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महाराष्ट्र में गंभीर सूखे के बीच नेताओं के शाही ठाठ-बाट पर बरसी शिवसेना-यूबीटी, तत्काल राहत की मांगमहाराष्ट्र
21 सित॰ 2026, 10:05 am (36 दिन पहले)· 5

महाराष्ट्र में गंभीर सूखे के बीच नेताओं के शाही ठाठ-बाट पर बरसी शिवसेना-यूबीटी, तत्काल राहत की मांग

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना-यूबीटी ने सूखा प्रभावित मराठवाड़ा और विदर्भ के किसानों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए प्रशासनिक बैठकों में काजू-बादाम परोसने को लेकर सरकार पर कड़ा प्रहार किया है।

महाराष्ट्र के विभिन्न ग्रामीण अंचलों में मानसून की विदाई के साथ ही सूखे और अकाल का गंभीर संकट गहराने लगा है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी शिवसेना-यूबीटी ने किसानों की दुर्दशा को लेकर राज्य प्रशासन पर तीखा हमला बोला है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र और विदर्भ का काश्तकार पानी और चारे की भारी किल्लत से जूझ रहा है, जबकि शासन से जुड़े जनप्रतिनिधि और अधिकारी संवेदनशील बैठकों में शाही ऐशो-आराम का लुत्फ उठा रहे हैं। राज्य की आधी से अधिक आबादी के अकाल की छाया में होने की बात कहते हुए विपक्षी दल ने चेतावनी दी है कि यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए तो प्रदेश में भुखमरी, भय और प्यास जैसी बेहद गंभीर स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।

नांदेड़ की बैठक और सूखे मेवे पर छिड़ा सियासी विवाद

विपक्षी दल ने हाल ही में नांदेड़ के विश्राम गृह में संपन्न हुई एक प्रशासनिक बैठक का उल्लेख किया, जहां राज्य के कृषि मंत्री दत्तामामा भरणे मराठवाड़ा क्षेत्र में अकाल की परिस्थितियों का मुआयना करने पहुंचे थे। आरोप लगाया गया कि जमीनी हकीकत का जायजा लेने से पहले बुलाई गई इस बैठक में मंत्रियों, विधायकों और सांसदों की मौजूदगी में काजू, बादाम और सूखे मेवे परोसे गए। इसे तबाह हो चुके काश्तकारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा आचरण बताते हुए पार्टी ने कहा कि जहां खेत में खड़ी फसलें सूखने से अन्नदाता चीख-पुकार कर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष मौज-मस्ती में व्यस्त है। इस दौरान सांसद बंडू जाधव द्वारा बैठक में काजू-बादाम के सेवन का खुला समर्थन करने पर भी कड़े ऐतराज दर्ज किए गए और 50-50 करोड़ रुपये के कथित लेन-देन का तंज कसते हुए नेताओं की प्राथमिकताओं पर सवाल दागे गए।

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देवेंद्र फडणवीस की प्रतिक्रिया पर उठाए गए सवाल

इस पूरे मामले पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के रुख की भी कड़ी आलोचना की गई है। मुख्यमंत्री ने इस घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी बैठकों में काजू-बादाम खाना अनुचित है, प्रशासन को संवेदनशीलता बरतनी चाहिए और विपक्ष को हर बात पर राजनीति करने की आदत है। विपक्षी दल का तर्क है कि मुख्यमंत्री ने अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ते हुए पूरा ठीकरा सीधे प्रशासनिक तंत्र पर फोड़ दिया। उनका कहना है कि सरकार की इस असंवेदनशीलता ने किसानों की तकलीफों को और बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री का दावा है कि मंत्रिमंडल की बैठक में हालात पर गहन मंथन हुआ है और सभी जिलों की प्राथमिक समीक्षा पूरी होते ही आधिकारिक पंचनामे कर तुरंत आर्थिक मदद दी जाएगी, लेकिन विपक्ष का मानना है कि जमीनी अमल के बिना ये महज खोखले वादे बनकर रह गए हैं।

फसलों का विनाश, मवेशियों का चारा और उजड़ते परिवार

राज्य के कई जिलों में प्राकृतिक आपदा के चलते खड़ी फसलों को अपूरणीय क्षति पहुंची है। खासतौर पर सोयाबीन की पूरी फसल जलकर खाक हो चुकी है और निराश किसान खेत की मेड़ों पर बैठकर आंसू बहाने को मजबूर है। ग्रामीण इलाकों में मवेशियों के लिए चारे का गंभीर अभाव पैदा हो गया है, पीने के साफ पानी की भारी किल्लत है, बच्चों की स्कूल-कॉलेज की शिक्षा अधर में लटक गई है और बेटियों के विवाह टल रहे हैं। घरों में चूल्हे बुझने की नौबत आ चुकी है। प्रधानमंत्री के जन्मदिन के अवसर पर हजारों तेल के दीये जलाए जाने की तुलना करते हुए सवाल उठाया गया कि क्या ऐसे आयोजनों से सूखाग्रस्त इलाकों की जमीनी त्रासदी दूर हो सकती है, जबकि संकट के समय सूखे मेवे का जलसा बेहद शर्मनाक तस्वीर पेश करता है।

विशेष विधानसभा सत्र और तत्काल आर्थिक सहायता का प्रस्ताव

संकट की गंभीरता को देखते हुए शिवसेना-यूबीटी ने मांग रखी है कि राज्य सरकार को तुरंत विधानमंडल का विशेष सत्र बुलाना चाहिए ताकि अकाल पर व्यापक चर्चा हो सके। इसके साथ ही दलीय मतभेदों को भुलाकर एक सर्वदलीय 'टास्क फोर्स' के गठन का सुझाव दिया गया है। पार्टी ने शरद पवार के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि सरकार को किसी भी औपचारिक तकनीकी नियम या मानदंड का इंतजार किए बगैर समूचे राज्य में आधिकारिक अकाल घोषित कर देना चाहिए। राहत पैकेज के तहत प्रभावित किसानों को प्रति हेक्टेयर 50 हजार रुपये की सीधी वित्तीय सहायता देने, संपूर्ण और एकमुश्त कृषि कर्जमाफी लागू करने, जरूरतमंद छात्रों की शैक्षणिक फीस माफ करने और पशुओं को बचाने के लिए तुरंत चारा छावनियां स्थापित करने का आग्रह किया गया है।

सवाल-जवाब

शिवसेना-यूबीटी ने महाराष्ट्र सरकार पर क्या मुख्य आरोप लगाए हैं?
पार्टी का आरोप है कि राज्य में किसान गंभीर सूखे से त्रस्त हैं, जबकि मंत्री और जनप्रतिनिधि समीक्षा बैठकों में काजू-बादाम और सूखे मेवे खाकर असंवेदनशीलता दिखा रहे हैं।
नांदेड़ की बैठक को लेकर क्या विवाद सामने आया है?
कृषि मंत्री दत्तामामा भरणे के अकाल दौरे से पहले विश्राम गृह में हुई प्रशासनिक बैठक में उपस्थित नेताओं को काजू-बादाम परोसने की तस्वीरें सामने आने पर विपक्ष ने तीखा विरोध जताया।
इस विवाद पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने क्या प्रतिक्रिया दी?
मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी बैठकों में काजू-बादाम खाना गलत है और प्रशासन को संवेदनशील रहना चाहिए, साथ ही विपक्ष पर हर मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगाया।
सूखे से राज्य के कौन से क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित बताए गए हैं?
मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र और विदर्भ के इलाके सूखे से सबसे ज्यादा बेहाल हैं, जहां सोयाबीन समेत खड़ी फसलें जल गई हैं।
विपक्षी दल ने किसानों के लिए सरकार से क्या-क्या मांगें रखी हैं?
पार्टी ने प्रति हेक्टेयर 50 हजार रुपये की सहायता, पूर्ण एकमुश्त कर्जमाफी, छात्रों की शैक्षणिक फीस माफी, चारा छावनियां शुरू करने और विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Nyra Kaif@nyra-kaif·35 दिन पहले

यह खबर दर्शाती है कि कैसे राजनीतिक संवेदनहीनता और सोशल मीडिया के दौर में विजुअल पॉलिटिक्स जनता के गुस्से को भड़का सकती है। जब एक तरफ किसान सूखे से जूझ रहे हैं, वहीं वीआईपी बैठकों में परोसे जाने वाले सूखे मेवे जैसे प्रतीक नेतृत्व की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। भविष्य में ऐसी घटनाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जनता के आक्रोश और मीम कल्चर को और बढ़ावा देंगी, जिससे नेताओं की छवि को नुकसान पहुंचना तय है।

Ravikash Gupta@ravikash·35 दिन पहले

महाराष्ट्र के सूखे और प्रशासनिक बैठकों में सूखे मेवे के विवाद ने एक बार फिर कृषि संकट और वित्तीय कुप्रबंधन के बीच की खाई को उजागर कर दिया है। मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में फसलों के नुकसान और चारे की भारी किल्लत से ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। ऐसे समय में राज्य के वित्तीय संसाधनों और राहत कोष के आवंटन पर निवेशकों और बाजारों की भी नजर होती है, क्योंकि ग्रामीण क्रय शक्ति घटने से कॉर्पोरेट सेक्टर और एफएमसीजी बाजार पर सीधा नकारात्मक असर पड़ता है। तात्कालिक राहत और सटीक वित्तीय सहायता न मिलने से उपभोग मांग में और गिरावट आ सकती है, जिससे आर्थिक सुधार की गति प्रभावित होगी।

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·35 दिन पहले

मराठवाड़ा और विदर्भ के कृषि संकट का यह घटनाक्रम भारत के ग्रामीण उपभोग और व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिए एक बड़ा जोखिम बनता जा रहा है। जब देश की एक तिहाई से अधिक अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर हो, तो सूखे जैसी आपदाओं के समय राहत कार्यों में देरी और राजनीतिक बयानबाजी से निवेशकों का भरोसा डगमगाता है। वित्तीय संसाधनों का सही दिशा में आवंटन न होना और प्रशासनिक सुस्ती केवल किसानों के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण क्षेत्रीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·35 दिन पहले

मराठवाड़ा और विदर्भ में सूखे के इस दौर में प्रशासनिक बैठकों के तौर-तरीके और जनप्रतिनिधियों की विलासिता केवल राजनीतिक बयानबाजी का मुद्दा नहीं, बल्कि गंभीर प्रशासनिक संवेदनशीलता की विफलता को उजागर करती है। जब फसलें बर्बाद हो रही हों और मवेशी चारे के लिए तरस रहे हों, तब जवाबदेह तंत्र का इस तरह उत्सवधर्मी रवैया अपनाना सार्वजनिक विश्वास को कमजोर करता है। यदि समय पर जमीनी स्तर पर राहत और पंचनामे नहीं हुए, तो यह संकट कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भी विकराल रूप ले सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·35 दिन पहले

मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में जल संकट और फसल बर्बादी के बीच नेताओं के शाही खानपान पर मचा यह घमासान केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जमीनी स्तर पर प्रशासनिक सुस्ती और जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है। यदि राज्य सरकार ने तुरंत युद्धस्तर पर पंचनामा प्रक्रिया पूरी कर किसानों के खातों में सीधी आर्थिक सहायता और मवेशियों के लिए चारे का पुख्ता बंदोबस्त नहीं किया, तो यह गहराता अकाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तबाह करने के साथ-साथ बड़े सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकता है।

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