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ग्रामीण इलाकों में आटा चक्की का स्वरोजगार, देवघर के रंजीत कुमार की तरह कम लागत में हर महीने कमाएं 30 से 40 हजार रुपयेझारखंड
31 अक्तू॰ 2026, 3:00 pm (1 मिनट पहले)· 0

ग्रामीण इलाकों में आटा चक्की का स्वरोजगार, देवघर के रंजीत कुमार की तरह कम लागत में हर महीने कमाएं 30 से 40 हजार रुपये

गांवों में साल भर बनी रहने वाली आटे की मांग को पूरा करने के लिए आटा चक्की लगाना एक मजबूत स्वरोजगार बन सकता है। देवघर के व्यवसायी रंजीत कुमार ने सीमित पूंजी से शुरुआत कर इस काम को हर महीने हजारों की कमाई का जरिया बना दिया।

गांवों और कस्बों में स्वरोजगार शुरू करने के इच्छुक लोगों के लिए अनाज पिसाई का काम एक टिकाऊ विकल्प साबित हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अधिकांश परिवार पैकेट बंद आटे के बजाय अपने खेतों में उगाई गई या बाजार से खरीदी गई गेहूं को पिसवाना ही पसंद करते हैं। चूंकि यह आवश्यकता दैनिक जीवन से जुड़ी है, इसलिए इस काम में ग्राहकों का अभाव नहीं रहता। अगर योजना बनाकर सही स्थान पर चक्की स्थापित की जाए, तो बहुत सीमित लागत में एक नियमित आमदनी का साधन खड़ा किया जा सकता है।

डीजल इंजन के कठिन दौर से बिजली मोटर तक का सफर

देवघर निवासी रंजीत कुमार की कहानी इस बात की तस्दीक करती है कि निरंतरता और समय के अनुकूल बदलाव से इस काम को कैसे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने लगभग 25 से 30 वर्ष पहले महज 35 हजार रुपये की मामूली पूंजी जुटाकर अपनी आटा चक्की की नींव रखी थी। शुरुआती दौर में उनके क्षेत्र में बिजली की नियमित आपूर्ति नहीं थी। इस वजह से उन्हें अपनी मशीन डीजल इंजन के सहारे चलानी पड़ती थी। डीजल की निरंतर खरीद पर होने वाले भारी खर्च के कारण उन दिनों मुनाफा काफी सीमित रह जाता था और बचत बहुत कम होती थी।

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हालात कठिन होने के बावजूद उन्होंने अपना काम बंद करने के बजाय व्यवस्था सुधरने का इंतजार किया। जैसे ही गांव में बिजली का बुनियादी ढांचा बेहतर हुआ, उन्होंने अपनी पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए 10 एचपी क्षमता का इलेक्ट्रिक मोटर स्थापित कर लिया। बिजली से चलने वाले मोटर पर आने के बाद ईंधन पर होने वाला बड़ा खर्च लगभग समाप्त हो गया। संचालन लागत घटते ही उनकी चक्की से होने वाली शुद्ध बचत में उल्लेखनीय उछाल दर्ज किया गया।

मासिक कमाई और ग्राहकों का मजबूत दायरा

व्यावसायिक अनुभवों को साझा करते हुए रंजीत कुमार बताते हैं कि सही संचालन से महीने में 30 हजार रुपये, 35 हजार रुपये अथवा 40 हजार रुपये तक की शुद्ध आमदनी सहजता से हो जाती है। यह आय पूरी तरह से गेहूं की आवक, पिसाई की मात्रा और मौसम पर निर्भर करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गांवों में परिवारों को नियमित रूप से अनाज पिसवाने की जरूरत होती है। इसलिए यदि दुकान किसी मुख्य रास्ते या ऐसे केंद्र पर हो जहां आसपास की बस्तियों का आवागमन रहता हो, तो ग्राहकों की कभी कमी नहीं होती। एक बार संतुष्ट होने पर ग्रामीण ग्राहक सालों साल उसी दुकान पर आना पसंद करते हैं।

बाजार का विश्लेषण और अतिरिक्त सेवाओं का विस्तार

नया व्यवसाय शुरू करने से पहले जमीनी स्तर पर पड़ताल करना सबसे महत्वपूर्ण कदम है। इच्छुक उद्यमियों को अपने क्षेत्र में पहले से संचालित चक्कियों की संख्या और लोगों को तय करनी पड़ने वाली दूरी का आकलन करना चाहिए। इसके पश्चात ही अपनी जमा पूंजी के आधार पर दुकान की जगह, पिसाई मशीन और उपयुक्त क्षमता के मोटर का चयन करना श्रेयस्कर होता है। सुरक्षित बिजली कनेक्शन और मशीन की नियमित क्षमता का ध्यान रखना भी जरूरी है।

आमदनी को और अधिक बढ़ाने के लिए केवल गेहूं तक सीमित रहने के बजाय मसालों की पिसाई जैसी अतिरिक्त सेवाएं भी जोड़ी जा सकती हैं। हल्दी, धनिया और मिर्च की पिसाई की सुविधा देकर दुकान पर आने वाले ग्राहकों को एक ही छत के नीचे संपूर्ण समाधान दिया जा सकता है, जिससे दैनिक मुनाफे में अतिरिक्त इजाफा होता है।

ग्रामीण युवाओं के लिए कम निवेश में स्वरोजगार

अपने ही गांव में रहकर आत्मनिर्भर बनने की इच्छा रखने वालों के लिए यह एक व्यावहारिक जरिया है। हालांकि इसमें मिलने वाला लाभ पूरी तरह से ग्राहकों की संख्या, पिसाई के तय रेट, बिजली के बिल और मशीन के रखरखाव पर आधारित रहता है। शुरुआती 35 हजार रुपये की छोटी सी लागत से शुरू कर आज 30 से 40 हजार रुपये मासिक आय तक पहुंचने का रंजीत कुमार का यह सफर उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणादायी है जो सीमित बजट में टिकाऊ काम तलाश रहे हैं।

सवाल-जवाब

रंजीत कुमार ने आटा चक्की का काम कितनी पूंजी से शुरू किया था?
उन्होंने करीब 25 से 30 साल पहले लगभग 35 हजार रुपये की शुरुआती लागत से यह काम शुरू किया था।
शुरुआत में आटा चक्की चलाने में क्या परेशानी आई थी?
उस समय बिजली की उचित व्यवस्था न होने से उन्हें डीजल इंजन चलाना पड़ता था, जिससे ईंधन खर्च काफी अधिक होता था।
बिजली आने के बाद उन्होंने क्या बदलाव किया?
बिजली आपूर्ति ठीक होने पर उन्होंने अपनी चक्की में 10 एचपी का इलेक्ट्रिक मोटर लगवाया, जिससे खर्च घटा और लाभ बढ़ गया।
वर्तमान में इस आटा चक्की से हर महीने कितनी कमाई हो जाती है?
कामकाज और गेहूं की आवक के आधार पर उन्हें प्रति माह 30 हजार से 40 हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती है।
आटा चक्की खोलने के लिए सही जगह का चयन कैसे करें?
चक्की गांव के मुख्य केंद्र या ऐसी जगह लगानी चाहिए जहां आसपास के कई गांवों के लोगों का नियमित आना-जाना हो।
आमदनी बढ़ाने के लिए गेहूं के साथ और क्या काम किया जा सकता है?
गेहूं की पिसाई के अलावा हल्दी, मिर्च और धनिया जैसे मसालों की पिसाई की सुविधा देकर अतिरिक्त मुनाफा कमाया जा सकता है।
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