मध्य प्रदेश के शिवपुरी क्षेत्र में रेल परिवहन की शुरुआत का इतिहास रियासती काल की भव्यता से गहराई से जुड़ा हुआ है। देश में 16 अप्रैल 1853 को मुंबई से ठाणे के मध्य पहली रेलगाड़ी चलाए जाने के कुछ ही दशकों बाद, ग्वालियर राज्य में भी पटरियों का जाल बिछाने की योजना तैयार की गई। ग्वालियर रियासत के तत्कालीन शासक महाराज माधवराव सिंधिया प्रथम, जिनका शासनकाल वर्ष 1886 से 1925 तक रहा, उन्होंने ग्वालियर से शिवपुरी तक 2-फीट नैरोगेज (जिन्हें स्थानीय भाषा में नेहरूजा कहा जाता था) रेल पटरी का निर्माण कार्य शुरू कराया था।
शाही आवश्यकता और ग्रीष्मकालीन राजधानी का संपर्क
इस ऐतिहासिक रेल मार्ग के निर्माण का प्राथमिक उद्देश्य सिंधिया राजवंश की प्रशासनिक जरूरतों और शाही आवागमन को आसान बनाना था। उस जमाने में शिवपुरी को ग्वालियर रियासत की आधिकारिक ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा प्राप्त था। कड़कड़ाती गर्मी के मौसम में महाराज, सिंधिया राजपरिवार के सदस्य और उनके आमंत्रित विशिष्ट अतिथि ग्वालियर से सीधे शिवपुरी स्थित माधव विलास पैलेस और ऐतिहासिक सिंधिया छतरियों के भ्रमण पर जाया करते थे। इस लंबी यात्रा को सुविधाजनक और आरामदायक बनाने के लिए ही वर्ष 1895 से 1899 के दौरान यह विशेष रेल पटरी बिछाई गई थी। वर्ष 1899 में जब पहली बार कोयले से चलने वाली छुक-छुक ट्रेन शिवपुरी पहुंची, तब शुरुआती दौर में इसका उपयोग केवल शाही परिवार और राजसी मेहमानों के आवागमन के लिए ही सीमित रखा गया था।
125 किलोमीटर की दूरी और 7 से 8 घंटे का सुहाना सफर
भाप और कोयले के इंजन से संचालित होने वाली यह पुरानी नैरोगेज ट्रेन ग्वालियर और शिवपुरी के बीच लगभग 125 किलोमीटर की दूरी तय करती थी। इस पूरी रेलगाड़ी में केवल 7 से 8 छोटे डिब्बे जुड़े होते थे। धीमी गति से चलने के कारण इस ट्रेन को अपनी यात्रा पूरी करने में लगभग 7 से 8 घंटे का समय लगता था। घने जंगलों, ऊंची-नीची पहाड़ियों और सुंदर वादियों के बीच से गुजरने वाला यह सफर बेहद सुकून देने वाला होता था। यात्री प्राकृतिक नजारों का आनंद लेते हुए अपनी मंजिल तक पहुंचते थे, जिससे यह धीमा सफर थकाऊ होने के बजाय मनोरंजन और आनंद से भरा महसूस होता था।
व्यापारियों और आम नागरिकों की बनी लाइफलाइन
जैसे-जैसे समय बीतता गया, इस शाही ट्रेन के द्वार आम जनता और स्थानीय व्यापारियों के लिए भी खोल दिए गए। शिवपुरी के मुख्य बाजार के बुजुर्ग नागरिक आज भी अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं जब उन्होंने पहली बार इस छुक-छुक ट्रेन में सफर किया था। उस दौर में क्षेत्र की आबादी काफी सीमित थी, इसलिए केवल प्रतिष्ठित नागरिक और व्यापारी वर्ग ही व्यावसायिक कार्यों से ग्वालियर का रुख करते थे। शिवपुरी के व्यापारियों के लिए माल, सामान और कच्चा माल लाने-ले जाने का यह सबसे सुलभ और बड़ा साधन बन गई थी, जिससे यह रेल लाइन पूरे शिवपुरी शहर की जीवनरेखा यानी लाइफलाइन बनकर उभरी।
आधुनिक ब्रॉडगेज लाइन का आगमन और पुरानी यादें
देश में रेलवे के आधुनिकीकरण और ब्रॉडगेज रेल लाइनों के व्यापक विस्तार के कारण लगभग 35 से 40 वर्ष पूर्व, यानी 1980 से 1990 के दशक में, इस ऐतिहासिक कोयला ट्रेन के पहिए हमेशा के लिए थम गए। वर्तमान समय में शिवपुरी से होकर आधुनिक, तीव्र गति वाली ट्रेनें गुजरती हैं, लेकिन स्थानीय बुजुर्गों और इतिहास प्रेमियों के मन में उस पुरानी छुक-छुक ट्रेन की मीठी यादें आज भी तरोताजा हैं। ग्वालियर रियासत की यह धरोहर भारत के समृद्ध रेल इतिहास का एक अविस्मरणीय अध्याय बनी हुई है।



















