आजीविका की तलाश में कई बार लोगों को अपनी जन्मभूमि, परिचित माहौल और सीमाओं को पार कर सुदूर इलाकों का रुख करना पड़ता है। नए परिवेश में अपनी पहचान बनाना और शून्य से शुरुआत करना हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन निष्ठा और लगातार कोशिशों के बल पर कोई भी अपरिचित जगह कर्मभूमि में बदल सकती है। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में नेपाल से आए बहादुर शाह बेग का सफर भी कुछ ऐसा ही है, जिन्होंने एक छोटे से प्रयास को अपनी स्थायी आजीविका का मजबूत आधार बना लिया है।
शहडोल में मोमोज की दुकान से शुरुआत
बहादुर शाह बेग मूल रूप से नेपाल के निवासी हैं। लगभग 10 वर्ष पहले वह बेहतर रोजगार के अवसरों की तलाश करते हुए मध्य प्रदेश के शहडोल पहुंचे थे। नए शहर में कदम रखने के बाद उन्होंने किसी बड़े सहारे के बिना सीधे काम पर ध्यान लगाया। उन्होंने शहडोल के जिला मुख्यालय से तकरीबन 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एनडीसी कॉलेज के समीप एक छोटी सी मोमोज की दुकान शुरू की। शुरुआत बेहद सीमित स्तर पर हुई थी, पर उन्होंने इसी स्टॉल को अपनी आमदनी का मुख्य साधन बना लिया और बिना रुके अपने काम में जुटे रहे।
दैनिक दिनचर्या और आत्मनिर्भरता की राह
शहडोल में बहादुर शाह बेग किराए का कमरा लेकर रहते हैं और अपना पूरा ध्यान काम पर केंद्रित रखते हैं। रोजाना सुबह से शाम तक दुकान खोलना, ग्राहकों के लिए ताजे मोमोज तैयार करना और ईमानदारी से अपनी रोजी-रोटी जुटाना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। अपने मुल्क और परिजनों से दूर एक अनजान इलाके में रहकर हर दिन की जिम्मेदारियों को निभाना उनके इस सफर को संघर्षपूर्ण और सम्मानजनक बनाता है।
अनजान शहर को बनाया अपनी कर्मभूमि
बीते एक दशक के दौरान शहडोल बहादुर शाह बेग के लिए केवल काम करने की जगह नहीं रहा, बल्कि उनके जीवन का अटूट हिस्सा बन चुका है। एनडीसी कॉलेज के पास स्थित उनका मोमोज स्टॉल उनकी अनवरत मेहनत और आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश करता है। उनका यह सफर स्पष्ट संदेश देता है कि अपनी पहचान स्थापित करने के लिए असीम संसाधनों की नहीं, बल्कि काम के प्रति समर्पण, दृढ़ संकल्प और लगातार प्रयास की दरकार होती है।


















