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मणिपुर के पारंपरिक युद्ध कौशल थंग-टा को बचाने और आगे बढ़ाने पर दिया जा रहा जोरमणिपुर
26 अक्तू॰ 2026, 9:45 pm (20 घंटे पहले)· 1

मणिपुर के पारंपरिक युद्ध कौशल थंग-टा को बचाने और आगे बढ़ाने पर दिया जा रहा जोर

मणिपुर में ऑल-इंडिया इंटर-UNIVERSITY थंग-टा चैंपियनशिप का आयोजन किया गया है, जिसमें देश भर के कई राज्यों से आए छात्र हिस्सा ले रहे हैं।

मणिपुर की सांस्कृतिक विरासत और उसके गौरवशाली इतिहास का अहम हिस्सा माने जाने वाले पारंपरिक मार्शल आर्ट थंग-टा को संरक्षित करने और बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। इस प्राचीन युद्ध कला का महत्व राज्य की संस्कृति में बेहद गहरा है और यह यहाँ की ऐतिहासिक परंपराओं से मजबूती से जुड़ी हुई है।

इम्फाल में राष्ट्रीय चैंपियनशिप का शुभारंभ

इम्फाल के खुमान लाम्पाक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स स्थित इंडोर स्टेडियम में ऑल-इंडिया इंटर-University थंग-टा (Men & Women) चैंपियनशिप 2026-27 की आधिकारिक शुरुआत की गई है। इस बड़े आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए तकनीकी अधिकारियों, खिलाड़ियों और प्रतियोगियों का स्वागत किया गया, ताकि विश्वविद्यालय स्तर के एथलीटों को अपनी प्रतिभा दिखाने का एक बेहतरीन मंच मिल सके।

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बचपन के संस्मरण और मार्शल आर्ट से जुड़ाव

इस कला के प्रति व्यक्तिगत जुड़ाव को याद करते हुए बताया गया कि 1975, 1976 और 1977 के दौरान इस अनुशासन में ट्रेनिंग ली गई थी। ब्रूस ली की फिल्म Enter the Dragon के 1978 में रिलीज होने से गहरा प्रेरणा मिली थी, जिसके बाद ताइक्वांडो सीखने के लिए मणिपुर छोड़ना पड़ा था। कभी यह उम्मीद नहीं की थी कि मणिपुर की अपनी पारंपरिक कला थंग-टा इतनी ऊंचाइयों पर पहुँच जाएगी।

थंग-टा के गुरुओं और आयोजकों का आभार

इस पारंपरिक विधा को आगे बढ़ाने में जुटे सम्मानित गुरुओं के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त की गई है, साथ ही World Thang-Ta Federation के President के समर्पित प्रयासों की सराहना भी की गई है। इसके अलावा National Sports University के Vice-Chancellor दलजीत सिंह चौधरी का भी इस प्रतिष्ठित चैंपियनशिप के आयोजन के लिए धन्यवाद किया गया है, जो देश भर के विश्वविद्यालयों के युवाओं को अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर दे रही है।

ऐतिहासिक संघर्ष और युद्ध कला का महत्व

पारंपरिक युद्ध कौशल के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए 1819 से 1826 के बीच के सात साल के विनाश काल का जिक्र किया गया, जब मणिपुर पर बर्मा का कब्जा हो गया था। उस दौर में राज्य के पूर्वजों ने अपनी मातृभूमि को वापस पाने के लिए भारी साहस दिखाया और संघर्ष किया। इसके अलावा 1891 के आंग्ल-मणिपुर युद्ध का भी उल्लेख किया गया, जिसमें मणिपुरी योद्धाओं ने थंग-टा जैसी पारंपरिक युद्ध कलाओं का उपयोग करते हुए अंग्रेजों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी।

प्रतियोगिता में विश्वविद्यालयों की व्यापक भागीदारी

वर्तमान में आयोजित हो रही इस चैंपियनशिप में कुल नौ राज्यों के 24 विश्वविद्यालयों से आए प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। इस प्रतियोगिता में कुल 252 छात्र अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं, जिनमें 146 पुरुष और 106 महिला खिलाड़ी शामिल हैं जो मुकाबलों में जोर आजमाइश कर रहे हैं।

सवाल-जवाब

थंग-टा किस राज्य का पारंपरिक मार्शल आर्ट है?
थंग-टा मणिपुर का एक पारंपरिक और ऐतिहासिक मार्शल आर्ट है।
ऑल-इंडिया इंटर-University थंग-टा चैंपियनशिप 2026-27 कहाँ आयोजित की जा रही है?
यह चैंपियनशिप इम्फाल के खुमान लाम्पाक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स स्थित इंडोर स्टेडियम में आयोजित हो रही है।
इस चैंपियनशिप में कितने राज्यों के विश्वविद्यालय हिस्सा ले रहे हैं?
इस प्रतियोगिता में नौ राज्यों के 24 विश्वविद्यालयों के छात्र भाग ले रहे हैं।
प्रतियोगिता में कुल कितने खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं?
इस आयोजन में कुल 252 छात्र हिस्सा ले रहे हैं, जिनमें 146 पुरुष और 106 महिला खिलाड़ी शामिल हैं।
National Sports University के Vice-Chancellor कौन हैं?
National Sports University के Vice-Chancellor दलजीत सिंह चौधरी हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·14 घंटे पहले

मणिपुर के इस पारंपरिक मार्शल आर्ट को बचाने के लिए जो चैंपियनशिप हो रही है, उसमें राज्यों की भागीदारी तो दिख रही है, पर क्या इसमें सरकार की तरफ से कोई बड़ा फंड या मदद भी मिल रही है?

Ananya Iyer@ananya-iyer·16 घंटे पहले

मणिपुर के इस मार्शल आर्ट को नेशनल लेवल पर देखकर अच्छा लगा। क्या फिल्मों की वजह से अब ऐसी पारंपरिक कलाओं को ज्यादा पॉपुलैरिटी मिल रही है?

Rohan Gupta@rohan-gupta·16 घंटे पहले

पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देना अच्छी बात है, पर मुझे शक है कि सिर्फ़ चैंपियनशिप कराने से इस कला को असल में वह पहचान मिलेगी या नहीं जो इसे ग्लोबल स्तर पर मिलनी चाहिए।

Rohan Verma@rohan-verma·16 घंटे पहले

पारंपरिक कलाओं को बचाना अच्छी बात है, पर क्या सिर्फ ऐसे टूर्नामेंट करवाने भर से ये कलाएं आज के दौर में जीवित रह पाएँगी? जब तक रोजगार या आजीविका से नहीं जुड़ेंगी, युवा इसमें टिकेंगे नहीं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·16 घंटे पहले

रोहन भाई, सही कह रहे हो। मैंने खुद अस्सी के दशक में जब मार्शल आर्ट सीखा था, तब इसे शौक से ज्यादा कुछ नहीं माना था, पर आज जब इतने युवा इसमें उतर रहे हैं तो उम्मीद जगती है।

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