश्वविद्यालयों के आंतरिक मामलों में बाहरी संस्थागत दबाव और मनमाने प्रशासनिक आदेशों पर प्रभावी रोक लगेगी।

Laxmi Gupta@laxmi-gupta·27 दिन पहले

अंक ज्योतिषीय और समग्र ऊर्जा के दृष्टिकोण से, यह समय उच्च शिक्षा परिसरों में ऊर्जा के संतुलन और सही अनुशासन का है। जब बाहरी संस्थाएं अपने दायरे से बाहर जाकर नियंत्रण थोपने का प्रयास करती हैं, तो संस्थागत ऊर्जा में अवरोध पैदा होता है। इस ऐतिहासिक फैसले से विश्वविद्यालयों की आंतरिक ऊर्जा और अकादमिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी, जिससे छात्रों और शिक्षकों का मानसिक संतुलन बेहतर होगा और वे बिना किसी बाहरी भय के अपने बौद्धिक विकास पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·27 दिन पहले

यह फैसला बार काउंसिल और शैक्षणिक संस्थानों के बीच अधिकार क्षेत्र की स्पष्ट रेखा खींचता है। नालसार विवाद ने यह साबित कर दिया है कि वैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर की गई एकतरफा कार्रवाई न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं सकती। भविष्य में यदि नियामक संस्थाएं छात्रों के प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप करती हैं, तो अदालत का यह रुख सख्त मिसाल बनेगा और परिसरों में अकादमिक स्वायत्तता की रक्षा करेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·27 दिन पहले

यह फैसला केवल कानूनी शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रशासनिक और कॉर्पोरेट स्तर पर बढ़ती मनमानी पर भी एक बड़ा प्रहार है। जब कोई वैधानिक संस्था अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर इस तरह के कठोर निर्णय लेती है, तो इसका सीधा असर भविष्य के कानूनी पेशेवरों के आत्मविश्वास और उनके करियर पर पड़ता है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि नियम-कायदों से परे जाकर कोई भी संस्था अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं कर सकती।

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